क्योंकि हम हिन्दुस्तान है साहब, इस्लामिक देश नहीं

दर्ज़न भर से ज़्यादा मुस्लिम देशो में अगर किसी मौलवी के इस्लाम में कोई गिरावट दर्ज़ नहीं हुयी है… जहाँ तिहरे तलाक़ जैसी मूर्खतापूर्ण व्यवस्था पर बैन है… तो फिर कैसे इस ग़ैर-इस्लामिक मुल्क़ के मुस्लिमों का इस्लाम खतरे में आ रहा है..!!!???!!!

और शरीयत के नाम का रोना रोने वाले तमाम आलिमोँ से ये भी अपेक्षा है कि वो बताएं की चोरी पर हाथ काटने या जिन्हा (रेप) करने वाले का शिश्न काटने की अरबी व्यवस्था की मांग भारत के मुस्तकीम समाज के लिए भी क्यूँ नही उठाते हैं….??

तब आपको मानवता से भरी भारतीय दण्ड संहिता याद आती है जो देश के गद्दार मो. याक़ूब मेनन को फांसी से बचाने के लिए रात 2 बजे भी सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच लगवाने की छूट देती है..!!!

अब ये हाथ काटने, आँख फोड़ने, शिश्न काटने जैसे अमानवीय यातनापूर्ण सजाएँ भी शरीयत है ना साहब… और इसके अनुपालन ना होने से कोई कम इस्लामिक तो नहीं हो गया देश में..!! या आप अपना दोगला चरित्र उजागर कर रहे हैं और अपनी सहूलियत के हिसाब से शरिया के नियम चुन चुन के अपने ऊपर लागू कर रहे हैं..???

एक और बात…. जिस पैग़म्बर साहब के बारे में मुझे मालुमात है…. वे अपनी पत्नी ख़दीजा जो बड़ा व्यापार चलाती थीं, उनके यहां मुलाज़िम थे एक… फिर ज़िक्र आता है कि उनके परिवार की अन्य स्त्रियां भी तुर्की से लेकर दूर मोरक्को… मिस्र देश तक का व्यापार सम्भालती थीं… उन दिनों मुहम्मद साहब ने कहा कि महिलाओं को एक दर्ज़ा ऊपर का हासिल है…

और आज का अरब देश देखे जो शरीयत का दम्भ भरता है वहां औरतें गाड़ी नहीं चला सकती, वोट नहीं दे सकती, कहीं जा नहीं सकती अपनी मर्ज़ी से… और अकेले व्यापार तो उनके सपनों में भी नहीं आता होगा…

ऐसे में सही इस्लाम क्या है… और महिलाओं की ज़मीनी हालत क्या है, क्यूँ है… ऐसे विषयों पर जानकार बहस करें… समाधान निकालें…!

अव्वल तो इस देश में इस्लाम आयातित धर्म रहा… इस्लाम का फ़ैलाव क्यूँ और कैसे सम्भव हुआ ये भी किसी भी भाषा में उपलब्ध इतिहास की क़िताबों में दर्ज़ है. मगर सबसे ख़ूबसूरत बात भारतीय मुस्लिमों में ये हैं कि वे भाईचारे आधार पर खड़े एक मज़हब के कारण ही नहीं, अपनी अंदर की भारतीयता के कारण भी दुनिया के अन्यान्य सभी मुस्लिम मुल्कों से ज्यादा आज़ाद, ख़ुशनुमा और अमन से ज़िन्दगी जी रहे हैं…!!! और साहब बाकी राजनैतिक कारकों को समाज में मनभेद या मतभेद के रूप में पनपने ना दें..!!

अगर शरीयत इसे मान्य ना भी करे तो भी भारतीयता इस मान्यता देती है कि तिहरे तलाक़ की व्यवस्था का अब अंत हो जाना चाहिए..!!!

और इतिहास गवाह है कि किसी एक प्रोपगेंडा के जुड़ने या निकलने से एक समूचा धर्म खतरे में नहीं पड़ा करता..!! लेकिन इस्लाम जो शमशीर के साए तले फैला फुला है… वो इतनी दहशत में क्यूँ आ जाता है… ये उसकी बुनियाद में जा कर तलाशने का विषय है.

अगर मुस्लिम विचारक ऐसा करने में देर करें या असफल रहे तो वाक़ई इसमें सबसे बड़ा नुक़सान मुस्लिम समाज और इस्लाम के मानने वालों का ही है..!
पूरे विश्व में आज इस्लाम जो टूटता जा रहा है… उसका कारण भी यही है…
तार्किक बातों की कमी… कट्टरवाद… लकीर का फ़कीर होना… और लचीलेपन की कमी… उसके विखंडन का कारण साबित हो रही है..!!

शुक्र है ऊपरवाले का हमारे यहां इस्लाम के सबसे ज्यादा फ़िरके अमन ओ चैन से हैं. यहां सूफ़ी की तान, देवबंदी की अज़ान, सुन्नी शिया का मान और बोहरी की पहचान. कुछ भी खतरे में नही..!!!

यह सब संभव हुआ…. क्योंकि हम सब भारतीयता के सूत्र में पिरोये हुए हैं… और कहीं न कहीं सनातन परम्परा के उसूल हमारे डीएनए में आज भी हैं… हम अनेक में उस एक हो देखने वाली क़ौम हैं.. हम मरे हुए नहीं …हम ज़िंदा क़ौम हैं.. हम हिन्दुस्तान है साहब..!!!

– सारांश गौतम

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