परवरिश : सिर्फ आदर्श बेटी नहीं, आदर्श संतान के रूप में पालिए

शालू और श्रेया के पिता सगे भाई हैं.
एक ही घर में दोनों का जन्म हुआ.साथ पले बढे. एक ही स्कूल में शिक्षा-दीक्षा मिली. बड़े हुए कॉलेज में भी एक ही विषय से उच्च शिक्षा ली फिर दोनों सरकारी नौकर बन गए. शादी हुई और गृहस्थी अलग हुई.
दोनों के घर में पुत्रों का जन्म हुआ और एक-एक कन्या के पिता भी बने.
यहाँ तक सब कुछ सामान्य है. ऐसा लगभग प्रत्येक घर में होता ही है.
कहानी शुरू होती है शालू और श्रेया के बचपन से.
शालू और श्रेया हमउम्र हैं. बस एक साल का अंतर है दोनों की उम्र में. इसलिए एक ही कालखंड में उनका बचपन,तरुणावस्था और यौवन बीता.
शालू की परवरिश परम्परागत सोच के साथ की गयी……होश सँभालने के पहले से ही उसको समझाना शुरू कर दिया गया,तुमको ससुराल जाना है,सास-ससुर और ससुराल वालों की सेवा करनी है.
यूँ समझ लीजिए कि अप्रत्यक्ष रूप से उसके मस्तिष्क में यह बिठा दिया गया. तुम्हारे जन्म लेने का उद्देश्य शादी के बाद शुरू होगा और उसकी तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है.
इन सबके बाद भी हर बेटी की तरह शालू भी अपने पिता की लाडली तो थी ही,भाइयों के आँख का तारा भी थी,जैसा प्रत्येक भारतीय परिवार में होता है.
 
इधर श्रेया की परवरिश एक संतान की तरह से हो रही थी उसके माता-पिता ने बेटी के रूप में जन्म लेने का विशेष उद्देश्य उसको नहीं बताया था. जैसे उसके भाइयों का पालन पोषण हो रहा था वैसा ही उसका भी हो रहा था नतीजा ससुराल जाने की कोई तैयारी उसको नहीं करनी पड़ रही थी.
खेल-कूद,पढाई और पढाई करके नौकरी करने को ही श्रेया अपने जीवन का उद्देश्य समझती थी.
लड़की होने के कारण लड़कियों के नैसर्गिक गुण तो थे ही अतः घरेलू काम,जैसे घर की साफ़-सफाई,साज-सज्जा खाना बनाने में भी दिलचस्पी थी और जब तब इन कामों को अपनी मर्ज़ी से करती रहती थी.
 
समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा.
शालू और श्रेया शादी योग्य हो गयीं . घर वालों ने अपनी समझ से योग्य वर का चुनाव करके शादी कर दी.
शालू को विदाई के साथ डोली में जाने और अर्थी में ही ससुराल से निकलने का महामंत्र भी मिला.
श्रेया को कहा गया कि तुम अब बहु की जिम्मेदारी निभाने जा रही हो और जब भी तुमको हमारी आवश्यकता होगी हम हमेशा तुम्हारे साथ खड़े रहेंगे.
 
शालू की माँ अक्सर अपनी देवरानी को ताना दिया करती थीं,बेटी को सही शिक्षा नहीं देने का. उनका कहना था कि कितना भी पढ़ लिख जाए बेटी…….ससुराल जाने के बाद तो खाना बनाना और घर के काम करने की कला ही काम आनी है.
बेटी को बेटे की तरह नहीं पाला जाना चाहिए.
श्रेया की माँ उनकी बात से चिंतित हो जाती थी पर उसके पिता समझा बुझा कर उनको सामान्य कर लेते थे.
उनको अपनी परवरिश और बेटी की योग्यता पर भरोसा था कोई अनावश्यक दबाव नहीं पड़ने दिया श्रेया पर.
 
शादी के बाद दोनों को जीवन की नई चुनौतियों से सामना करना पड़ा.
शालू तो ससुराल की पूरी तैयारी से गयी थी पर श्रेया ने शादी से पहले तक पढाई और कैरियर से इतर कुछ सोचा ही नहीं था.
 
