नौटँकी गति को प्राप्त होगा मुम्बइया सिनेमा

बहुत साल पहले की बात है… मेरे गाँव से सौ किमी दूरी पर मेरी एक रिश्तेदारी के बगल का गाँव है… भारत नेपाल का बार्डर जिला है… देश के पुराने गाँवो में से एक है…..

कभी किसी समय का सबसे सम्पन्न गांव वही था…. वहाँ का काला-नमक चावल यूरोप तक जाता था… इधर चालीस साल से सारे अपराधी-नशेड़ी-चोर उसी गाँव के हो गए हैं… अनपढ़ और भिखारी भी…

गाँव का नाम नहीं लिख रहा…. नहीं तो कुछ दोस्त नाराज हो जाएंगे… वैसे भी जब बस्ती जाऊंगा तो झगड़ा तय है… लेकिन बचपन में उस गाँव के कुछ लड़के हमारे स्कूल में हमारे साथ पढ़ते थे…! इसलिए थोड़ा नाता महसूस होता है.

अब बहुत का मतलब पचास-साठ साल समझिए…. हुआ ये था कि उस गाँव में ‘नौटंकी कंपनी’ बनाई गई थी… और सारे युवक-बच्चे, जातियाँ उसके प्रभाव में आ गई…. और आस पास नाचने गाने सट्टा बाँध कर जाने लगे…. थोड़ी प्रसिध्दि हुई तो एक मंडली और बन गयी.

देखते ही देखते उस गाँव में पांच छः मंडलिया पूर्वी उत्तर प्रदेश का मनोरंजन करने लग गयी. बिलकुल पिछली शताब्दी के बंगाली नाट्य मंडलियों सरीखों….

यह गाँव भी नचनियों के मामले में खूब फूला-फला….!! एक पीढ़ी तो खूब कमाई-खाई, नाची-गाई पर दूसरी पीढ़ी उसी प्रभाव में आ गई… परिणाम!

ऐसी-ऐसी आदतें लग गईं कि….!!

बहुत लोग नहीं जानते होंगे कि नौटंकी उप्र का लोक-नृत्य है…. पहले गाँव-गाँव, जिला-जिला बहुत पापुलर थी… यहाँ तक कि शादी-विवाह में अगर नौटंकी नहीं बुलाई गई तो मेहमान नाराज हो जाते थे…. मैं ने खुद कई बारातें लौटती देखी है!!

यह नौटंकी नौ-तख्तों का एक स्टेज बना कर की जाती थी…. जिसमें नाचने-गाने के साथ रात में एक ड्रामा पेश किया जाता है… जिसमें गायनपूर्ण डायलॉग (जिसे बहरत कहते हैं) अभिनय और संगीत के साथ पूरा नाटक पेश किया जाता था.

उसमें फ़ूहड़ शब्दकोष से भरा एक जोकर भी होता था… जो अपने डायलॉग और कारनामों से दर्शकों को बीच-बीच में रात-भर हँसाने का काम करता था… नाटक तो चलता ही रहता था.

उसके अलावा कई पुरुष (लड़के) साड़ी, ब्लाउज या लेडीज़ कपड़ों में (बीच-बीच में) नाचते-गाते थे.. (चूंकि महिलाओं का मिलना और इलाकों में जाकर सुरक्षित वापस आना कठिन था)…

अमूमन बदमाश और दबंग ग्रामीण उन पर पैसे उछालते…. और शुक्रिया अदा कराते (एक अश्लील टाइप का इशारा)… इस फूहड़ता ने एक सामाजिक बुराई को जन्म दिया…. उसने ही नौटंकी कला को ख़त्म किया …!

समाज का ‘बड़ा वर्ग’ उस गन्दगी से अपने बाल-बच्चों को बचाने का भरपूर-भरसक प्रयत्न करने लगा…. लोग बजाए नौटँकी के साफ-सुथरा बनकर आने वाली फिल्मों को देखने में पैसा खर्चने लगे.

धीरे-धीरे नौटँकी, समाज की एक बेगानी गन्दी वस्तु में बदल गयी.

