आदमीयत की आखिरी किताब : माँ! काली

मंदिर के बाहर बरगद के तले बने पक्के किनारे पर पता नहीं कहाँ से भटकती एक बावली औरत ने अपना डेरा डाल रखा था.

आते जाते लोग उसे घूरते, वह युवा थी और अक्सर उसे अपने कपड़ों का होश नहीं रहता.

सुबह का वक्त था, एक युवा लड़की टहलने निकली थी, मंदिर के ठीक सामने उसके बगल से गुजर रहे एक वाहन में उसका कुर्ता फँस गया और चर्रर की आवाज के साथ फटा हुआ कुर्ता वाहन के साथ फँसा निकल गया. हठात लड़की लज्जा के मारे किंकर्तव्यविमूढ़ सन्न रह गई.

बावली औरत ने यह देखा, उसने बस साड़ी पहन रखी थी और उसने अपनी साड़ी उतार झट लड़की को ढँक दिया.

एक लड़की की लज्जा की फिक्रमंद बावली खुद पूर्णतया नग्न थी. सामने से पूजा की थाली सजाए गुजर रहीं चार-पाँच औरतों ने बावली को देखा और उस पर हँसती मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़नें लगीं.

मंदिर के पुजारी की आँखों के सामने यह वाकया गुजरा, वह पूजा को जा रहा था…

उसके समक्ष काली कलूटी बावली अपने बिखरे बाल लिए निरावृत खड़ी थी.
पूजारी एकटक अपलक बावली को देखे जा रहा था और सहसा उसके मुँह से निकला “ओ माँ!”

पुजारी मंदिर की सीढ़ियाँ उतर बावली की तरफ बढ़ चला.

ऊपर मंदिर में पुजारी को ढूँढती औरतों ने सहसा देखा पुजारी बावली के चरणों पे दंडवत पड़ा हुआ है उसके होठों से अस्फुट मंत्र उच्चारित थे “जयंती काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा”

कश्यप किशोर मिश्र (आदमीयत की आखिरी किताब)

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