Boycott China Bazar : रोटी किनारे से तोड़ी जाती है बीच से नहीं

शिवाजी से जुड़ी एक दंतकथा है जिसमें वो मुग़ल फौजों से मुकाबले के बीच ही कहीं किसी बुढ़िया के घर रोटी खा रहे होते हैं. तवे से उतरी गर्म रोटी को बीच से तोड़ने की कोशिश में शिवाजी का हाथ जल जाता है.

बुढ़िया ये देखकर कहती है अरे बेटा तुम तो बिलकुल शिवाजी जैसे हो! वो भी ऐसे ही बड़े किलों पर हमला कर के अपना नुकसान करता है जैसे तुमने हाथ जलाया. किनारे से क्यों नहीं तोड़ते? वहां ठंडी हो चुकी होगी तो आसानी से खा भी पाओगे!!

शिवाजी की समझ में तो आ गया था कि मुग़ल साम्राज्य के किनारों पर हमला करना चाहिए. इसी तरीके को अपना कर उन्होंने अपना साम्राज्य बढ़ा भी लिया.

सवाल है कि बरसों से बार बार सुनी ये कहानी आपको समझ आई है क्या? सीधा कंप्यूटर और मोबाइल फेंकने की बात करके शिवाजी की तरह कहीं बीच रोटी में तो हाथ नहीं डाल रहे?

पटाखे, दिए, मूर्तियाँ, गिफ्ट आइटम जो भी छोटी चीज़ें हैं वो स्वदेशी लेना शुरू कीजिये. उनके बहिष्कार से कोई नुकसान भी नहीं है. छोड़ना भी आसान होगा.

जिनकी पिकेटिंग गाँधी जी ने की थी वो दुकानदार भी भारतीय ही थे. एक दो भारतीय व्यापारी जो विदेशी का समर्थन कर रहे हैं उनका नुकसान होगा ही. गेहूं खा कर पलने वाले घुन को तो गेहूं के साथ घुन की तरह पिसना ही होगा.

बाकी रहा सवाल कंप्यूटर, मोबाइल के पुर्जों का तो वो भी होगा धीरे धीरे. रोटी किनारे से तोड़ी जाती है बीच से नहीं. खाना खाने लेने की तो तमीज है ना?

– आनंद कुमार

 

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