बायोपिक सिनेमा, समाज और आदर्श : पृथ्वीराज, महाराणा फेसबुक पे टहलते हैं और जोधा अकबर मल्टीप्लेक्स में

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सुना है नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ‘मन्टो’ की भूमिका निभाने वाले हैं. निस्संदेह नवाज़ुद्दीन मियां बेहतरीन अदाकार हैं परन्तु उड़ी हमले के बाद की गयी सर्जिकल स्ट्राइक पर उनकी प्रतिक्रिया बड़ी विचित्र प्रतीत हुई जब उन्होंने कह दिया कि ये तो सरकार का काम है सरकार ही जाने.

ओम पुरी और मीता वशिष्ठ ने तो टीवी चैनल पर हद ही कर दी. हालांकि बाद में ओम पुरी घड़ियाली आंसू बहाते दिखे तो मीता ने वेबसाइट पर लेख लिख कर स्पष्टीकरण दिया. समाज रूपी इकाई की अदा, उसमें बसर करने वाले अदाकार और उनकी अदाकारी को गहरे प्रभावित करने में बॉलीवुड की महती भूमिका रही है.

जब भी कोई बायोपिक बनती है तब प्रश्न उठता है कि हम किस चरित्र को समाज का चेहरा मानते हैं और यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो सिनेमा जो कि रूपहले परदे पर साहित्य की ही चलचित्र प्रस्तुति है वह किस हद तक समाज के आदर्श गढ़ने में अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करता है.

इतिहास उठा कर देख लीजिए समाज को हमेशा आदर्शों की जरूरत पड़ी है और उन आदर्शों से ही प्रेरित हो जनसामान्य ने कलम, तराजू और तलवार तीनों उठाई है. एक किताब, सिनेमा का एक दृश्य, एक विचार, एक डायलॉग किसी व्यक्ति को इस हद तक प्रभावित कर देता है कि उसका जीवन बदल जाता है.

हमने अपने सिनेमा में ‘भारत माता’ को कम ‘मदर इंडिया’ को ज्यादा दिखाया है इसीलिए कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसे चिरकुट पैदा हुए हैं. गुप्त काल जो स्वर्णिम था उसके बनिस्पत मुग़ल-ए-आज़म को ज्यादा तरजीह दी है. इस लिहाज से प्रस्तुतिकरण भी मायने रखता है.

पूरी दुनिया में जाकर My name is Khan कहने वाले शाहरुख खान और करण जौहर के दौर से पचास साल पहले सन् 1946 में वी शांताराम ने सम्भवतः पहली बार विदेशी परिप्रेक्ष्य को ले कर फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम था ‘डॉ कोटनीस की अमर कहानी’ और वह विदेश अमरीका नहीं बल्कि पड़ोसी मुल्क चीन था.

कुछ साल पहले जब एम एफ हुसैन की पेंटिंग पर विरोध हो रहा था तो NDTV चैनल पर पुरुषोत्तम अग्रवाल और (शायद) सुधीर तैलंग चर्चा कर रहे थे. उनका कहना था कि आप अपनी भावनाओं को ठेस क्यों पहुँचने देते हैं आप उस तरफ मत देखिये जिस तरफ देवी देवताओं के नग्न चित्र बनाये जाते हैं.

अर्थ यही था कि जो हो रहा है उसको मत देखो आँख मूँद लो तो तुम्हारी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचेगी. प्रो अग्रवाल ने कलात्मक अभिव्यक्ति को जनसामान्य की भावना से तो जोड़ दिया लेकिन बड़ी चालाकी से इस तथ्य को गोल कर गए कि इतिहास में किसी भी क्रांतिकारी दौर में उपजे सार्थक रचनात्मक समाज के उत्थान में संगीत, साहित्य, कला इन सबकी आदर्श और उत्प्रेरक रूपी भूमिका रही है.

