Sex and Spirituality : सेक्स की आग में झुलसती मानवता एवं आध्यात्मिक चुनौतियां

काम या सेक्स के विषय पर बात करना और उस से सम्बंधित तथ्यों पर खुलकर स्वस्थ्य संवाद न केवल आज बल्कि प्रत्येक काल हमेशा से ही आवश्यक रहा है और रहेगा, एवं इसका हमेशा स्वागत किया जाएगा, किन्तु मर्यादा की एक सीमा तक.

जब यही सेक्स या काम की भूख इंसानी जीवन की वह सारी सीमाओं को पार करता दिखे, जहां से प्रकृति की नैसर्गिक व्यवस्था एवं मानव समाज की सामाजिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ने लगें, तब हमें कहीं न कहीं सतर्क होने के आवश्यकता है.

विगत सदी के महान अध्यात्म अन्वेषक रजनीश ने अध्यात्म  रहस्यों पर  पर्दा उठाने के पहले इंसान की सबसे ख़तरनाक भूख यानी के सेक्स की गुत्थी को सुलझाने की ही कोशिश की थी, जहाँ तक मैंने अभी तक रजनीश को सुनने और पढ़ने की कोशिश की, वहां तक एक रत्ती मात्र नहीं पाया कि रजनीश ने इंसान की इस भूख को भड़काया है.

किन्तु आम जन मानस का शायद वह मानसिक और बौद्धिक स्तर ही नहीं था, जहाँ से  इस महापुरुष के सन्देश के पीछे छिपे रहस्य और उसकी वास्तविकता को समझ पाते या अंगीकार कर पाते.

भारत में टेक्नोलॉजी के आगाज ने जिस तरह पोर्न और अश्लीलता को परोसा है, एवं इंसानी मानव मन को भड़काया है, उससे कहीं ज्यादा रजनीश के सन्देश को उथले तल पर  लेने वाले छद्म मेहरून रंग का झामा पहनकर मानवता  बरगलाने वाले लोगों ने ओशो की आड़ में प्रदूषित करके रख दिया है.

गुरु के सन्देश को तोड़मरोड़कर अपनी सुविधा अनुरूप प्रयोग करने का प्रयास यह सदियों से ही चला आया है, इसमें दोष गुरु का नहीं होता, बल्कि यह कमी उन शिष्यों की होती है, जिनका स्तर ही नहीं होता, गुरु की भाषा को पढ़ और समझ पाने का, और शिष्यों की गलती का ठीकरा हम चैतन्य गुरु  के मत्थे फोड़े यह उस महान चेतना के साथ सरासर अन्याय होता है.

हाँ रजनीश ने कहीं, अपनी बात को रखने के लिए अहंकार से  युक्त शब्दों का प्रयोग किया है, किन्तु कहीं न कहीं उन सबका  प्रयोजन मानव को उस छिपी दबी कुचली आग से बाहर निकालना रहा, जिसके दुष्परिणाम आज  सबको बलात्कार, अश्लील छींटाकशी और छेड़खानी के रूप  में सामने  रहे हैं.

टेक्नोलॉजी युग ने एक घटना को ब्रम्हांडीय घटना बताकर जिस प्रकार सेकंडों में फैलाया है, इससे बजाय कि इस चुनौती से निपटने और उसके मूल कारणों की पड़ताल करने के, उसका नकारात्मक असर ज्यादा मानव मन पर पड़ रहा है.

मैं रजनीश की देशना  को इस दिशा समुचित उपचार के रूप में काफी दिन तक देखने की भूल करता, किन्तु जैसे जैसे मैंने रजनीश के तथाकथित शिष्यो के मध्य पहुँचता गया, वैसे वैसे पाया कि सेक्स के भूखे भेड़ियों ने रजनीश  देशना और सन्देश को अपनी ढाल के रूप में उपयोग में लाना शुरू कर दिया है.

पता ही नहीं चला,  कब परम स्वतंत्रता का सन्देश देने वाला गुरु, सेक्स स्वतंत्रता बांटने वाले गुरु के रूप में प्रसिद्धी पा गया. हद तो तब हो गयी, जब यौन शोषण के अपराध में सलाखों के पीछे पहुँचे आशाराम के द्वारा रजनीश के सन्देश को खुद के बचाव की ढाल के रूप में प्रयोग करने की कोशिश के बारे में सुनने में आया.

यह स्वाभाविक रहस्य उतना पेचीदा है नहीं, जितना इसे घुमा फिराकर और तोड़ मरोड़कर पेश करने के चलते बना दिया गया है. इससे जुड़े पूर्णतः वैज्ञानिक तथ्य पर हम अगर एक बार भी नजर डाल लें, तो यह गुत्थी एक इसी लेख के साथ ही सुलझ जायेगी.

