एक माँ की डायरी से

माँ, ये वो शब्द है जिसको सुनते ही मन किलकारियों से गूँज उठता था, कानों में छोटी -छोटी पायल खनक उठती थी… दूर आसमान की तरफ देखते हुए किसी एक तारे को अपनी कोख में भर लेने को मन मचल उठता था.

ये हसरतें जब एक कुंवारी लड़की के मन में उठती थी तो वह ये सोचकर सिहर जाती थी कि कहीं उसके भाव चेहरे पर तो नहीं छलक पड़े, किसी ने उसे ये सोचते हुए देख तो नहीं लिया?

लेकिन आज जब तुम्हारे छोटे-छोटे हाथ मेरे चेहरे को छूते हैं तो मुझे यकीन नहीं होता, वही पुराना सा सपना लगता है जो अक्सर शादी से पहले देखा करती थी….

आज माँ तो बन गई हूँ एक सुखद एहसास को जी रही हूँ…….. सुना था माँ बनना किसी लड़की का तीसरा जन्म होता है. मगर मैं न जाने कितनी बार जन्म लेती हूँ और न जाने कितनी बार जन्म देती हूँ….

जन्म देती हूँ अपनी ख्वाहिशों को, अपनी हसरतों को, अपने सपनों को और रोज़ अपने हाथों से उनका गला घोंटकर रह जाती हूँ…. आईने में अपना चेहरा देखती हूँ तो दो परछाइयां नज़र आती है…. एक वो जो जन्म देती है… एक वो जो मौत देती है….. इन दोहरी ज़िंदगी की दो पटरियों पर चल रही मेरी एक ज़िंदगी कई बार पटरी से उतर जाती है तो कई बार वापस पटरी पर चढ़ जाती है …

पटरी से ये सोचकर उतर जाती है कि क्या मैं भी सबकी तरह इन पटरियों को पकड़कर सीधे-सीधे तमाम लोगों के साथ चलती रहूं या उन रास्तों पर चल पडूं, जो पटरियों के पार दिखाई देते हैं…

एक ही जगह पर आधी अंधियारी और आधी रौशनी से भरी उन वादियों में अपने दिल के पीछे दौड़ पडूं…. अपना सा लगता वो अंधेरा दूर से जब रौशनी से भरा दिखता है तो लगता है, रास्ता मिल गया पर उसके जितने करीब जाओ वो उतना ही दूर होता जाता है.

कई बार पटरियों और उन रास्तों के बीच से गुजरती उन पगडंडियों पर चल पड़ती हूँ, सोचकर कि ये पगडंडियाँ जिस ओर ले जाएँगी उस ओर चल पडूँगी. लेकिन कमबख्त पगडंडियाँ भी मेरी तरह अपना रास्ता तय नहीं कर पा रही है…

दो लोगों को एक साथ जीना कोई आसान काम नहीं, आँखों में आंसू न लाकर होठों पर अचानक मुस्कान ले आना भी एक मुस्कान को जन्म देने के बराबर है चाहे वो मुस्कान नाजायज़ ही क्यों न हो…. आज आंसूओं को जन्म दिया तो बड़े अपने से लगे. थोड़ी देर बाद न जाने किसके लिए एक बेगानी मुस्कराहट को जन्म देना पड़े….

तुम बहुत छोटी हो अभी… तुम्हें छूती हूँ तो सम्पूर्णता का एहसास होता है… तुम दूर होती हो तो अधूरी हो जाती हूँ… और जब अधूरी हो जाती हूँ तो सब कुछ अधूरा हो जाता है…

आधी खुशियों के आधे टुकड़े को आधे गम के साथ जोड़कर एक पूरा ख्वाब बना लेती हूँ उसे जीती हूँ और तुम्हारे आते ही आधा गम तकिये के नीचे छुपा देती हूँ…क्योंकि मैं दूर रखना चाहती हूँ तुम्हें अपने अधूरेपन से, अपने आधे ग़मों से, आधे ख्वाबो, से ताकि तुम अपनी ज़िंदगी पूरी जी सको, पूरे ख़्वाबों के साथ, पूरी खुशियों के साथ…

मैं सहम जाती हूँ जब मैं तुममें अपनी परछाई देखने लगती हूँ, मैं डर जाती हूँ जब तुम मुझ जैसी होने लगती हो… मैं नहीं चाहती तुम मेरे जैसी होवो, अधूरी सी….. ना पूरी कुंवारी, ना पूरी शादीशुदा, ना पूरी औरत, ना पूरी इंसान…

हाँ यदि कुछ मुझमें पूरा है तो वो है माँ होने का एहसास जिस पर कोई दो राय नहीं…. कोई प्रश्नचिन्ह नहीं…

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