Daniel Kale : आज़ाद हिन्द फ़ौज के एक जासूस-सिपाही का गुमनामी के अँधेरे में ही दुनिया से चले जाना

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की बनायीं आजाद हिंद फौज के वयोवृद्ध महत्पूर्ण जासूस – सिपाही डैनियल काले का लंबी बीमारी के बाद कोल्हापुर में निधन हो गया. काले से मेरी मुलाकात 1994 में नवभारत टाइम्स के लिए नेताजी पर एक विशेष रिपोर्ट लिखने के दौरान 7, जन्तर- मन्तर-दिल्ली में अखिल भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी संगठन के कार्यालय में स्वतन्त्रता सेनानी शीलभद्र याजी और वीएल सुंदर राव तथा नेताजी रिसर्च फाउंडेशन ( रूपनगर – पंजाब) के तत्कालीन चेयरमैन वीपी सैनी के साथ हुई थी, वे भी नेताजी के सहयोगी रहे थे.

कोल्हापुर जिले के पन्हाला तहसील में सितंबर-1920 में जन्मे काले , 1942 में रासबिहारी बोस इंडियन इंडिपेंडेंस लीग में शामिल हुए थे. यही लीग बाद में आजाद हिंद फौज में शामिल हो गयी थी और जिसने काले को भारत-बर्मा की सीमा पर जासूसी के लिए विशेषरूप से भारत में घुसने के लिए महत्वपूर्ण जानकारियों को एकत्र करने को तैनात किया था.
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फिर ‘काले आज़ाद हिन्द फौज के ” गुप्तचर सेवा समूह ” का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए थे, जो खुफिया सूचनाएं इकट्ठी करता था और ये गुप्त सूचनायें आजाद हिन्द फौज के नेतृत्व को आगामी रणनीति के लिए भेजता था. इसका उन दिनों महत्व इसलिए था क्योकि आजाद हिन्द फ़ौज ने इसी जगह से भारत में प्रवेश करना था ,ऐसा उन्होंने मुझसे मुलाकात में बताया था.

उन्होंने उस मुलाकात में आजाद हिंद फौज की कुछ गुप्त कहानी-किस्से बताये और कहा था कि वे ये सिर्फ इन्हें कुछ चुनिन्दा पत्रकारों या नेताजी परिवार के लोगो को बताते थे, जो कभी नहीं सुने गए हो. उनके किस्से और घटनाओं के कई ब्योरों ने उस जमाने के अनेक गुप्त रहस्यों को प्रकट किया, जब आज़ाद हिन्द फ़ौज बर्मा के रास्ते भारत में प्रवेश करने को तैयार थी और उसके बाद की पूरे देश में क्या योजना थी.

नेताजी की मृत्यु के संबंध में उनका विचार एकदम उस समय के अपने सभी साथियों से उलट था और वे उस समय तक नेताजी को जीवित ही मानते थे. इसके लिए उनके पास कुछ अकाट्य तर्क भी थे, जो सबूतों से पुख्ता वे बताते थे.

अक्सर उनके पास देश के ख़ुफ़िया सेवा या बंगाल सीआईडी के अधिकारी जाया करते थे लेकिन अंग्रेजों के विरुद्ध जासूसी करने वाले होनहार और घुटे हुए इस मंझे रहस्यों के खिलाड़ी के यहाँ से उनको खाली हाथ ही लौटना पड़ता था.

1947 में देश की स्वतंत्रता के बाद काले कोल्हापुर लौट आए थे और वहीं बस गए थे. उनकी पत्नी का एक दशक पहले निधन हो गया था. इसके बाद काले का स्वास्थ्य बहुत अधिक खराब हो गया था. काले की अंतिम दिनों में देखभाल एक समाजसेवी अशोक रोकडे कर रहे थे, जिन्होंने इनकी प्रेरणा से ऐसे ही लोगों की सेवा के लिए ‘व्हाइट आर्मी’ की स्थापना की है, यहीं पिछले सात वर्षों से उनकी देखभाल हो रही थी.

इन्होंने ही देश – दुनिया को अब बताया है कि काले का कोल्हापुर के एक स्वास्थ्य केंद्र में शुक्रवार( 14-10-2016 ) सुबह निधन हुआ जहां वह खराब स्वास्थ्य के कारण पिछले कुछ दिनों से भर्ती थे. उनकी उम्र 95 वर्ष थी. काले का अंतिम संस्कार शुक्रवार शाम को ही कदमवाड़ी शवदाह गृह में किया गया.

बताया जा रहा है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा स्थापित फौज के ये अंतिम सिपाही थे, लेकिन पता नहीं कितने अनगिनत, जिनसे हम अनजान है ऐसे स्वतन्त्रता सेनानी जाने कहाँ – कहाँ और कैसे रह रहे है, इसलिए यह कहना तो मुश्किल है कि काले अंतिम ही है.

{ संलग्न – पहली फोटो में नेताजी के बायीं ओर पीछे तीन और सामने एक पगड़ी वाले आजाद हिन्द के फौजी अफसरों के बीचोंबीच नंगे सिर डैनियल काले ही दिखाई दे रहे है. और दूसरी फोटो में नेताजी के एकदम दाएं खड़े डैनियल काले टोपी लगाए दिख रहे हैं }

– ओम प्रकाश ‘हाथ पसारिया’

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