ज़िंदगीनामा : कन्या पूजन

लो जी सबने कन्या पूजन किया, मैंने भी किया मगर अब मैंने पड़ोसी कन्याओं को बुलाना बंद कर दिया है. कई वजहें हैं पर सबसे बड़ी वजह है पेट भरी कन्याओं की भोजन के प्रति अरुचि.

पूड़ी हलवा चने उनके लिए कोई महत्व नहीं रखते. मैं खाने के ढेर सारे पैकेट बना के मंदिर ले जाती हूँ और 10 मिनट के अंदर महसूस होता है ओह और पैकेट क्यों न बनाये… ऐसे वो प्रसाद कन्यायें लूट लेती हैं.

तो आज भी मंदिर ही गई… मैं पैकेट निकाल के दे रही थी, दे क्या रही थी मुझसे छीन लिया जा रहा था. दक्षिणा के लिए ढेर सारे खुल्ले पैसे ले गई थी वो भी लूट लिए गए. इसी दौरान महसूस किया दो नन्ही आँखे मुझे घूर रही हैं, वही सभी लड़कियों के बीच से…

सबकी तरह ही थी वो पर कुछ अलग थी. उसके छोटे बाल करीने से दो रबर लगा के बांधे गए थे, पैरो में चप्पल थी जो टूटने की हद तक घिस चुकी थी, फ्रॉक उसकी साफ थी पर जगह-जगह फटी हुई कई जगह सिलने की नाकाम कोशिश की गई थी. दादी कहती है “फटहे लाज ना ह, मइले लाज ह, उसकी माँ कोई सभ्य महिला होगी शायद वक़्त की मार हो जिसने उसे मजबूर किया होगा अपनी लाड़ली को यहाँ भेजने को.

मैं उसे अलग ले गई और पूछा तुमने आगे हाथ क्यूँ नहीं बढ़ाया? उसने धीमी टूटी आवाज में कहा हमका तो मिला नाय.. अब तो ख़त्म हो गया क्या करूँ बोलो मैंने कहा. उसने ऐसे घूरा मुझे जैसे शिकायत कर रही हो मुझसे… मैंने अपना छोटा सा बटुवा देखा जिसमे 2-3 दस की नोट और मुट्ठी भर खुले पैसे होंगे मैंने यंत्रवत वो बटुवा उसे थमा दिया…

उसने आँखों से ही पूछा ले जाऊँ सब? मैंने सर हिलाया और वो दौड़ते हुए निकल गई. अब साहब बाहर आ के याद आया की ऑटो से जाना है और किराये के पाँच रूपये भी नहीं है… खैर 2 km पैदल चलने को तैयार ही हुई की बगल की आंटी जी मिल गई और टंग ली उनके साथ.

पर उस कन्या को क्या कहूँ… मैंने उसे कहाँ कुछ दिया दे तो वो गई मुझे, एक अजीब सी खुशी, एक सम्मोहन…एक अनुभव…

– अंजलि राय

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