करवा चौथ का चाँद

नेहा चंद्र देव के दर्शन करने पार्क में जा रही थी. आज करवा चौथ था न, इसलिए.
रास्ते में उसे फरीदा मिली. दोनों दोस्त मिलते ही बातों में तल्लीन हो गईं. अर्णव ने घूर कर नेहा को देखा. नेहा ने उसे थोड़ा रुकने को बोला.

‘क्यों रखती है यह व्रत? तू तो कह रही थी कि अर्णव तुझे मारता है? वो मर्द ही क्या जो बीवी पर हाथ उठाए?’ फरीदा ने कहा.
‘क्या करें परंपरा है, फिर खर्च भी तो यही उठाते हैं न? वैसे इतने बुरे भी नहीं हैं. बस कभी-कभी…’ अर्णव उसे घूर कर देख रहा था.

‘अच्छा चलती हूँ, फिर मिलते हैं कभी. अभी जल्दी में हूँ.’

नियति के खेल निराले हैं. पांच महीने बाद वे दोनों एक बार फिर टकराईं.

फरीदा का चेहरा बदल कर बदरंग हो चुका था.

‘अरे क्या हुआ तुझे?’ नेहा ने पूछा.

‘तू उस दिन मिली थी न? मुझे लगा मैं भी देखूं उस चाँद में ऐसा क्या है जो तुम लोग उसकी पूजा करते हो. बड़ा ही मनहूस चाँद था. घर पहुंची तो जमाल ने न जाने क्या सोच कर तलाक दे दिया. दो बार तक मुझे लगा मज़ाक कर रहे हैं, लेकिन वे सीरियस थे. बाद में पता चला कि उनका किसी और से चक्कर चल रहा था.’ फरीदा बोली.

‘फिर’ नेहा ने पूछा.

‘फिर क्या? तलाक़ मुकम्मल हो गया.’ फरीदा ने जवाब दिया.

‘तब क्या कर रही है आज कल?’ नेहा ने कहा.

‘काम ढूंढ रही हूँ… जीना नहीं चाहती, सच में उनकी याद आती है.’ फरीदा रोने को हुई.

‘जाने दे तू क्यों रोती है? अच्छा है ऐसे आदमी से पीछा छूटा.’ नेहा ने ढांढस बंधाया.

‘कैसा भी था, कम से कम कमा कर तो लाता था…?’ फरीदा ने अपना पक्ष रखा.

‘ऐसे कैसे? तू केस कर, गुज़ारा मांग.’ नेहा आवेशित हुई.
‘कुछ न होगा.’ फरीदा ने कहा.
‘क्यों?’ नेहा ने फिर पूछा.
‘परंपरा है न. खैर तू बता अर्णव कैसा है?’ फरीदा ने कहा.

‘अरे उन्हें करवा चौथ के अगले दिन हार्ट अटैक हुआ था. अब ठीक हैं. और पता है? अब तो गुस्सा भी कम होते हैं.’ नेहा की आँखों में चमक थी.

अलग होते समय दोनों को करवा चौथ का चाँद याद आ रहा था.

– उजबक देहाती

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