याज्ञसेनी – 3 : मेरी कहानी दुख का संतृप्त दर्शन है!

जब यज्ञ की अग्नि से द्रौपदी का जन्म हुआ तो वह लगभग पाँच वर्ष की कन्या थी. वह अयोनिजा थी क्योंकि उसे किसी माँ के गर्भ में रहने का अवसर नहीं मिला था.

यज्ञ की समाप्ति पर राजा द्रुपद ने पुत्र धृष्टद्युम्न और पुत्री याज्ञसेनी के लिए एक अलग महल और स्नेहमयी धाय का प्रबंध कर दिया.

धीरे धीरे समय व्यतीत होने लगा और द्रौपदी सांसारिक सम्बंधों का सत्य समझने लगी. वह अपने स्मरण रह गए अतीत की छाया से भी मुक्त होने लगी. जब वह अपने महल के आस पास सेवकों के शिशुओं को देखती तो निराशा और आक्रोश से भर जाती, उसे अपने शैशव के न होने का दुःख होता.

द्रौपदी के चरित्र को समझने के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि उसे माता-पिता के वात्सल्य का किंचित मात्र भी अनुभव नहीं था.

उनके महल में भी पिता द्रुपद की अन्य पत्नियाँ तथा संताने प्रायः नहीं आती-जाती थीं. वे दोनों भाई बहन इस दृष्टि से बहुत अकेले थे.

माँ तथा अन्य बहनों के अभाव में द्रौपदी ने सभी सम्बंधों को अपने भाई की दृष्टि से ही समझा और मुझे लगता है द्रौपदी के व्यवहार में आगे भी दृढ़ता और संघर्ष की शक्ति इस पुरुष वृत्ति का ही परिणाम है.

कुछ वर्षों के बाद याज्ञसेनी किशोरावस्था को पार कर यौवन की ओर अग्रसर हो रही थी. पिता ने उन दोनों के लिए योग्यतम शिक्षकों की व्यवस्था की थी जो उन्हें भाषा, इतिहास, काव्य और दर्शन आदि की शिक्षा दे रहे थे.

उनके महल में कई बार शास्त्रार्थ भी होता था जिस में द्रौपदी उत्साह से भाग लेती थी. उसकी चिंतन दृष्टि से गुरुजन भी आश्चर्य चकित हो जाते थे. धृष्टद्युम्न को युद्ध की शिक्षा भी मिलने लगी थी और द्रौपदी नृत्य, संगीत, चित्रकला आदि सीख रही थी.

वह साँवली कृष्णा अब अत्यंत मादक स्त्री में परिवर्तित हो रही थी. राज्य के कवियों में उसके रूप और यौवन की निरंतर चर्चा थी. उसके जन्म के समय हुई भविष्यवाणी से तो सभी परिचित ही थे.

सभी को विश्वास था कि याज्ञसेनी एक विलक्षण स्त्री बनने की प्रक्रिया में है. वह स्त्री होने की विडम्बना से परिचित होते हुए, पति के रूप में किसी समर्थ और अनेक गुणों से सम्पन्न पुरुष की कामना, अपने इष्ट देव, भगवान शिव से करती है. आईए, सुनते हैं याज्ञसेनी से उसकी अपनी कथा!

याज्ञसेनी, हाँ द्रौपदी हूँ, मैं!

वैभव सिराहने से लगा कर
रात भर सोई नहीं हूँ
चंद्रमा की रौशनी में
स्मरण करना चाहती हूँ
उन पलों को
जो छिपे होंगे कहीं
मेरा अघोषित भूत बन कर
आश्चर्य है,
शैशव विहीना, मैं हुई हूँ क्यों!

महल की प्राचीर के नीचे
उषा की लालिमा में
भूख से व्याकुल
रो रही है एक कन्या
बहुत छोटी, बहुत नाजुक;
माँ स्नेह से व्याकुल लपकती है
हृदय से बाँध लेने को
अपलक देखती है
द्रौपदी इस स्नेह बंधन को
जहाँ मधुर वात्सल्य का रस है!

चहकते पक्षियों से
ताल पूरा भर गया है
वे पथिक हैं, दूर उड़ कर जा रहे हैं
प्रशस्ति में वरुण की
कूकते हैं वे ऋचाएं
और बादल राग में
मल्हार किंचित गा रहे हैं
मोगरे के फूल सा महका,
खिला मन है
हवा भी कसमसाती है,
द्रौपदी इस भोर में
कुछ गुनगुनाती है!

पुष्प कितने ही खिले हैं
महल के उद्यान में
इंद्रधनु ज्यों आ गया है
मलय के संज्ञान में
एक बाला चाहती है
पकड़ लेना तितलियों को
दौड़ती है, खिलखिलाती है
बहुत निश्छल;
धक्क से होता हृदय है द्रौपदी का,
हे प्रभो! कहाँ है बालपन मेरा?

क्या उदासी
और कुछ संताप ही मेरे लिए है
कौन समझेगा असम्भव भावनाएं
जो इस समय
मेरे हृदय को मथ रही हैं!

मनुष्य का यह जन्म कैसा
यदि अवस्थाएं सभी
तुम जी नहीं पाए
व्यर्थ है, धिक्कार है यौवन तुम्हारा
स्नेह माता का
अगर तुम ले नहीं पाए
मेरी कहानी
इस दुख का संतृप्त दर्शन है!

याज्ञसेनी, हाँ द्रौपदी हूँ, मैं!

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