मथुरा के नास्तिकों के इलज़ाम तो सुन लिए, केरल में पत्रकारों पर वकीलों का पथराव नहीं दिखा!

सुना है मथुरा में नास्तिको के सम्मेलन को आस्तिक लोगों ने रद्द करवा दिया और सरकार ने भी आस्तिको की बड़ी मदद की. पुलिस मूक दर्शक बनी रही. कुछ मार पीट की भी खबरें रही. और फिर प्रिय वामपंथी साथियों ने लिखा की फासीवाद आ गया है. तमाम सेक्युलर और लिबरल लोगों ने साथियों के सुर में सुर मिलाये.

लेकिन कल मथुरा हीनहीं हुआ, केरल में भी कुछ हुआ कल. केरल में कुछ ही महीनो पहले गॉड ओन सरकार क्रांतिकारी सरकार एक कम्युनिस्ट सरकार आयी है. तमाम लोग मतलब कामरेड लोग मंत्री बने. मंत्री बनने के बाद लोगों को बहुत से सरकारी पदों पर नयी नियुक्तियां करनी होती हैं.

केरल सरकार के इंडस्ट्री मिनिस्टर जयराजन साहब ने कई अपॉइंटमेंट किये. अपने परिवार के बच्चों को सरकारी उपक्रम राज्य के उद्योगों में प्रमुख पद पर बैठाया. खेल संघों में बिठाया. अपने साथी मंत्रियों , कामरेड सांसदों के बच्चो को उपकृत किया.

हंगामा मचा. कायदे से मचा. कांग्रेस जो अब विपक्ष में है , उसने प्रदर्शन किये. विधानसभा में धरने दिए गए. कोर्ट में केस किये गए.

कल त्रिवेंद्रम के एक कोर्ट में इसी मामले पर पेशी थी. उसे कवर करने तमाम पत्रकार , पुरुष और महिला पत्रकार अदालत में कोर्ट रूम में मौजूद थे. वहीँ उसी रूम में जज के सामने वकीलों ने पत्रकारों को मारा, धक्का मुक्की की. घसीटा. महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी की. महिलाएं जज साहब को घेर कर उनके पीछे छुपी. लेकिन बेकार.

और ये सब तब हुआ , जब पहले से ऐसी आशंका थी. पत्रकारों ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से अपील की थी. उन्हें कोर्ट की प्रोसीडिंग को रिपोर्ट करने का आदेश चीफ जस्टिस का था , मुख्य मंत्री का आश्वासन था. पुलिस का पूरा बंदोबस्त था.

जब पुलिस वाले पत्रकारों को किसी तरह बच बचाकर बाहर ले गए. तब वकीलों ने पत्रकारों पर पथराव किया.

अंत में शाम को त्रिवेंद्रम के बार प्रेजिडेंट से एक पत्रकार ने पूछा ऐसा किसलिए हुआ तो साहब ने कहा की कुछ दिनों पहले वकीलों ने एक फ़ुटबाल का फ्रेंडली मैच खेला था जिसे कवर करने के लिए पत्रकारों से अनुरोध किया गया था. चूँकि पत्रकारों ने ये अनुरोध ठुकरा दिया इसलिए वकीलों ने अपना गुस्सा ऐसे निकाला.

यही असलियत है इन कम्युनिस्ट लोगों की. आप एक कम्युनिस्ट शासन में आस्तिक या धार्मिक सम्मेलन की सोच कर भी देखिये. असल फासीवाद याद आ जायेगा.

मथुरा में भी नास्तिको के सम्मलेन पर आस्तिको ने हमले किये हैं. आजकल नाखून कटाकर लोग नेता बन जाते हैं. ऐसे विरोध प्रदर्शन बड़े कारगर होते हैं. खासतौर पर सरकारी दमन हो जाये. जैसे केजरीवाल बने. नहीं तो लोग शोर मचा मचा कर भी नेता हो जाते हैं , बना दिए जाते हैं जैसे कन्हैय्या कुमार बन रहे हैं.
जिग्नेश मेवानी दलित आंदोलन के जरिये नेता बनने की राह पर हैं.

मथुरा के नास्तिक सम्मेलन में भी नेतागिरी के बीज हैं. कुछ दिनों पहले दिल्ली में नास्तिक सम्मेलन के आयोजको ने प्रेस कांफ्रेंस भी की थी. इस बार काफी अच्छा प्रचार था इस आयोजन का. पहले भी ये सम्मेलन हुआ, कई बार हुआ. लेकिन वो आम सम्मेलन था , लोग वापस आकर अपने अनुभव बांटते थे. इस बार इस सम्मेलन की पहले से हवा थी. और फिर विरोध प्रदर्शन तो सोने पर सुहागा साबित हुआ है.

इंतजार है इसका परिणाम किस नेता के रूप में निकलता है.

ऐसे ऐसी बात कहनी नहीं चाहिए लेकिन मैं इस विरोध प्रदर्शन भले वो फर्जी हो खुश हूँ. सही हुआ. नास्तिकता का अर्थ इन लोगों ने आस्तिको की भावनाओ का मजाक बनाना मान लिया था. सालों से सिर्फ मजाक बनाते रहे. दरअसल बहुत से लोगों में प्रतिभा नहीं होती. लेकिन बुद्धिजीवी वो भी कहलाना चाहते हैं.

आर्थिक नीति, सामाजिक विषय, साहित्य, इतिहास, किसी पर वो लिख नहीं सकते, बात नहीं कर सकते. लेकिन धर्म पर बोल सकते हैं. लिख सकते हैं. हर धार्मिक रीति रिवाज, विश्वास पर व्यंग्य कर सकते हैं. वो भी खासतौर पर हिन्दू धर्म की. मुस्लिम या किसी अन्य धर्म पर ओढ़ी चुप्पी बुद्धि में चार चाँद लगा देती है.

तो ऐसे लोग फिर सेक्युलर और लिबरल कहलाते हैं. वामपंथी साथियों की लाइन को टो करते हैं. उनके सुर में सुर मिलाते हैं और अपने आप को डेढ़ होशियार समझने लगते हैं.

मथुरा में जो हुआ अच्छा हुआ. लेकिन खुद किया या करवाया ये कौन बतायेगा.

– शरद श्रीवास्तव

 

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