करवा चौथ औरतें ही क्यों करें?

फेसबुक पोस्ट पर किसी दो लाइन के स्टेटस को समझाने के लिए हम कई बार कोई काल्पनिक कहानी साथ जोड़ देते हैं…. और लोग उस सन्देश को समझने के बजाय उदाहरण के लिए दी गयी कहानी पर बहस करने लगते हैं…

पंचतंत्र की कहानियाँ, बचपन में दादा दादी से सुनी कहानियाँ, किसी दोस्त से अपने अनुभव की कहानी, किसी सन्देश देती फिल्म की कहानी… यहाँ तक की रामायण और महाभारत में भी कई बार सच्ची घटनाओं को समझाने के लिए कुछ काल्पनिक कहानियाँ जोड़ी गयी हैं…

सत्य नारायण कथा, संतान सप्तमि कथा… बहुत सारी पूजा और त्यौहारों के साथ कुछ कहानियां जुड़ी होती हैं ताकि हम उसके पीछे के सन्देश को आत्मसात करने में सरलता अनुभव करें.

और आज उन कहानियों के पीछे के सन्देश को समझने के बजाय इन रीति रिवाजों के पीछे की उन कहानियों पर ही हम बहस करते हुए नज़र आते हैं…

करवा चौथ का व्रत औरतें ही क्यों करें, पुरुष क्यों नहीं? संतान सप्तमी माँ ही क्यों करें पिता क्यों नहीं? हरतालिका तीज औरतें ही क्यों करें?

नवरात्रि के व्रत तो पुरुष भी करते हैं, सावन के व्रत पुरुष भी करते हैं, शिवरात्रि पर भी कई पुरुष व्रत रखते हैं… तब तो कोई तुलना नहीं की जाती.

आपको विष्णु के पाँव दबाती हुई सिर्फ लक्ष्मी दिखती है, माँ काली के चरणों में पड़े शिव नहीं. आप तब सवाल नहीं उठाते जब दीपावली की पूजा का हक़ सिर्फ पुरुषों को मिला है, औरतों को नहीं.

हमारे यहाँ कई मंदिर ऐसे हैं जहां औरतों को गृह प्रवेश नहीं मिलता, तो कई मंदिर ऐसे भी हैं जहाँ महिलाएं सिर्फ साड़ी पहन कर जा सकती हैं…

इन सारी बातों के पीछे के विज्ञान को समझे बिना केवल कर्मकांड पर सवाल उठाना कहाँ तक जायज़ है? जहाँ तक करवा चौथ का सवाल है, ये विशेषकर पंजाबी सम्प्रदाय में होते थे. आज ज़रूर फैशन के तर्ज़ पर होने लगे हैं, लेकिन यदि उससे उत्सव का माहौल बनता है और औरतें स्वेच्छा से व्रत रखती हैं तो क्या बुरा है.

हाँ जब भी कोई नियम या व्रत किसी पर थोपा जाता है तो व्रत करने और करवाने वाले दोनों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है. आज मैं कोई व्रत नहीं करती और कई बार बिना किसी अवसर के दिन भर सिर्फ पानी पर गुज़ारा करती हूँ.

व्रत, उपवास एक मानसिक अवस्था है. आप दिन भर भूखे रहकर यदि केवल भोजन के समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो उस व्रत का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा. लेकिन आप दोनों समय सात्विक भोजन करते हुए भी “उपवासी” यानि ईशवर के पास होने का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं.

और आप चाहें तो व्रत को एक उत्सव समझकर कर सकते हैं… अपने अपने अनुभव कथा के रूप में संजोकर रख सकते हैं..

इसलिए व्रत और त्यौहार की कथाएँ, कई बार काल्पनिक हो सकती हैं, लेकिन उसके पीछे के सन्देश नहीं… सर्वोच्च सत्ता से जो प्राप्त हुआ है उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए कई बार कथा कहानियों का संबल मिल जाता है…

याद रखियेगा.. हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए भी हम इन्हीं कहानियों के पात्र होने वाले हैं… अब आप उनके लिए क्या सन्देश छोड़ना चाहते हैं यह आप खुद तय करें.

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