फ्रांसीसी क्रांति के समय गाया जाने वाला गीत ‘ला मार्से’ आज उनका राष्ट्रगान है. हमनें भी तो बंकिम बाबू से वन्दे मातरम् सीखा. राष्ट्र की अवधारणा ऋग्वेद में है. ये मार्क्सवादी लोग कह सकते हैं कि आज देश में क्रांति की कोई ऐसी आवश्यकता नहीं है लेकिन हंसी तब आती है जब ये लगभग सौ बरस पहले रूस में हुए तख्तापलट को ‘क्रांति’ की संज्ञा देते हैं.

इस दृष्टि से हाल ही में आई कुछ फिल्मों को देखिये. क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर पर अभी तक फ़िल्म नहीं बनी. भारतीय टीम के पहले कप्तान कर्नल सी के नायुडू का नाम लोग भूल गए हैं लेकिन मैच फिक्सिंग करने के उपरांत खुद को मुसलमान ‘victimhood’ का शिकार बताने वाले मुहम्मद अज़हरुद्दीन पर सिनेमा बन गया.

पहले के ज़माने में पौराणिक कथानक पर भी फिल्में बनती थीं. हॉलीवुड ने मूसा को डंडे से समन्दर के दो फाड़ करते कई बार दिखाया है लेकिन हमारे यहाँ बॉलीवुड को दिनकर के राम से कोई मतलब नहीं है. पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप फेसबुक पे टहलते हैं और जोधा अकबर मल्टीप्लेक्स में. अब तो सिनेमा का टाइटल ‘ग़ज़नी’ रखा जाता है और फ़िल्म में उसके आगे ‘धर्मात्मा’ जोड़ दिया जाता है.

बॉलीवुड ये भी नहीं कह सकता कि उसे समाज के प्रति ज़िम्मेदारी की याद दिला कर साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है. हिन्दू बहुल देश भारत को 1971 की जंग में जीत दिलाने वाले सेनानायक हिन्दू नहीं पारसी और यहूदी थे.

मजे की बात देखिये कि पाकिस्तान की जेल में बन्द कैदियों पर खूब फिल्में बनी, ताजा उदाहरण ‘सरबजीत’ का है परंतु लोगों को ये पता तक नहीं है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी युद्ध में मिली सबसे बड़ी विजय के नायक फील्ड मार्शल मानेकशॉ और लेफ्टिनेंट जनरल जैकब पर कभी सिनेमा नहीं बना. कुछ दिन बाद ही चन्दन तस्कर वीरप्पन पर बनी फ़िल्म रिलीज़ होने वाली है.

शरदिंदु बंदोपाध्याय द्वारा रचित किरदार ब्योमकेश बक्शी पर दिबाकर बनर्जी ने बेहतरीन पिक्चर बनाई थी. इस चरित्र की समाज में क्या सार्थकता है इस पर मैंने आलेख लिखा था. प्रश्न ये है कि हम देवदास जैसे रोंदू चरित्र पर फ़िल्म बनाते थकते नहीं हैं तो नायब सूबेदार बाना सिंह या लांस नायक हनमंथप्पा पर सिनेमा क्यों नहीं बनाते?

ध्यान दीजियेगा LoC कारगिल जैसी फिल्में युद्ध आधारित थीं, चरित्र आधारित नहीं थी. मानस पटल पर घटनाओं से ज्यादा प्रभाव चरित्र का पड़ता है. मुम्बई बम धमाके पर बनी फ़िल्म मुम्बई मेरी जान के सभी किरदार और 26/11 पर बनी फ़िल्म में नाना पाटेकर कसाब को लतियाते और गरियाते नज़र आते हैं. यह सीन दिखाता है कि हमारे समाज में समस्याओं का अम्बार है जिससे हम कभी उबर नहीं सकते और एक दिन हमें A Wednesday का आम आदमी बनना होगा क्योंकि हमारे पास आदर्श या नायक नहीं हैं.

लेखक बिरादरी को ही दिखाने का मन है तो क्या ये जरूरी है कि सआदत हसन मन्टो पर फ़िल्म बनाई जाए? जीवन के अंतिम समय में तिरुपति मन्दिर के सामने रश्मिरथी का पाठ करने वाले दिनकर या फिर निराला, प्रेमचंद जैसे साहित्यिक चरित्रों पर सिनेमा क्यों नहीं बनता?

