आयुर्वेद आशीर्वाद : 11 वर्ष नियमित त्रिफला सेवन से सच हो जाती है वाणी!

त्रिफला तीन श्रेष्ठ औषधियों हरड, बहेडा व आंवला के पिसे मिश्रण से बने चूर्ण को कहते है. जो मानव-जाति को हमारी प्रकृति का एक अनमोल उपहार है. त्रिफला सर्व रोगनाशक रोग प्रतिरोधक और आरोग्य प्रदान करने वाली औषधि है.

त्रिफला से कायाकल्प होता है त्रिफला एक श्रेष्ठ रसायन, एन्टिबायोटिक वऐन्टिसेप्टिक है इसे आयुर्वेद का पेनिसिलिन भी कहा जाता है. त्रिफला का प्रयोग शरीर में वात पित्त और कफ़ का संतुलन बनाए रखता है. यह रोज़मर्रा की आम बीमारियों के लिए बहुत प्रभावकारी औषधि है. सिर के रोग, चर्म रोग, रक्त दोष, मूत्र रोग तथा पाचन संस्थान में तो यह रामबाण है.

नेत्र ज्योति वर्धक, मल-शोधक,जठराग्नि-प्रदीपक, बुद्धि को कुशाग्र करने वाला व शरीर का शोधन करने वाला एक उच्च कोटि का रसायन है. आयुर्वेद की प्रसिद्ध औषधि त्रिफला पर भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर, ट्राम्‍बे,गुरू नानक देव विश्‍वविद्यालय, अमृतसर और जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में रिसर्च करनें के पश्‍चात यह निष्‍कर्ष निकाला गया कि त्रिफला कैंसर के सेलों को बढ़नें से रोकता है.

त्रिफला के सेवन से अपने शरीर का कायाकल्प कर जीवन भर स्वस्थ रहा जा सकता है. आयुर्वेद की महान देन त्रिफला से हमारे देश का आम व्यक्ति परिचित है व सभी ने कभी न कभी कब्ज दूर करने के लिए इसका सेवन भी जरुर किया होगा.

पर बहुत कम लोग जानते है इस त्रिफला चूर्ण जिसे आयुर्वेद रसायन भी मानता है से अपने कमजोर शरीर का कायाकल्प किया जा सकता है. बस जरुरत है तो इसके नियमित सेवन करने की. क्योंकि त्रिफला का वर्षों तक नियमित सेवन ही आपके शरीर का कायाकल्प कर सकता है.

सेवन विधि

सुबह हाथ मुंह धोने व कुल्ला आदि करने के बाद खाली पेट ताजे पानी के साथ इसका सेवन करें तथा सेवन के बाद एक घंटे तक पानी के अलावा कुछ ना लें. इस नियम का कठोरता से पालन करें.

त्रिफला लेने का सही नियम –

*सुबह अगर हम त्रिफला लेते हैं तो उसको हम “पोषक” कहते हैं. क्योंकि सुबह त्रिफला लेने से त्रिफला शरीर को पोषण देता है जैसे शरीर में vitamine ,iron,calcium,micronutrients की कमी को पूरा करता है एक स्वस्थ व्यक्ति को सुबह त्रिफला खाना चाहिए.

*सुबह जो त्रिफला खाएं हमेशा गुड के साथ खाएं.

*रात में जब त्रिफला लेते हैं उसे “रेचक” कहते है क्योंकि रात में त्रिफला लेने से पेट की सफाई (कब्ज इत्यादि) का निवारण होता है.

*रात में त्रिफला हमेशा गर्म दूध के साथ लेना चाहिए.

नेत्र-प्रक्षलन : एक चम्मच त्रिफला चूर्ण रात को एक कटोरी पानी में भिगोकर रखें. सुबह कपड़े से छानकर उस पानी से आंखें धो लें. यह प्रयोग आंखों के लिए अत्यंत हितकर है. इससे आंखें स्वच्छ व दृष्टि सूक्ष्म होती है. आंखों की जलन, लालिमा आदि तकलीफें दूर होती हैं.

