आलू खाने वाले

अभी-अभी भट्ठी या उपलों की सुस्त आग से निकले
राख लगे आलुओं का रंग है यह
धूसर जैसे एक तूफ़ान के बाद दाँतों पर जमी परत
दिन-भर की थकान के बाद मिला एक अवकाश है

जहाँ-तहाँ पीली पत्तियों पर चरड़-चरड़ भटक आने का
ढूँढ़ा जाए उस नदी को जो बिलकुल पास से बहती थी
जिसके पानी में तब भी भुने हुए आलू का रंग नहीं घुल पाया था

यह झुकी हुई किसान औरत कुछ बो रही है
शाम यह बैठेगी नीमरोशनी में जो
एक लटकते हुए लट्टू का दान है
आलू की गर्मास साफ़ दिखती है जो धीरे-धीरे ऊपर उठती है
इस नीमरोशनी में

एक पुरुष झुके हुए सिर वाली एक स्त्री की तरफ़
आहिस्ता-से बढ़ा रहा है आलू
बस यहीं अटक गई गति और समय ने खो दी आवाज़

उस स्त्री ने अभी तक उस आलू को स्वीकार नहीं किया
यह वान गॉगन है जो एक हाथ में आलू और एक में ब्रश लेकर
पीठ पर कैनवास और ईज़ल, कंधों पर रंगों का बस्ता लटकाए
कटे हुए कान और छाती में बनी सुरंग के साथ
दूर जा रहा है

उसकी स्त्रियों ने अभी तक स्वीकार नहीं किया उसका आलू
वे नहीं बो पाई हैं उन बीजों को
जिनकी लघुता का एक ख़ूबसूरत पोर्ट्रेट बनाना चाहता था वह
जिनके लिए शिद्दत से बनाया उसने
पीले रंग में डूबा एक बेडरूम

जहाँ खिड़की के पास टेबल पर चाय की केतली
दवा की बोतलें और एक गिलास पड़े हैं
डर और झल्लाहट के तमाम क़िस्सों के साथ
मैं देख सकता हूँ वहाँ भटकती
बौराई आत्माओं और लंपट तनहाई को

ढूँढ़ा जाए तो उस कर्मचारी को
पागलख़ाने से बाहर निकल जिसकी निगरानी में
बनाए थे उसने पचासों चित्र
जब उसने साइप्रस के पेड़ों को हरी लपटों के रूप में देखा था
बादलों के हुल्लड़ और अनंत में सितारों की उमड़-घुमड़ को
ख़ालीपन से
तो क्या उसे दौरे आए थे
और महसूस हुआ था कि लौटकर खाया जाए आलू
जो उससे ताउम्र छीना गया बेसाख़्ता

सब कुछ दे देने वाली उदारता के कारण रहा वह हफ़्तों भूखा
और पगलाहट में उसने दी थीं कुछ अलौकिक गालियाँ
जिनमें से कई उनके नाम भी थीं
जो आलू खाकर परास्त धुनों पर सो जाते थे

– गीत चतुर्वेदी

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