… क्या क़िस्मत है रेहाना!

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रेहाना से मिल कर आज भी मन में वही शब्द आए जो कॉलेज में आते थे…

“क्या किस्मत है”, परंतु शब्दों के पीछे के भाव बदल गए.

कॉलेज में उसकी किस्मत से रश्क़ होता था, आज उसकी किस्मत पर अफ़सोस हो रहा था.

बात तब की है जब मैंने इंटरमीडियट में एडमिशन लिया था. स्कूल के यूनिफॉर्म से मुक्ति मिली थी,नई नई सहेलियां भी मिली थी.

किशोरावस्था का अंतिम पड़ाव था. वहीँ रेहाना से भी दोस्ती हुई थी.

बला की ख़ूबसूरत लड़की थी जो कॉलेज तो बुर्के में लिपट कर आती थी पर कॉलेज गेट के अंदर घुसते ही पहला काम बुरका उतारने का ही करती.

और तब दीदार होता था एक खूबसूरत सी फ़ैशनेबल लड़की का. लेटेस्ट फैशन के कपड़े पहना करती थी,कभी-कभी तो जीन्स-टॉप भी पहन कर आती थी.

मेरे जैसी लड़कियाँ जिनको सलवार सूट के अलावा और कुछ भी पहनने की इजाज़त घर में भी नहीं थी तो कॉलेज जाने के लिए तो प्रश्न ही नहीं उठता था, बड़ी हसरत से उसको देखा करते थे.

उन दिनों तो उसका बुरका भी हम लोगों को बहुत अच्छा लगा करता था जिसमें छुपा कर कुछ भी पहनने का शौक पूरा किया जा सकता था.

कुछ ही दिनों में रेहाना से अच्छी दोस्ती हो गयी. वो हम लोगों को किसी और दुनिया की रहस्यमयी चीज लगती थी क्योंकि उसका सिर्फ शरीर हमारे जैसा था बाकि हर काम अलग ही था.

खान-पान, रहन-सहन, पूजा यहाँ तक कि बोली भी… मतलब बोलती तो हिंदी ही थी पर उसमें उर्दू के शब्द ज्यादा होते थे जो हमारे लिए नया अनुभव था.

बातों ही बातों में पता चला कि उसकी मंगनी बचपन में ही उसके बड़े अब्बू के लड़के से हो गयी है. उसका मँगेतर अभी इंजीनियरिंग कर रहा है जैसे ही उसकी नौकरी लग जाएगी इनका निकाह हो जाएगा.

हम लोगों के पास उसकी किस्मत से जलने का एक और मुद्दा मिल गया. हम लोग आपस में बातें करते थे कि क्या किस्मत है रेहाना की… इसको तो पहले से ही पता है कि इसका ससुराल कैसा है, जिससे शादी होगी वो कैसा है.

हम लोगों को तो कुछ भी पता नहीं होता है. अनजान परिवार में रिश्ता जुड़ता है… अंजान शहर, अनजाने इंसान… हमसे अच्छी तो रेहाना ही है.

कॉलेज ख़त्म हुआ, सब अपनी अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए.

सालों बाद अभी छोटे भाई की शादी में मायके आई हूँ तो बाज़ार में रेहाना मिल गयी.

बुर्के में लिपटी हुई… उसी ने मुझे आवाज़ दी, चेहरा तो दिख नहीं रहा था, तो भला मैं पहचानती भी कैसे.

सालों बाद उसको देख कर जो ख़ुशी हुई वो क्षणों में ही दूर हो गयी.

उसने बताया कि उसकी तलाक़ हो गया है. अब वो अपने मायके में अपनी तीन बेटियों के साथ रह रही है. किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही है.

यह ऐसी खबर थी जिस पर एक बार तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ पर खुद रेहाना ही कह रही थी तो भरोसा कैसे नहीं करती.

शादी के बाद से ही उसकी बड़ी अम्मी, जो अब सास बन गई थीं, ने अपने बेटे को रेहाना के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया था.

रोज किसी न किसी बात को मुद्दा बना कर बेटे का कान भरती थीं, पर बड़े अब्बू के कारण उनकी साज़िश नाक़ाम हो जाती थी.

दिन बीतते रहे और एक-एक करके तीन लड़कियाँ उसकी गोद में आ गयी. अब सास को एक और बड़ा मुद्दा मिल गया, बेटा नहीं होने का.

उन्ही दिनों ससुर का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया और रेहाना के बुरे दिनों की शुरुआत हो गयी. आए दिन सास नए-नए आरोप लगातीं थी, नतीजा पति-पत्नी में झगड़ा.

पढ़ा-लिखा पति भी जाहिल ही निकला, कुछ ही दिनों में बात कहा-सुनी से मार-पीट पर पहुँच गयी जिसकी परिणति तलाक़ से हुई.

गुस्से में पति के मुँह से तीन बार निकले एक शब्द ने तीन सेकेण्ड में ही सब कुछ ख़त्म कर दिया.

बचपन का रिश्ता सिर्फ एक शब्द ने ख़त्म कर दिया. उसी रात मायके फोन करके उसने अपने अब्बू को बुलाया और दूसरे दिन बच्चियों के साथ घर आ गयी
उधर पंद्रह दिन भी नहीं बीते, उसके पति की दूसरी शादी भी हो गयी.

दरअसल उसकी सास, अपनी भतीजी को बहू बनाना चाहती थी पर अपने पति के डर से उनकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी थी. जैसे ही मौका मिला उन्होंने अपनी चाल चल दी.

दूसरी बीवी के भी बेटी हुई तब पति को अपनी बच्चियों की याद आई. रेहाना को फोन करके उसने माफ़ी माँगी और दुबारा शादी करने की पेशकश की क्योंकि दूसरी बीवी ने जीना हराम कर रखा था. उसके नखरे और फूहड़पन से माँ-बेटे परेशान थे, तब रेहाना की सलाहियतें याद आ रही थी.

मैंने जानना चाहा कि दुबारा शादी संभव है क्या?

रेहाना ने जो बताया उसने तो मेरे होश ही उड़ा दिए. हलाला करके ही दुबारा शादी की जा सकती है पर हलाला किसी भी औरत के स्वाभिमान को तार-तार करने के लिए बहुत है.

हलाला एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अपनी ही पत्नी से दोबारा शादी करने के लिए उसकी शादी किसी दूसरे मर्द से करवानी पड़ती, फिर तलाक दिलवा कर ही दुबारा शादी की जाती है.

रेहाना स्वभिमानी थी, उसने हलाला से इंकार कर दिया.

उससे मिलने के बाद लगा कि हमारी किस्मत बहुत अच्छी है… हमारे यहाँ गुस्से में तलाक नहीं हो सकता है, न कानून इसकी अनुमति देता है, न ही धर्म में ऐसे बिना सिर-पैर के नियम बनाए हैं.

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