बॉलीवुड बन गया डॉनवुड -1

सुना तो सबने हैं, लेकिन कहने का साहस कोई कोई ही दिखा पाता है, ऐसा ही साहस भरा लेख श्री नवीन नयन की बेबाक कलम से.

बॉलीवुड में सोना तस्कर हाजी मस्तान ने काले धन का जो बीज बोया था, उसने अब वटवृक्ष का रूप ले लिया है. यह ऐसा वटवृक्ष है जिसकी छाया में विशेष रूप से छोटे फिल्म निर्माता राहत की सांस लेते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी निर्माता हैं, जो काले धन को सफेद करने में सहयोग कर रहे हैं.

यह काला धन माफिया का होता है. माफिया का यह धन कई रास्तों से फिल्म निर्माताओं तक पहुंचता है. ये रास्ते पूंजी निवेशकों के नाम पर भवन निर्माताओं और हीरा व्यापारियों के हैं. इस बॉलीवुड में कम से कम दो दर्जन पूंजी निवेशक हैं. मगर साठ प्रतिशत फिल्मों के पूंजी निवेशक हीरा व्यापारी भरत शाह हैं.

उन्होंने ही निर्माता नजीम रिजवी की फिल्म चोरी-चोरी, चुपके-चुपके को लगभग 13 करोड़ रुपए दिए. अब्बास-मस्तान निर्देशित इस फिल्म में सलमान खान, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा मुख्य कलाकार हैं. मुम्बई पुलिस नजीम को गिरफ्तार करके यह साबित करने में जुटी है कि बॉलीवुड अब डॉनवुड बन गया है.

पुलिस का कहना है कि नजीम ने माफिया सरगना दाउद इब्राहिम के सिपहसालार छोटा शकील के पैसे से चोरी-चोरी, चुपके-चुपके फिल्म बनाई है, जबकि भरत शाह यह दावा कर रहे हैं कि यह फिल्म उनके पैसों से बनी है, इसमें छोटा शकील का एक भी पैसा नहीं लगा है.

मगर पुलिस कहती है कि उसके पास नजीम और छोटा शकील की बातचीत के टेप हैं, जिससे सिद्ध होता है कि नजीम की फिल्म में छोटा शकील का पैसा लगा हुआ है.

पुलिस यह भी कह रही है कि नजीम ने गिरफ्तार होने के बाद वास्तविकता स्वीकार कर ली है. अब तक टेप किसी को सुनाया नहीं गया है, इसलिए दुविधा बनी हुई है.

जिस तरह से पुलिस भरत शाह, सलमान खान और अब्बास-मस्तान से पूछताछ कर रही है और जिन तथ्यों को गैर आधिकारिक रूप से उजागर किया जा रहा है, उससे यह भी साबित हो रहा है कि बॉलीवुड में माफिया के लोग काम कर रहे हैं.

समय के साथ माफिया के काम करने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है. हाजी मस्तान को तो सोना नाम की एक बी ग्रेड फिल्म की अभिनेत्री से प्रेम हो गया था. उसने उसके प्रेम में अपनी दौलत लुटानी चाही.

इसलिए हाजी ने उसे लेकर तीन फिल्मों का निर्माण किया था. मगर बाद में उसे महसूस हुआ कि तस्करी करने वालों के लिए यह दुनिया सही नहीं है. तब उसने सोना को जुहू में एक शानदार घर खरीद कर दिया और उसे अपनी दूसरी पत्नी का दर्जा दिया.

सोना ने तब तक फिल्मों में काम नहीं किया जब तक उसे हाजी मस्तान से पैसे मिलते रहे. उसके मरने के बाद सोना को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, क्योंकि हाजी मस्तान के घर वालों ने उससे घर छीन लिया.

जब उसने कानून का सहारा लेने की बात सोची तो उसे जान से मारने की धमकी दी गई. उसने पेट भरने के लिए फिर से फिल्मों में काम करने की कोशिश की. अब वह हाजी मस्तान के लोगों के डर से गुमनामी की जिंदगी जी रही है.

हाजी मस्तान की तरह दाउद इब्राहिम और उसके भाई नूरा और अनीस ने भी बॉलीवुड को अपनी सैरगाह बनाया. दाउद ने भी प्रेम का सहारा लिया. उसकी प्रेमिका के रूप में कथित रूप से राम तेरी गंगा मैली की नायिका मंदाकिनी का नाम जुड़ा.

मगर मंदाकिनी को सिवाय बदनामी के कुछ नहीं मिला. कहते हैं कि दाउद ने उसे कुल्लू मनाली में एक फार्म हाउस उपहार में दिया. लेकिन दाउद के नाम पर मंदाकिनी ने इतनी फिल्मों में काम किया कि उसके पास पैसों की कमी नहीं.

हो सकता है उसी पैसे से उसने फार्म हाउस’ खरीदा हो. मंदाकिनी जब एक बच्चे की मां बन गई तब उसके बच्चे के पिता के रूप में दाउद का नाम सामने आया, लेकिन मंदाकिनी चुप रही. उसने एक लामा के साथ शादी करके बौद्ध मत स्वीकार कर लिया है. इस समय मंदाकिनी उसी लामा के साथ रह रही है.

लेकिन जब मुम्बई बम विस्फोट काण्ड में पुलिस ने फिल्मी जगत के लोगों से पूछताछ शुरू की तो मंदाकिनी को विशेष रूप से कुल्लू मनाली से मुम्बई लाया गया था.

मंदाकिनी के जमाने में किसी निर्माता की हिम्मत नहीं होती थी कि वह उसके नखरे न सहे. दुबई से दाउद का फोन आता था और निर्माता उसे अपनी फिल्म की नायिका बना लेते थे. दुबई के भाई के फोन पर कलाकारों को काम देने की परंपरा की शुरुआत मंदाकिनी से हुई.

इसके बाद अंडरवर्ल्ड ने इसे अपना तरीका बना लिया. फिल्मों में कलाकारों का आगमन भाई की मर्जी से होने लगा. इसके साथ ही दाउद ने फिल्मों में अपना काला धन लगाकर उसे सफेद करने का धंधा शुरू किया.

बॉलीवुड में सबसे ज्यादा काला धन सफेद किया दाउद ने. उसे अपने यहां जन्मदिन के मौकों पर कलाकारों को नचाने का शौक भी था. इसलिए गोविन्दा, अनिल कपूर, मिथुन चक्रवर्ती, जानी लीवर, अनु मलिक, फरहा, सोनम, रवीना टंडन, संजय दत्त आदि कलाकार दाउद के दरबार में हाजिर होते थे.

अनु मलिक ने तो दाउद पर एक गाना भी तैयार किया था. दाउद के सम्पर्क में रहने पर कलाकारों को दोहरा लाभ होता था, एक तो स्टेज शो से पैसे कमाने का मौका मिलता और मनचाही फिल्मों में काम करने का भी अवसर मिलता था.

क्रमश:

– पांचजन्य से साभार  (31 दिसम्बर 2000 में प्रकाशित श्री नवीन नयन का लेख )

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