कविता : ख़ौफ़ उजले का

आप मानें या न मानें
उजाले का भी एक अलग ही तरह का ख़ौफ़ होता है
एकदम से कहाँ नज़र टिक पाती सूरज पर
मन की मोटी परतें तक कंपकंपा देते
साँवली आत्मा को ढाँपे हुए उजले कफ़न

मुझे तो दीये से डर लगता है
मशाल से डर लगता है
चूल्हे की, चिता की, चित्त की आग से डर लगता है
चकाचक चकोर की चाह से डर लगता है
चमचम चाँद काटता चिकोटी
पूछता सवाल
अरे ! ओ इनसोम्निया के बेबस शिकार !
तुमको आख़िर किस-किस बात से डर लगता है ?

क्या कहूँ
झक्क सफ़ेद नमक चखे बैठे प्रेम का
जबकि और हज़ार किसिम के स्वाद ललचाते
सोंधे-सोंधे स्वप्न लुभाते थरथराते
चुल्लू भर वचनों में डूब के मर जाते
कि मुझे तो नमक की वफ़ा भरी उजास से डर लगता है

आत्महत्या की हद तक ललचाता धुआँधार का उजेला
उस चाँदी के असभ्य प्रपात से डर लगता है

उजाले से डर के मेरे क़िस्से न पूछो
‘ज्ञानरंजन’ की दाढ़ी के उजले बाल से डर लगता है

[ ख़ौफ़ उजले का ]

– बाबुषा

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