जब तक उसमें कला-बहरत-लोकभाषा-बिरहा-सोहर… संस्कार, महाभारत, रामायण और हरीशचंद्र जैसे पौराणिक शिक्षाप्रद पाठ दिखाये/ सिखाये जाते थे… शिक्षा/संस्कार ही उसका मौलिक तत्व-उद्देश्य था…. तब तक ठीक चला…

जैसे ही फिल्मों का प्रभाव और सेखुलरिज्म घुसा… गाँव के गाँव के बर्बाद हो जाने लगे… क्योंकि रात भर जो नौटंकी देखेगा… वो दिन भर किसानी कैसे करेगा, वह भी इन फिल्मी संस्कारों के साथ.. लड़के सुबह वही करने लगे जो उन्होंने नौटंकी में देखा होता!

बाद में सभ्रांत घरों के लोग अवॉइड करने लगे… लेकिन ऐसा अवॉइड कि रात में पूरा घर छिप-छिपा कर वहाँ मौजूद होता.. बाद में कठोरता से लोग न जाने का प्रतिबंध अघोषित रूप से खुद ही लगाने लगे…

जल्द ही वह एक सामाजिक बुराई का प्रतिबिंब बन गई… अब पूरे उत्तर प्रदेश में इक्का दुक्का ही कंपनियां बची है… जो शायद ही कही देखी जाती हो.!!

लेकिन वह गाँव जो कभी युद्धों में अपने शौर्य और विजय के लिए जाना जाता था… नेपाल जिस गाँव की वीरता की वजह से कभी गुलाम नहीं बना…. पुराने बस्ती जिले का सबसे पढ़ा-लिखा, सबसे प्रभावी-सबसे सम्पन्न गाँव था … ‘ऊ’ पूरा बर्बाद हो गया… एक नचनिया-भांड कंपनी बनाई के पूरे गांवन को हिजड़ा बनने का शौक लगाय दिहे मूरख!!

सारे बुजुर्गो के सामने ही…. उस गाँव में अब आसपास के लोग-बाग़… ‘विशिष्ट’ प्रकार के पुरुषों के साथ यौन-सुख पाने के लिए वहाँ जाने लगे… उस गाँव की इमेज भी वैसी ही बन गई….

तब से आज तक हम यही मुहावरा ‘गंडुवन का गाँव’ सुनते आ रहे हैं.

आज भी हमारे यहां कहावत है ‘ज्यादा नौटंकी न कर नही ‘गंडुआ’ (होमो-सेक्सुअल) हो जाएगा…..!!

चलते-चलते बता दूँ, कला के नाम पर कलंक बन चुकी ‘नौटंकी’ 1400 साल पुराना नृत्य था… जो मिट गयी…

आज बहुत साफ-साफ अनुराग कश्यप, करन जौहर, महेश भट्ट-हकले-मंगले-ठिगने व ओमपूरी जैसे नचनियों से बता रहा हूँ… देश-संस्कृति और संस्कार के मामले में ज्यादा नौटंकी करोगे तो…..(खुदै समझ लीजिए)..!!!

फिल्में तो महज सौ साल से भारत में है और नौटंकी 14 सौ साला थी… मिटते देर नहीं लगी…. तुम्हे तो पता भी न लगेगा कि ख़तम हो गए.

बेबीलोन-एथेंस, फिर रोम, फिर काहिरा कभी नाट्य कला के प्राचीनतम धाम जैसा था, उनकी यौन-प्रवृत्तियों की वजह से कोई ताकने वाला भी न बचा…!!

दुनियां का सिरमौर रहा लन्दन और यूरोप का सिनेमा अब हॉलीवुड में बनता है…. यूरोपियन साहित्य का केंद्र अब अमेरिका है.

मास्को भी कभी कूड़ा-साहित्य उत्सर्जन की नगरी थी… क्या और क्यों हुआ? ताशकंद कला-साहित्य और रूसी फिल्मों की राजधानी अब कहाँ है…!!

कभी साउथ एशिया भर में कलकत्ता साहित्य/ लेखन और कला का सबसे बड़ा केंद्र था. पता है न किस वजह से सबसे बड़ा क्या, सबसे छोटा भी नही रह गया??

लाहौर भी कभी फिल्म उत्पादन की बड़ी मंडी थी…. अब कोई उधर मुंह करके….!!!

आदत-चरित्र और सोच न सुधरी तो तुम भी बालू-ईंट-सीमेंट की दीवाल बस रह जाओगे…. कोई वहां उस काम के लिए भी अब न जाएगा, जिस काम के लिए बाकी के गाँव वाले उस नौटंकी-कम्पनी के गाँव लोग जाते थे.

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