मोदी को रोकने दिल्ली में कांग्रेस, बिहार में नितीश के बाद यूपी में कौन करेगा खुदकुशी!

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निष्पक्ष तटस्थ मीडिया से ये आशा की जाती है कि वो अपने पाठकों को सीधी सच्ची बात बताए… सत्य बताए… तथ्य रखे… पर जब से ये बिका हुआ, पेड मीडिया, न्यूज़ ट्रेडर के अवतार में अवतरित हुआ है, ये पैसे लेकर आपको गलत तस्वीर पेश करता है.

पिछले हफ्ते हमने देखा कि कैसे एक ओपिनियन पोल में मायावती को उत्तरप्रदेश में सबसे लोकप्रिय नेता बना के पेश किया और फिर कैसे एक अन्य मीडिया समूह के अखबार ने हेडलाइन बनायी कि यूपी में मायावती सबसे लोकप्रिय और भाजपा चूकी… जबकि उसी सर्वे में ये स्पष्ट हुआ कि भाजपा तो बसपा से मीलों आगे है.

एक और झूठ जिसे बार-बार परोसा जा रहा है कि भाजपा दिल्ली और बिहार में बुरी तरह पिटी. जबकि सत्य ये है कि भाजपा ने इन दोनों राज्यों में ही अपना वोट प्रतिशत बरकरार रखा.

दिल्ली में मोदी का विजय रथ रोकने के लिए कांग्रेस ने खुद आत्महत्या करते हुए अपना सारा वोट आम आदमी पार्टी को दिलवाया और मरी-गिरी हालात में भी उसका जो लगभग 22 % वोट था, उससे 8% पे आ गयी थी. दिल्ली में कांग्रेस का ये आत्मघाती कदम था, मोदी को रोकने के लिए.

इसी तरह बिहार में, भाजपा ने अपना 34 % वोट कायम रखा. वहाँ नितीश बाबू ने आत्मबलिदान दिया, और अपने हाथों उस भस्मासुर को ज़िंदा किया. खुद 71 सीट पर रह गए और लालू को 80 जिता लाये.

मरी हुई कांग्रेस जो 2 या 4 सीट को मोहताज थी, उसे भी 27 पर ले आये. यानी खुद को मार के अपने दुश्मनों को संजीवनी दे दी… सिर्फ मोदी को रोकने के लिए.

अब वही भ्रम एक बार फिर उत्तरप्रदेश में पैदा किया जा रहा है. कहा जा रहा है कि हवा तो दिल्ली और बिहार में भी खूब थी… क्या हुआ?

तो उसका जवाब ये है कि दिल्ली में कांग्रेस ने आत्महत्या की और बिहार में नीतीश बाबू ने… उत्तरप्रदेश में कौन करेगा?

सपा, बसपा या कांग्रेस… उत्तरप्रदेश में भाजपा को रोकने के लिए इन तीनों में से किसी एक को आत्महत्या करनी पड़ेगी.

कौन करेगा?

कांग्रेस तो पहले ही मृतप्राय है. सपा या बसपा में से किसी एक को करनी पड़ेगी.

तीसरा सबसे बड़ा तथ्य जिसे जानबूझ के नज़रअंदाज़ किया जा रहा है वो है सपा-बसपा का खिसकता जातीय वोट बैंक.

दलितों में मायावती के पास अब सिर्फ चर्मकार-जाटव बचे हैं. शेष दलित समाज में भाजपा ने ठीक ठाक सेंध लगायी है.

2007 में जब मायावती सत्ता में आयी तो उस समय उसे सम्पूर्ण ब्राह्मण समाज के साथ अन्य सवर्ण वोट + सम्पूर्ण दलित + आधा मुस्लिम वोट मिला था. आज ब्राह्मण समेत पूरा सवर्ण बसपा से दूर है, दलित में भी चर्मकार-जाटव छोड़ बाकी भाजपा में आ चुका है और मुसलमान दिग्भ्रमित है.

आधा दलित आधा मुसलमान से चुनावी गंगा पार न होगी.

सपा की स्थिति तो और खराब है. गृहकलह, और दो गुट…. कल मुलायम सिंह ने कह दिया कि नेता का चयन, चुनाव परिणाम के बाद विधायक करेंगे.

अव्वल तो अखिलेश के आदमी टिकट पाएंगे नहीं. तो फिर अखिलेश गुट, शिवपाल के आदमियों को भितरघात कर हरवायेंगे. युवा यादव, जो आमतौर पर मोदी का प्रशंसक है और सपा में अखिलेश को पसंद करता है, उसके लिए इस बार भाजपा को वोट करने का पर्याप्त कारण है.

रही बात भाजपा की, तो पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में हुई सर्जिकल स्ट्राइक से मोदी का कद बढ़ा है और उनकी लोकप्रियता चरम पर है.

दूसरी बात ये कि जातीय समीकरण भाजपा के पक्ष में है. सम्पूर्ण सवर्ण + सम्पूर्ण गैर यादव ओबीसी + 25 से 30 % यादव + लगभग 30% दलित अति पिछड़ा + 10 % मुसलमान (महिलाएं) भाजपा के साथ हैं.

मीडिया जानबूझ कर बसपा को लड़ाई में दिखा रहा है जबकि जमीनी सच्चाई ये है कि बसपा लड़ाई से एकदम बाहर है.

अब तक तो तस्वीर साफ़ है. आगे देखते हैं कोई आत्मघाती दस्ता तैयार होता है क्या? वैसे राहुल गांधी को ये समझाया जा सकता है कि यूपी में भाजपा को रोक लेना भी आपकी विजय ही होगी.

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