मानव शरीर पूरी तरह दो पैरों पर चलने वाला एकमात्र जीवन धारी शरीर है. अन्य सारे शरीर मुख्यतः चौपाया हैं, जल चर हैं, या नभ चर है. इंसानी शरीर की यही एक विशेषता है, जो किसी भी दिशा में अपनी श्रेष्ठतम अवस्था को प्रदर्शित कर सकता है.

जीवन ऊर्जा का मुख्य प्रवाह क्षेत्र मस्तिष्क से लेकर पूछ की हड्डी जिसे पुच्छका कहते हैं, तक या के द्वारा होता है, जिसे रीढ़ की हड्डी कहा जाता है. इस पूरे रीढ़ की हड्डी के मार्ग में एक तरल निरन्तर प्रवाहित होता है, जो समूचे तंत्रिका एवं समवेदना तंत्र  मुख्य संवाहक होता है, इसे सैरिब्रो स्पाइनल द्रव कहा जाता है. यही द्रव चेतना और समवेदना का मुख्य केंद्र होता है.

शरीर में व्याप्त गैस या मौजूद ऑक्सिजन का कार्य इस द्रव या चेतना तरल को रक्त के माध्यम से प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाना होता है. चूंकि यह द्रव एक शक्तिशाली चुंबक और आकर्षण शक्ति को अपने आप में समेटे हुए होता है, यदि इसका जमाव किसी एक क्षेत्र विशेष पर ज्यादा पड़ने लगे तो  यह इस क्षेत्र विशेष को अत्यिधक मात्रा में सक्रीय कर देता है,

इस बात को बेहद बारीकी से समझने की देर है, भारतीय अध्यात्म में विष्णु के विश्राम स्थल क्षीर सागर जिस को कहा गया है, दरअसल वह क्षीर सागर यह सैरिब्रो स्पाइनल द्रव है, जिसे शेषनाग कहा गया, वह यह स्पाइनल कॉर्ड या मेरु रज्जु है जिसके अंदर ऑक्सिजन के रूप में निरन्तर कुण्डलिनी ऊर्जा प्रवाहित हो रही है.

और विष्णु नाम से जिस देवता की विवेचना की गई है, वह वास्तविकता में चेतन शक्ति या ऊर्जा है, जो विचार शक्ति चुंबक के रूप विश्व प्रत्येक अणु में विद्यमान है.

आगे के अन्य लेखों में कभी सनातन धर्म के इन वैज्ञानिक रहस्यों पर से पर्दा उठाऊंगा, फिलहाल हमारा विषय सेक्स की भूख है, क्योंकि इंसान दो पैरों पर गति करता है, इसलिये इसकी समूची जीवन ऊर्जा या यह सैरिब्रो स्पाइनल द्रव मुख्य रूप से नीचे के सेक्स केंद्र के आस पास आकर ज्यादा इकट्ठा हो जाता है.

इसके परिणाम स्वरूप् इंसान का सेक्स केंद्र सबसे ज्यादा प्रभावी हो जाता है, किसी भी विपरीत या कमजोर ध्रुव को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए अपनी इस संग्रहित चुंबकीय शक्ति का ही प्रयोग प्रत्येक इंसान करता है. वह कितना भी उलझाऊ बातें कर ले, किन्तु उसका उद्देश्य अपने अंदर समेटकर रखी गई छिपी इच्छाओं की पूर्ति करना ही होता है.

यह सेक्स केंद्र ही इच्छा या संसारी भूख का मुख्य केंद्र होता है. इसी केंद्र से भौतिक और ईन्द्रीय जगत से जुड़ीं अन्य इच्छाएँ पैदा होती हैं. मस्तिष्क शरीर का दूसरा केंद्र होता है, यह वह केंद्र है, जो सेक्स केंद्र से प्रकट होने वाली इच्छाओं को रूपांतरित करके देश काल परिस्थिति अनुकूल सामांजस्य बैठाता हुआ जीवन को निरन्तर दिशा देता रहता है.

किन्तु वर्तमान परिस्थिति में इंसान के यह दोनों केंद्र लगातार ही सक्रीय रूप से काम कर रहे हैं, इसलिए किसी भी इंसान  चेतना को वास्तविकता में पकड़ पाना हर किसी के वश की बात नहीं, सिवाय एक योगी को छोड़कर. योगी वह जो, अपनी इस शक्ति का कैसे सञ्चालन करना  है, बखूबी जानता है.

इंसान की यही विशेषता उसे अन्य जीव धारी प्राणियों से अलग करती है. किन्तु अपनी इस  ऊर्जा  का सदुपयोग कैसे किया जाए, इस सन्दर्भ में आगे के लेख में प्रेषित करूंगा.

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