मारियो पुज़ो से ही प्रेरणा ली जाए और अपने देश की मिट्टी के लाल भुला दिए जाएँ ये कहाँ की कुव्वत है? बहुत जोर लगा कर महेंद्र सिंह धोनी पर बायोपिक बनाई गयी है. इसके पीछे भी एक कारण है. धोनी के सितारे अभी चमक रहे हैं इसलिए वे कमाई का अच्छा ज़रिया हैं.

भगत सिंह को भी उठाया गया है वह भी ऐसे समय जब किताब में उन्हें आतंकवादी लिखा जाता है और मंगल पांडे पर तो प्रामाणिक दस्तावेज ही नहीं हैं. यह अलग बात है कि नेशनल बुक ट्रस्ट ने बिपन चन्द्रा की किताब छापने से मना कर दिया है जिसमें भगत सिंह को आतंकवादी लिखा गया था. अब बिपन दा के चेले ‘frontline’ मैगज़ीन में revolutionary terrorist का अर्थ समझाते फिर रहे हैं.

रिलायंस जैसी कम्पनी जो लाभ कमाने के लिए उपभोक्ता का खून चूसने पर उतर आये, तेल के कुंओं पर गैर कानूनी ढंग से कब्जा कर ले उसे बनाने वाले अम्बानी पर फ़िल्म बन सकती है लेकिन जमशेत जी टाटा जिन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान और टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी बनाई उनके जीवन पर सिनेमा नहीं बनाया जाता.

सच्चे industrialist टाटा थे अम्बानी नहीं. ये लोग दिन रात नारी की देह पर चिल्लाते हैं तो अब तक तस्लीमा नसरीन पर पिक्चर क्यों नहीं बनाई? थोड़ा इंटरनेशनल लुक चाहिये तो बांग्लादेश लांघ के आंग सान सू की से मिल आओ म्यांमार बगल में तो हई है कौन बड़ा प्रशांत महासागर के पार जाना है.

आमिर खान ने 3 Idiot बनाई लेकिन इस देश में कभी किसी वैज्ञानिक पर पिक्चर नहीं बनी जो हाई स्कूल इंटर के बच्चों को प्रेरित कर सके. गणित के नोबेल माने जाने वाले पुरस्कार ‘फील्ड्स मेडल’ विजेता भारतीय मूल के प्रो मन्जुल भार्गव रामानुजन पर बनी फ़िल्म ‘Man who knew Infinity’ के एसोसिएट प्रोड्यूसर हैं लेकिन वितरकों और मार्केटिंग वालों ने ये नहीं सोचा कि जब जंगल बुक और कुंगफू पांडा हिंदी में डब हो सकती है तो रामानुजन पर बनी इस फ़िल्म को भी हिंदी में छोटे शहरों में रिलीज़ किया जाए.

वीरप्पन, अज़हर, और मन्टो देश के युवाओं का कितना भला करेंगे इस पर विचार कीजिए. जो चलता है वही दिखता है ये बॉलीवुड का ‘जुमला’ है. दरअसल हमें जो दिखाया जाता है हम उसी को ढोने के आदी हो चुके हैं. इस मानसिकता से उबरिये.

जब बिकाऊ मीडिया को औकात बताई जा सकती है तो बॉलीवुड को भी सबक सिखाने का वक़्त आ गया है. जब सारे संसाधन राष्ट्र हित में योगदान देंगे तब समग्र परिवेश सुधरेगा. कला साहित्य सिनेमा के लोग राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व से भाग नहीं सकते.

इस समाज का पैसा और अनाज खाते हो तो आपका समाज के प्रति कुछ दायित्व भी बनता है. चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग ये कह के बेवक़ूफ़ बनाना छोड़ो.

सन् 2011 में छपे बी रमन के एक लेख के अनुसार अरब से पैसा दाऊद के पास आता है जो मुम्बई में फ़िल्म इंडस्ट्री में अभी भी लगता है. अरब की फंडिंग से भारत में सिनेमा नहीं चलेगा. तुम सिनेमा के कलाकार लोग बुद्धिजीवी नहीं होते तो कम से कम परजीवी बन के खून मत चूसो.

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