खुदा गवाह से बाग़बान के बीच है विज्ञान

तीन साल पहले हम दो सहोदर बच्चों को पढ़ाते थे. पूजा के लिये माला फूल, पुस्तकें, पेट्रोल, मोबाइल और इंटरनेट का खर्च निकल आए इसलिए ये सब करना पड़ता है.

आजीविका हेतु अध्ययन आवश्यक है परन्तु “converse is not always true” अपना यही सिद्धांत है इसलिए भरी पूरी नौकरी न होने के बावजूद मैं अध्ययन से कभी विमुख नहीं हुआ.

बहरहाल, उस घर में उन बच्चों के चाचा बड़े विचित्र थे. गरमी के मौसम में भरी दुपहरी में जब हम उनके यहाँ जाते थे तो देखते थे कि पंखा डुगुर-डुगुर चल रहा है. हमें लगा कि शायद पंखा खराब होगा, तो कण्डेंसर बदलने की नसीहत दे डाली.

चाचा जी हँस कर बात टाल गए. मैंने बच्चे से पूछा तो वो बोला कि पंखा धीमा चलाने से बिजली की खपत कम होती है इसलिए चाचाजी ने रेगुलेटर से ही कम कर दिया है.

चूंकि बच्चों के बाप यानि चाचा जी के बड़े भाई बहुत कम कमाते थे और घर भी चाचा का ही था इसलिए बिजली का बिल भी चाचा ही भरते थे. बच्चों की हिम्मत नहीं थी कि रेगुलेटर से पंखा तेज़ चलायें.

मुझे उन बच्चों पर दया और उनके चाचा पर गुस्सा आता था. साथ ही चाचा पर हँसी भी आती थी. दया और गुस्से का कारण तो आप समझ गए होंगे लेकिन हँसी का कारण क्या था? नहीं समझे न? बताते हैं.

रेगुलेटर से पंखे की गति कम कर देने पर भी बिजली कम खर्च नहीं होती, बल्कि बर्बाद होती है. आप कभी पुराने प्लास्टिक के डब्बे के आकार के रेगुलेटर देखिये तो उसमें साइड में खांचे कटे हुये होते थे. पता है क्यों?

इसलिए क्योंकि जब हम रेगुलेटर से पंखे की चाल तेज़ या कम करते हैं तो हम करेंट के बहाव को नियंत्रित करते हैं.

पंखे की चाल जब कम होती है तो उसमें कम इलेक्ट्रॉन जा पाते हैं. लेकिन बिजली के स्रोत (पॉवर हाउस/इनवर्टर बैटरी) से तो उतने ही इलेक्ट्रॉन निकले थे जितने निकलते हैं. आपने बीच में कुछ इलेक्ट्रॉनों को रेगुलेटर में रोक दिया.

अब ये इलेक्ट्रॉन जो पोल से आपके घर तक आये थे ये कहाँ जायेंगे? ये रेगुलेटर में ही घूमते हैं और बेवजह की गरमी पैदा करते हैं जिसे Eddy currents कहा जाता हैं. इस गरमी को निकालने के लिये ही रेगुलेटर में खांचे कटे होते हैं. ये ऊर्जा की बर्बादी है क्योंकि इन इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा से तो आपको पंखे की हवा मिलनी चाहिये थी लेकिन आप तो Eddy currents पैदा कर रहे हैं.

कुछ लोग तो ये भी समझते होंगे कि जरूर पंखा इलेक्ट्रॉन खाता होगा तभी चलता होगा. इस अनुभव के माध्यम से मैं ये बताना चाहता हूँ कि हमारे समाज में विज्ञान के प्रति इतनी उदासीनता है कि चार लोग बैठ कर विज्ञान से संबंधित किसी मुद्दे पर चार लाइन बोलने लायक भी नहीं हैं.

मेरी फेसबुक पोस्ट/आलेख पर भी विचित्र कमेंट्स आते हैं. मेरे मित्र जो वरिष्ठ पत्रकार हैं अकसर कहते हैं कि डिस्कोर्स बदल रहा है. क्या दृष्टिकोण भी बदल रहा है? यदि हाँ तो किस दिशा में?

