याज्ञसेनी – 2 : जब भी स्वयं से हारता है पुरुष भस्म होती है कोई नारी!

चाँद अब ठहरा हुआ है
बादलों के बीच
कोई स्वप्न सहसा आ रहा है,
मेरी खुली आँखों में!

नलयानी मेरा नाम था
पिछले जन्म में
निषाद कुल सम्राट,
नल थे पिता मेरे!

द्यूत प्रेमी,
जो जंगलों में वनवास जीते थे
और मेरी माँ अलौकिक सुंदरी थी,
श्वेतवर्णा – नाम दमयंती,
देख कर उसको
इंद्र की भी अप्सराएं मुँह छुपाती थीं
शुचिता से भरी वह श्रेष्ठता से पूर्ण थी
त्याग की प्रतिमूर्ति थी वह!

नलयानी सुंदर थी, मुखर थी
माप लेना चाहती थी – हंसिनी-सी
प्रेम का उत्ताल सागर,
अधखिली-सी कुमुदिनी थी!

पिता ने मौद्गल्य ऋषि से
कर दिया परिणय
क्योंकि ऋषि यह चाहते थे!

कौन सुनता बात उसकी
राज पुत्री हो भले ही,
अंततः तो स्त्री ही थी!

कुष्ठ रोगी थे ऋषिश्वर,
वृद्ध थे, बीमार भी थे
प्रेम क्या, अभिसार क्या
रुक्षता, दुत्कार ही था
और मेरी कुंडली में
शुक्र भी तो अस्त ही था!

काम सुख वंचित कली मुरझा रही थी
किंतु धीरज बाँध कर अपने हृदय से
डमगाती, कर्मपथ पर
बस चली ही जा रही थी!

एक दिन मौद्गल्य ने देखा ने उसे
करुणा जनित सद्भावना से
अनुभव किया दुख की लकीरों को!
मांग लो वरदान कोई
कह दिया उससे!

क्या मांगती नलयानी बोलो
अपने पति से इस अवस्था में?
चिंतित हुई वह,
जानती थी बहुत क्षमता है ऋषि में
उनके लिए बनना युवक भी है नहीं मुश्किल
क्यों न सुखों को जी लिया जाए!

मांग बैठी काम सुख
और तृप्ति वासना की!
वह डूब जाना चाहती थी
कामना के उन अनूठे कलरवों में!

वचन से आबद्ध थे मौद्गल्य
क्या करते
पर ज़रा भी मन नहीं था वासना में!
नलयानी डट कर तैरती थी
उस समंदर में
जो थका था किसी पोखर–सा!

एक दिन झल्ला उठे मौद्गल्य,
अक्सर हार जाता था पुरुष उनका
उस नव यौवना से!
बोले – शाप देता हूँ तुम्हें!
वासना जितनी लिए हो
पाँच पुरुषों को भी थका दोगी
बनोगी पाँच पुरुषों की प्रिया तुम
लो तुम्हें मैं, इसी पल
अब भस्म करता हूँ!

इतिहास में जब भी
स्वयं से हारता है पुरुष
भस्म होती है कोई नारी!
कितने उदाहरण दूँ
नाम गिनकर क्या करोगे?

और मैं अब याज्ञसेनी
आत्मा नलयानी की भीतर समेटे
आ गई हूँ, द्रुपद कुल में
मेरी कथा यह
धैर्य से सुनते रहो तुम!

याज्ञसेनी, हाँ द्रौपदी हूँ, मैं!

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