भोग और योग की यात्रा का अंतर

हाँ, रजनीश सत्य ही तो कहते थे, यह काम ही तो है जो तुम्हें मुक्त करेगा, लेकिन जब यह काम सिर्फ और सिर्फ एक दिशा में होगा, जब जब तुम बहुआयामी होने की कोशिश करोगे या चेष्टा करोगे, तब तब तुम्हारा काम भटकेगा, उपेक्षा, ग्लानि और ईर्ष्या में झुलसता हुआ, तुम्हारा यही काम तुम्हें पथभ्रष्ट किये बिना नहीं छोड़ेगा, इतना स्मरण रखना.

रजनीश झूठ नहीं बोले अपने जीवन में एक भी बार, कमी और चूक तुम्हारी तरफ से रह गई उन्हें समझ पाने में.

धुरी विहीन पिण्ड/तारा/वस्तु उस ब्लैक होल थ्योरी या अंतरिक्ष का हिस्सा होती है,  जो किसी भी नजदीकी गृह के गुरुत्व के दायरे से बाहर हो जाती है, सीधे शब्दों में कहें तो “अस्तित्वहीन”.

समझदार होंगे तो बात की गम्भीरता को समझते हुए स्वयं की एक धुरी को खोजना अभी से ठीक इसी पल से खोजना शुरु कर दोगे, वरना शादी जैसी वैज्ञानिक सामजिक व्यवस्था पर ऊँगली उठाने और अस्तित्वहीन समाज की बुनियाद रखने से तुम बहुत दूर नहीं हो.

हाँ, तुमने सेक्स को परोस कर रख ही दिया है, अब कम से कम अध्यात्म के नाम पर इस पवित्र रिश्ते का बाजारीकरण मत होने दो, इतना अहसान करो आगामी मानवता पर और अपने पवित्र रिश्तों से सृजित होती हुई इस सृष्टि की नई किलकारियों पर.

मत धकेलो जान बूझकर उस अंधे कुंएं में, जहाँ जाकर आज तक कोई भी वापिस नहीं लौटा, समूचा पश्चिम पहले ही अपनी आगामी पीढ़ी को बुरी तरह कुचल चुका है, हाँ वहां की धरती अब बाँझ हो चली है, जब तक स्त्री जागी तब तक उसका अपना अस्तित्व कहीं दूर उससे जा चुका था.

ठीक वही तुम करने में लगे हो, तुम्हारी समूची व्यवस्था पूर्ण रूपेण विज्ञान आधारित है, अतीत पन्ने उलट पलट कर देखोगे तो यदाकदा ही कोई ऋषि या साधु अविवाहित या ब्रम्हचारी नजर आएगा.

यदि कोई ब्रम्हचारी नजर आयेगा तो वह क्रांतिकारी होगा, अपने अन्दर एक आग को खुद ही खुद में समेटे हुए, भीष्म के समान आजीवन प्रतिज्ञा का निर्वहन करते हुए वज्र के समान आभा समेटे हनुमान सा तेज धारण किये, कोई विवेकानंद पूरी दुनिया को अपने आप में हिलाने का साहस लिए इतिहास में नई गाथाएं लिख रहा होगा.

अकेले रहने का शौक मन में रखते हो तो फिर ब्रम्हचर्य की गूढ़ पढ़ाई एक बार जाकर किसी वास्तविक योगी से पढ़ लेना,  वरना अनगिनत तारे अनन्त अंतरिक्ष में विद्यमान हैं, एक तुम भी सही, अस्तित्वहीन.

जो तुम्हें नाम, फेम देने के नाम पर ठग रहे हैं, उनका कितना नाम है, इस दुनिया के किसी ऐसे कोने में जाकर पूछना जहाँ, पेट सिर्फ भोजन की भाषा समझता है, सारी वास्तविकता सामने आ जायेगी.

जिस चकाचौंध में उलझे तुम अपने अनमोल बेशकीमती यौवन को गली गली, चौराहे चौराहे लुटा रहे हो, या नीलाम कर रहे हो, इसी यौवन को समेटकर और सहेजकर कोई बुद्ध होकर हजारों वर्षों पूर्व निकल गया, जिसके नाम के सहारे तुम आज शान्ति खोजने की असफल कोशिश कर रहे हो.

अपना बेशकीमती रस न नालियों में बहाने के बाद जिसका अंत गटर होता है, वह गटर जो आगे जाकर पवित्र नदीयों को भी विषैला करने में तनिक भी परहेज नहीं करता.

मत सम्बल दो, मत प्रोत्साहन दो ऐसे जहरीले विषैले गटरों को, कि यह अध्यात्म रुपी हमारी पवित्र नदियों के पानी को मुंह से लगाने लायक ही न छोड़ें.

धुरी विहीन समाज विश्रृंखल होकर अस्तित्व विहीन हो जाता है, और अस्तित्त्व विहीन समाज से किसी भी प्रकार के सकारात्मक विकास की उम्मीद करना सिर्फ और सिर्फ स्वयं को भ्रम में रखना और छलना ही है.

तुम्हारी सेक्स की जिस आग ने तुम्हें झुल्साकर रखा था, महात्मा ओशो ने अपने जीवन की अंतिम सांस तक तुम्हें उससे निकालने की कोशिश की, और चन्द गटरों के अहंकार ने उस बुद्ध की देशना का बड़ी ही चतुराई और शातिरता से बाजारीकरण कर पवित्र नदियों को भी प्रदूषित करके रख दिया.

धन्य हो तुम और तुम्हारा अध्यात्म, पहले खुद की जलती आग पर काबू पाओ, तब अपने गुरु के शब्दों में छिपी क्रान्ति को देख पाओगे, इससे पहले कतई नहीँ, कतई नहीं.

पश्चिम की वीरान और बंजर धरती भारत के योगियों की बाट जोह रही है, लेकिन अफसोस यहां योगी खोजने से भी नहीं मिल पा रहा.

एक माह के पश्चिम के प्रवास से लौटने के बाद, बात को यहीं से उठाऊंगा, तब तक यदि आपका योग उक्त शब्दों को पढ़ने के बाद तनिक भी जाग्रत होता है तो फैला दीजिये शेयर के एक बटन के प्रयोग  साथ इस एक योगी  सन्देश को हर उस आत्मा तक जो तड़प रही है, एक एक बूँद उस पानी को पाने के लिए जो किसी अमृत से कम नहीँ हैं.

हाँ, हाँ, भारत का योग जाग रहा है, एक स्वाभिमानी योगी के कन्धों पर सवार होकर, भारत का योग जाग रहा है, अंगड़ाई की शुरुआत हो चुकी है, देर आपकी तरफ से है, आपके एक शेयर से वह कसक भी पूरी हो जाएगी.

हाँ यह एक जाग्रत योगी के जिन्दा शब्द हैं, जी लो इन शब्दों को, और बाँट दो जीवन हर एक मृत्यु के भय के आग में झुलसने को मजबूर एक एक विवश और लाचार होती जा रही आत्मा तक.

एक माह की प्रतीक्षा, सिर्फ इसलिये उस पश्चिम से भारत के उस योग को वापिस लौटाकर लाने की कसक दिल में है, जिस पश्चिम ने इस योग को अपने भोग के चश्में से देखने में तनिक भी कोताही नहीं बरती.

सादर प्रणाम!
डॉ. राघव पाठक
खजुराहो

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY