श्श्श्श… कोई है… आपके शरीर में!!

Making India

The Parasitic Nature Of The Universe

कभी आपने सोचा है कि अगर आपकी आँखों की दृश्य क्षमता इतनी हो जाती की आप नंगी आँखों से परमाणुओं को देख पाते तो रात को बगल में लेटी आपकी खूबसूरत बीवी का चेहरा कैसा दिखता?

Well… आपको चेहरा नहीं… असंख्य नाचते, जगमगाते हुए परमाणुओ के पुंज दिखाई देते.
Regardless To Say
आपको हार्ट अटैक आ सकता था

लेकिन परमाणु जैसी छोटी चीजे नंगी आँखों से नहीं दिखाई देती क्योंकि बेहतरीन परिस्थितियों में आप मिनिमम 0.1 arc seconds के विजुअल एंगल से बनी चीज देख पाते हैं. सरल शब्दों में…. 0.02 mm से छोटी चीजे देखना हमारे लिए संभव नहीं पर छोटी चीजो का अस्तित्व है !!!!

इसी तरह आप 390-800 नैनोमीटर फ्रीक्वेंसी का प्रकाश ही देख पाते हैं. 390 से ज्यादा फ्रीक्वेंसी का प्रकाश (अल्ट्रावायलट) और 800 से कम फ्रीक्वेंसी का प्रकाश (इंफ्रारेड) आपकी दृश्य क्षमता से बाहर है.

इसी प्रकार आप 20-20000 हर्ट्ज़ फ्रीक्वेंसी का साउंड सुन पाते हैं. तो Moral Of The Story ये है आपकी इन्द्रियों को इस प्रकार डिज़ाइन किया गया है कि
आप ब्रह्माण्ड को उसके मूल स्वरुप में नहीं देख पाते और प्रकृति की शक्तिशाली माया की मरीचिका में फंसे हुए… परम सत्य को जान नहीं पाते
वो सत्य… जो थोड़ा विचलित कर देने वाला भी हो सकता है..

भाग दौड़ से भरी जिंदगी… सड़को पर फर्राटा जाती गाड़ियों, सड़क किनारे बनी गगनचुम्बी इमारतों के बीच सड़कों पर गुजरती जिंदगी का एक पहलू और है… जिससे हम सब अनजान रहते हैं.

“माइक्रोस्कोपिक वर्ल्ड”… जी हाँ… आपके अलावा छोटे छोटे कीड़े मकोड़े बैक्टीरिया आदि भी इस ब्रह्माण्ड का अनुभव करते हैं. ये छोटे छोटे जीव हर जगह है, नंगी आँखों से भले ही ये जीव आपको नजर ना आये लेकिन अगर किसी तरह आप इन असंख्य छोटे छोटे दानवों को देख पाते तो…
Trust Me… शायद अगले पल… आपको दिल का दौरा पड़ सकता था.

चित्र में वो जीव हैं जिनसे आप घिरे हुए हैं.. जो जीव… आपके बिस्तर-तकिये पर… आपकी आँखों… जीभ… दांत… आपकी त्वचा पर…और आपके अंदर भी मौजूद हैं.

तो अगर सृष्टि के रचियता का उद्देश्य इंसानो के लिए इस दुनिया को बनाना था… तो उसने ऐसी समानांतर दुनिया क्यों बनाई? जो एक दूसरे को महसूस नहीं कर सकती? कहीं ये अद्धुत सृष्टि…”परजीविता के सिद्धांत” का पोषण तो नहीं करती?

मार्कंडेय पुराण में एक विवरण आता है कि… मार्कंडेय ऋषि एक दिन विचरण करते हुए किसी तरह इस ब्रह्माण्ड से ही बाहर निकल जाते हैं.. बाहर निकल कर उन्हें दिखता है कि… ये ब्रह्माण्ड तो एक खूबसूरत बच्चा है जो… “एकार्णव के जल” पर अठखेलिया कर रहा हैं
कहानी चाहे सच हो… चाहे बोगस
But… It Has Huge Implications !!!

एक रेगिस्तान में रहने वाला घोंघा… अपनी सीमित क्षमताओं के कारण रेगिस्तान से बाहर कभी नहीं निकल पाता. और रेगिस्तान को ही अपनी दुनिया… अपना ब्रह्माण्ड समझ के जीता है..

एक समुद्र में रहने वाले जीव के लिए… समुद्र का अथाह जल ही उसका ब्रह्माण्ड है… हम इंसान… इस ब्रह्माण्ड की अथाह गहराइयों को देख… अनंत काल से ब्रह्माण्ड के बाहर की दुनिया की कल्पनायें करते रहते हैं … लेकिन इस बात से बेखबर हैं कि… हमारा खुद का शरीर… ना जाने कितने अरब जीवों का घर… दुनिया और ब्रह्माण्ड है..

Who Knows…
शायद… ये ब्रह्माण्ड भी… कोई जीव ही हो
जो… युगों युगों से अपने अस्तित्व के मूल की तलाश में भटक रहा हो
लेकिन…
अपने अंदर चल रही हलचलों से अंजान हो !!!!

And As Always
Thanks For Reading

– विजय सिंह ठकुराय

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