पिछले साल एक खबर आई थी कि इसरो के एक वैज्ञानिक ने आईएएस ज्वाइन कर लिया था. इसरो बहुत अच्छा काम कर रहा है इसमें कोई शक नहीं. एक व्यक्ति के निकल जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

लेकिन आप उस व्यक्ति की मानसिकता को समझिये. ये केवल जॉब बदलने की बात नहीं है. एक वैज्ञानिक को सम्मान और पैसा कम नहीं मिलता. क्या इसी तरह से स्टार्टअप, नवोन्मेष होगा? मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी? नोबेल आएगा?

विज्ञान को हर व्यक्ति अपने नज़रिये से देखता है और मूल्यांकन करता है. कोई अध्यात्म दर्शन में Metaphysics खोजता है तो कोई मार्क्सवादी विज्ञान की तलाश करता है. रोमिला थापर प्राचीन भारतीय विज्ञान में रिसर्च को 19th century का obsession करार देती हैं.

एक बार फेसबुक मित्र प्रसन्न प्रभाकर जी ने कहा कि arts/humanities के छात्रों का सोचने समझने का कैनवास बड़ा होता है वो किसी मुद्दे पर कई एंगल से सोच सकते हैं. विज्ञान के छात्रों का दायरा संकुचित होता है.

मोटा-मोटामतलब यही था मुझे पूरी पोस्ट याद नहीं, क्षमाप्रार्थी हूँ. मुझे बहुत ज्यादा साहित्यिक सामाजिक बातें समझ में नहीं आतीं क्योंकि वो result oriented और problem solving टाइप की नहीं होतीं.

चलिये एक काल्पनिक केस स्टडी करते हैं. खुदा गवाह की श्रीदेवी काबुल में रो रही है और बच्चन साहब हिन्दुस्तान में फंस गए. सिनेमा, कला और साहित्य की दृष्टि से विरह की बेला है. प्रेमी मिलन की आस है, कई सारे साहित्यिक रस हैं. हो सकता है आप भी रो पड़ें और कुछ देर बाद वाह वाह कहें.

लेकिन एक पल के लिये सोचिये यदि श्रीदेवी के पास फोन होता तो? एक ऐसा संचार का माध्यम होता जिससे दोनों बात कर पाते. तब तो बाग़बान हो जाता न! विज्ञान की एक खोज दूरियां मिटा देती है. आपका साहित्य तेल लेने चला जाता है और कला एक नया रूप ले लेती है जिसे आप contemporary cinema कहने लगते हैं. दूसरे अर्थों में विज्ञान समाधान देता है.

प्रतियोगी परीक्षाओं में एक निबंध लिखने को आता था “विज्ञान- वरदान या अभिशाप”. यही  सबसे बड़ा अभिशाप था. हमारे अंदर एक बात ठूंस ठूंस के भरी जाती है कि विज्ञान दूसरी दुनिया की कोई चीज़ है जो या तो “कोई मिल गया” के “जादू” की तरह चमत्कारी होती है या बेहद कठिन. यही मानसिकता हमारी बेचारगी की GDP में इजाफा करने का कारक है.

विज्ञान पर जब कोई लिखता है तो इसी मानसिकता से लिखता है. कोई भी विज्ञान का लेखक या तो रुचिकर, मजेदार चीजें लिखने के चक्कर में विषयवस्तु में से विज्ञान निकाल कर फेंक देता है या इतना कठिन लिख देता है कि लोग बिना समझे ही ताली बजाने लगते हैं.

इंटरनेट पर तमाम आलेख आते हैं जो lucid होने चाहिये लेकिन वो lucrative ज्यादा नजर आते हैं. आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि make things simple but not simpler! चीजों को आसान बनाइये ताकि सबको समझ में आये लेकिन एकदम से गोंड़ मत दीजिये! गोंड़ देना शायद देहाती शब्द नहीं है बनारस में भी बोलते हैं.

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