शालू के लिए घर की साफ़-सफाई,खाना बनाना,सिलाई-कढ़ाई और घर वालों की सेवा करना ही महत्वपूर्ण था. इससे ज्यादा उसने कभी नहीं सोचा. शादी हो गयी ऐसे परिवार में जहाँ बौद्धिक क्षमता को महत्त्व दिया जाता था.पति और ससुर व्यख्याता थे सास भी विदुषी थी. उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते थे.
इस माहौल में शालू असहज हो जाती थी जब पूरा परिवार किसी विषय पर चर्चा कर रहा होता था तब वो मूक दर्शक बनी बैठी होती या किचन में व्यस्त हो जाती.
उसके इस व्यवहार से पति के साथ सामंजस्य बिठाने में मुश्किलें आने लगी.
शालू अपने प्रत्येक काम के लिए किसी न किसी पर निर्भर रहती थी.
घर से बाहर के काम करने के लिए अकेले जाने के नाम पर उसके हाथ-पैर फूलने लगते थे…..ऐसा नहीं था कि वो कर नहीं सकती थी पर पिता और भाइयों पर निर्भर रहने के कारण उसके अंदर आत्म विश्वास की कमी थी.
 
श्रेया की शादी ऐसे परिवार में हुई जहाँ दो बहुएँ पहले से थी. दोनों गृहणी थीं और ये नौकरीपेशा. इसके सामने चुनौती थी दोनों के मान-सम्मान को ठेस पहुचाए बिना खुद को साबित करने की.
घर के काम की विशेषज्ञ तो थी नहीं पर उसने अपने आपको नए माहौल के अनुरूप ढालने के लिए अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए जिठानियों से आग्रह किया कि घर के काम-काज सिखने में उसकी मदद करें.
लगन के साथ किए गए ईमानदार प्रयास के फलस्वरूप जल्दी ही उसने ससुराल के माहौल में अपने आपको स्थापित कर लिया.
फिर भी उसकी उच्च शिक्षा और नौकरी कई उपयोगिता पर गाहे-बगाहे सास प्रश्न चिन्ह लगा ही देती थीं.
आई टी सेक्टर की मंदी के दौर में उसके सॉफ्टवेयर इंजीनयर पति की नौकरी चली गयी तब छह महीनों तक उसने ही घर संभाला.
घर और बाहर के बहुत से काम वो संभाल लेती थी.
घर के पुरुष भी उसके भरोसे बहुत से काम छोड़ देते थे जिनको वो बखूबी निभाती थी क्योंकि मायके में भी ऐसे काम किया करती थी. उसके मायके में उसके और भाइयों के काम में बँटवारा नहीं किया गया था .
अब सास ने भी ताना देना छोड़ दिया और अपनी पोतियों को भी उच्च शिक्षा दिलाने की हिमायत करने लगीं.
 
शालू परेशान थी क्योंकि समझ नहीं पा रही थी कि पति और सास-ससुर से बढ़ती दूरी को कैसे कम करे.
उसकी समझ के अनुसार वो सबकुछ कर रही थी जो एक आदर्श बहु को करना चाहिए फिर भी कोई खुश नहीं था.
समझ नहीं पा रही थी कि आखिर चूक कहाँ हो रही है.
 
अपने आपको असहाय महसूस करती थी . भाभियाँ कहीं ताना न देने लगे इसलिए मायके वालों से भी अपनी परेशानी नहीं बताना चाहती थी.
इस वजह से अवसाद में रहने लगी.
 
दोनों की कहानी जानने के बाद प्रश्न उठता है कि बेटी का पालन-पोषण करने का सही तरीका कौन सा था ?
 
शालू के माता-पिता ने लड़की को लड़की की तरह की पाला.
श्रेया के माता-पिता ने उसको एक उनमुक्त वातावरण दिया लड़के लड़की में भेद किये बिना पाला.
शालू के माता-पिता का या श्रेया के माता-पिता का ??

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