आकाश एक बूढ़ा बाबा

रोज सुबह दूधिया चादर ओढ़े एक बूढ़ा बाबा
अपनी पोटली में चमकता जादुई गोला लिए
आ खड़ा होता है चौखट पर…..

कहीं बीती रात के मीठे सपनें को
सतरंगी चुनरिया ओढ़ाता है,
कहीं रात की काली चुनरिया में
चमकीली टिकलियाँ टाँकता है,
तो कहीं धुँआ छोड़ते चूल्हे को
फूँक देकर जलाता है…….

अलसाते जीवन को
सुनहरे पानी के छींटों से उठाकर
वो बूढ़ा बाबा दिन भर
हाँकता रहता है सबको ऊपर बैठे

और फिर दिन भर के थके मन को
बैंगनी राहत देकर बहलाता है,

अगले दिन का वादा देकर
बत्ती बुझाकर, लोरी सुनाता है,

तारे बच्चों की तरह उसके आँगन में खेलते रहते हैं
और वह हाथ में चाँद की टॉर्च जलाकर
रातभर जागकर रखवाली करता है………..

कितने सुरक्षित हैं हम उसकी पनाह में
जो स्थिर है फिर भी जीवंत है,
विशाल है लेकिन सीमित है
आँखों की सीमा तक…

जो ठिकाना नहीं देता
लेकिन स्वच्छंदता को पनाह देता है.

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