#Aalu के परांठे और पॉलिटिक्स

आलू के पराँठे. नर्म और गर्म, दोनों ही एक साथ. यम्मी तो इतने कि प्लेट चटाचट साफ़ हो गयी. माँ नाश्ते में पराँठे बनाती है, जैसे दिन सा बन जाता है. पराँठों खासियत है कि आप सुबह शाम जब भूखे हो, बिना सब्जी अचार या कुछ भी न होने पर, भी ये स्वाद लगते हैं.

पराँठे कभी तनहा नहीं महसूस कर सकते. वो अपने आप में ही भरपूर हैं. पराँठे आज़ाद हैं. न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर.

दाल के साथ खाओ तो अच्छे, दही से और अच्छे, चिपकु सॉस से और ज्यादा अच्छे, माँ के हाथ के आम के आचार से और भी ज्यादा अच्छे, किसी के साथ बुरे नहीं हुए ये, न ही कभी किसी के साथ बुरा करते हैं. न इनकी वजह से प्रदूषण होता है और न ही राजनीति.

प्रेम बढ़ाते हैं ये पराँठे, दोस्तों के बीच जब लंच बॉक्स खुल जाये तो. उसको भी पसंद हैं, बहुत ज्यादा. वो परांठों के साथ मंचूरियन खाती है. गज़ब ही है, नारी का कोई पार नही पा सकता. हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी, के हर ख्वाहिश पर दम निकले.

परांठों में मिर्ची है, नमक है, धनिया है, अजवाइन भी है, अनार दाना है, चुटकी भर अमचूर भी है…. एक चुटकी अमचूर की कीमत तुम क्या जानों रमेश बाबू. कहने का अर्थ है पराँठे स्वादिष्ट होते है, और इसके लिए कोई प्रमाण पत्र या सबूत की जरूरत नहीं, नाम ही काफी है.

पर दुःख इस बात का है कि लोग खुद को पराँठा समझने लगते हैं. और बिना प्रमाण या सबूत के कुछ भी कह जाते हैं. और फिर उसे सच भी ठहराते हैं. जैसे सब मिले हुए हैं, सब भ्रष्ट हैं, सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत, डिग्री दिखाओ, सीडी छुपाओ…

सिर्फ मिर्ची नमक अजवाइन अमचूर को आलू में डालकर, आटे में ठूसकर गोल बेल लेने से और उसे कम आंच पर तेल लगाकर सेंक लेने से पराँठे नहीं बन जाते.

पर नहीं, उसमें चाहिए प्यार, माँ के हाथ का प्यार, बिना सबूत के स्वादिष्ट पराँठे बनाना हर किसी के बस की बात नहीं. केजरीवाल खुद को पराँठा न समझे.

– Whatsapp से

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