– कुल्ला करना : त्रिफला रात को पानी में भिगोकर रखें. सुबह मंजन करने के बाद यह पानी मुंह में भरकर रखें. थोड़ी देर बाद निकाल दें. इससे दांत व मसूड़े वृद्धावस्था तक मजबूत रहते हैं. इससे अरुचि, मुख की दुर्गंध व मुंह के छाले नष्ट होते हैं.

– त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर पीने से मोटापा कम होता है. त्रिफला के काढ़े से घाव धोने से एलोपैथिक- एंटिसेप्टिक की आवश्यकता नहीं रहती. घाव जल्दी भर जाता है.

– गाय का घी व शहद के मिश्रण (घी अधिक व शहद कम) के साथ त्रिफला चूर्ण का सेवन आंखों के लिए वरदान स्वरूप है.

– संयमित आहार-विहार के साथ इसका नियमित प्रयोग करने से मोतियाबिंद, कांचबिंदु-दृष्टिदोष आदि नेत्र रोग होने की संभावना नहीं होती.

– मूत्र संबंधी सभी विकारों व मधुमेह में यह फायदेमंद है. रात को गुनगुने पानी के साथ त्रिफला लेने से कब्ज नहीं रहती है.

– मात्रा : 2 से 4 ग्राम चूर्ण दोपहर को भोजन के बाद अथवा रात को गुनगुने पानी के साथ लें.

– त्रिफला का सेवन रेडियोधर्मिता से भी बचाव करता है. प्रयोगों में देखा गया है कि त्रिफला की खुराकों से गामा किरणों के रेडिएशन के प्रभाव से होने वाली अस्वस्थता के लक्षण भी नहीं पाए जाते हैं. इसीलिए त्रिफला चूर्ण आयुर्वेद का अनमोल उपहार कहा जाता है.

सावधानी : दुर्बल, कृश व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री को एवं नए बुखार में त्रिफला का सेवन नहीं करना चाहिए.

त्रिफला से कायाकल्प

कायाकल्प हेतु निम्बू लहसुन, भिलावा, अदरक आदि भी है. लेकिन त्रिफला चूर्ण जितना निरापद और बढ़िया दूसरा कुछ नहीं है. आयुर्वेद के अनुसार त्रिफला के नियमित सेवन करने से कायाकल्प हो जाता है. मनुष्य अपने शरीर का कायाकल्प कर सालों साल तक निरोग रह सकता है, देखे कैसे ?

एक वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर चुस्त होता है.
दो वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर निरोगी हो जाता हैं.
तीन वर्ष तक नियमित सेवन करने से नेत्र-ज्योति बढ जाती है.
चार वर्ष तक नियमित सेवन करने से त्वचा कोमल व सुंदर हो जाती है .
पांच वर्ष तक नियमित सेवन करने से बुद्धि का विकास होकर कुशाग्र हो जाती है.
छः वर्ष तक नियमित सेवन करने से शरीर शक्ति में पर्याप्त वृद्धि होती है.
सात वर्ष तक नियमित सेवन करने से बाल फिर से सफ़ेद से काले हो जाते हैं.
आठ वर्ष तक नियमित सेवन करने से वृद्धावस्था से पुन: यौवन लौट आता है.
नौ वर्ष तक नियमित सेवन करने से नेत्र-ज्योति कुशाग्र हो जाती है और सूक्ष्म  से सूक्ष्म वस्तु भी आसानी से दिखाई देने लगती हैं.
दस वर्ष तक नियमित सेवन करने से वाणी मधुर हो जाती है यानी गले में सरस्वती का वास हो जाता है.
ग्यारह वर्ष तक नियमित सेवन करने से वचन सिद्धि प्राप्त हो जाती है अर्थात व्यक्ति जो भी बोले सत्य हो जाती है.

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