न्यूटन से 500 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य को ज्ञात था गुरुत्वाकर्षण का नियम

भास्कराचार्य नाम के दो महान गणितज्ञ हुए है. 6वीं शताब्दी के भास्कर, जो महाराष्ट्र के थे. इन्होंने आर्यभट्टीय गणित को आगे बढ़ाया. इनकी पुस्तक महाभास्करीय है.

जिन भास्कराचार्य की बात हो रही है, ये 12वीं शताब्दी के गणितज्ञ थे, जो कर्णाटक के थे. इनकी पुस्तक सिद्धांत शिरोमणि है. जो कि 4 खण्डों में है.

लीलावती नामक कोई पृथक पुस्तक नहीं है. सिद्धान्त शिरोमणि के प्रथम भाग का नाम ही लीलावती है.

जनश्रुतियों के अनुसार लीलावती इनकी विदुषी व गणितज्ञ पुत्री थी, भास्कराचार्य ज्योतिष के महान ज्ञाता थे. वे जानते थे कि लीलावती का अल्पायु योग है.

उन्होंने यह गणना की थी कि यदि किसी विशेष मुहूर्त क्षण में लीलावती का विवाह कर दिया जाए तो उसका अल्पायु योग समाप्त हो जाएगा.

कहते है कि भास्कराचार्य ने अत्यंत accurate घड़ी बनाई जो सेकंड के 100वें भाग को भी नाप सकती थी. शायद यह जल घड़ी रही होगी, जिसमें जल की अत्यंत सूक्ष्म बूँद, ऊपर वाले पात्र से नीचे वाले पात्र में जाती थी. इस घड़ी की मदद से विशेष मुहूर्त में विवाह संपन्न हुआ.

भास्कराचार्य स्वयं पुरोहित थे. विवाह संपन्न होने के बाद उन्होंने पाया कि लीलावती के कान के झुमके का एक मोती, विवाह के दौरान घड़ी में गिर गया था. अतः गणनानुसार विशेष मुहूर्त निकल चुका था.

तब भास्कराचार्य ने कहा कि मैं पुत्री के मृत्यु योग को समाप्त तो नहीं कर सका, किन्तु पुस्तक का नाम लीलावती रख कर उसके नाम को सदा के लिए अमर कर दूंगा.

न्यूटन से 500 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य को गुरुत्वाकर्षण का भी समुचित ज्ञान था. गोलाध्याय के भुवनकोश प्रकरण में वे लिखते हैं – ‘मरुच्चलो भूरचला स्वभावतो यतो विचित्रा वत वस्तुशक्तयः’, अर्थात पृथ्वी अचल यानि निराधार है.

वे आगे लिखते हैं :
आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् ख्स्थं गुरू स्वाभिमुखं स्वशक्त्या |
आकृष्यते तत्प्ततीव भाति समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे ||

अर्थात, पृथ्वी में आकर्षण – शक्ति है. पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है. आकर्षण के कारण यह गिरती-सी लगती है, मगर जब यह चारों ओर का आकाश निराधार है, तो फिर यह पृथ्वी क्यों नहीं निराधार हो सकती?

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