दूसरा और तीसरा प्रहार होने तो दीजिये.. टूटेगा… बहुत कुछ टूटेगा

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मेरे एक फेसबुक मित्र हैं. जाति के कायस्थ हैं. यूपी के.

कायस्थ उत्तरप्रदेश की एक जाति है जो पुरातन काल से, पुरातन माने पौराणिक काल से ही समाज में लेखाकर्म (accounts) का काम करते आये हैं.

[अजित उवाच : भारत की बेरोजगारी नौकरी से नहीं Skill Development और Entrepreneurship से होगी दूर]

अब पौराणिक काल की बात तो बहुत पुरानी हो गयी. सुना है कि मुग़ल काल में भी राज्य में एकाउंट्स और राजस्व (revenue) का पूरा विभाग कायस्थ ही सम्हालते थे.

अब प्रोफेशन की मांग के हिसाब से अकाउंटेंट का पढ़ा लिखा होना अनिवार्य है. सो ये पूरी कायस्थ जाति ही सुशिक्षित रही शुरू से. और इसके साथ ही राज्य की सेवा में रही.

अर्थात कायस्थ लोग ज़्यादातर नौकरी पेशा ही मिलेंगे. पर अब चूँकि समय बदल गया है और पिछले 10-15 सालों में तो कुछ ज़्यादा ही बदल गया है, शिक्षा का प्रसार भी जातीय बंधन तोड़ के बाहर फ़ैल गया है इसलिए कायस्थों के लिए नौकरियां भी कम हो गयी.

नयी पीढी के बच्चे अब स्वरोजगार रत हो गए हैं. उद्यमी (Entrepreuner) हो रहे हैं. सो मेरे मित्र बताने लगे कि हमारी जाति में लोगों में नौकरी के लिए इस हद तक दीवानगी (obsession) है कि लोगबाग दामाद खोजते हैं तो सिर्फ और सिर्फ नौकरी पेशा…

मने लड़का अगर हिम्मत कर के खुद का व्यवसाय कर रहा है, उद्यमी है…. तो बेचारे की शादी न हो…. मने कोई कायस्थ उसे अपनी लड़की देने को राज़ी नहीं.

मने सरकारी नौकरी में चपरासी से लड़की ब्याह देंगे पर ऊंचे लंबे स्मार्ट बिजनेसमैन को नहीं देंगे लड़की…. ये हमारे समाज की सोच है. वो भी किस समाज की? बहुत पढ़े लिखे उन्नत समाज की सोच.

क्या इसे रातों रात बदला जा सकता है?

कल मैंने नौकरी और रोज़गार पर एक लेख लिखा.

उसमें ये बताया था कि मोदी जी की सोच ये है कि वो 125 करोड़ हिंदुस्तानियों को रोजगार-परक शिक्षा, कौशल विकास बोले तो skill development और स्वरोजगार उद्यमिता entrepreunership की ओर मोड़ना चाहते हैं.

इसके लिए उन्होंने मुद्रा बैंक योजना चलायी है जिसमें अब तक लगभग 3 करोड़ से ज़्यादा युवा 50,000 रुपए से ले कर 10 लाख रुपए तक के लोन ले चुके हैं, अपना खुद का रोजगार करने के लिए.

मेरी पोस्ट पढ़ के मेरे एक मित्र ने, जो स्वयं एक बैंक में सीनियर मैनेजर हैं, मेरे inbox में ये message भेजा-

अजीत बाबू किसी एक बैंक ब्रांच से इन रोजगरियों की सूची लीजिये, और उन सबसे मिल आइये।
IRDP भी एक योजना थी। SCP, और SJSRy, SGSRY योजनाएं अभी मरी नहीं हैं।
जमीनी हकीकत देख आइये और फिर कुछ कहिये।
बहुत आनंद आएगा।
आप इस विषय पर अमित शाह के साथ तब नहीं होंगे। ‘

भाई का कहने का आशय ये है कि ऐसी तमाम योजनाएं पहले भी रही हैं पर उनमें जमीनी स्तर पर काम नहीं हुआ और लोगबाग बैंक से लोन ले कर डकार गए.

मैं, भाई की बात से, 100 नहीं बल्कि 200% सहमत हूँ. भारत में आज तक सरकारी योजना के नाम पर सिर्फ लूट ही होती आयी है. लूट हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया था.

सैकड़ों हज़ारों सालों से हमारी संस्कारगत और चरित्रगत भावना और सोच को रातों रात तो नहीं बदला जा सकता. पर हाँ, प्रयास तो किया ही जाना चाहिए. मोदी सैकड़ों हज़ारों सालों की इस जड़ता पर ही तो प्रहार कर रहे हैं. इतने पुराने संस्कार हैं. इतनी जल्दी तो टूटेंगे नहीं.

सड़क किनारे पत्थर तोड़ने वालों को देखा है कभी?

वो एक बड़े से गोल पत्थर पर घन से प्रहार करता है. पूरी ताकत से मारता है.

पत्थर पर कोई फर्क नहीं पड़ता. एक हलकी सी खरोंच सी आती है.

फिर वो दूसरा प्रहार करता है. फिर कुछ नहीं होता. पत्थर जस का तस.

और फिर तीसरा प्रहार…. फिर कुछ नहीं हुआ…..

और फिर चौथा प्रहार….. और पत्थर दो टुकड़ों में टूट जाता है. फिर पांचवां और छठा प्रहार तो बहुत हल्का सा होता है और वो पत्थर कई टुकड़ों में टूट के बिखर जाता है.

ध्यान देने की बात ये कि उस पहले प्रहार में, जब कि हमें लगा कि कुछ नहीं हुआ, सिर्फ एक खरोंच आयी, असल में वो पत्थर टूटा तो था, पर अंदर अंदर टूटा था, बाहर से साबुत दीखता था पर अंदर अंदर टूट रहा था. तीन प्रहार तो उसने सहन किये पर चौथे में बिखर गया.

मोदी जी भारत देश की जड़ता पर प्रहार कर रहे हैं. अभी तो पहला प्रहार है. ऊपर से लगता है कि कुछ नहीं हुआ , पर अंदर अंदर बहुत कुछ टूट रहा है.

दूसरा और तीसरा प्रहार होने तो दीजिये…. टूटेगा…. बहुत कुछ टूटेगा.

चौथे पांचवें और छठे प्रहार की प्रतीक्षा कीजिये.

क्रमशः….

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