या तो आप इस पार स्वदेशी के साथ हैं या फिर रेड कारपेट बिछा रहे

भारत में बनने वाले टीवी सीरियल, फिल्मों का स्तर देखें तो वो कोई ख़ास अच्छा नहीं होता. रामायण पर ढंग से बनाया जाए तो गेम ऑफ़ थ्रोंस जैसे सीरियल से बेहतर सीरीज बनेगी. जैसे एक कम दिखाए जाने वाले चरित्र सुग्रीव को लीजिये. इसे आम तौर पर ना के बराबर दिखाया जाता है. लेकिन सीधा वाल्मीकि रामायण में देखें तो एक अयोध्या काण्ड के अलावा, हर कांड में मौजूद हैं. जो शब्द सुग्रीव के लिए विशेषण के तौर पर इस्तेमाल होते हैं वो हैं, महात्मा, धर्मात्मा, भीमबल या महाबली, तेजस्वी, सत्वसंपन्न!

मतलब कुल मिला कर उसकी तारीफों के पुल बांधे गए हैं. बाली अपने विरोधी की आधी शक्ति खींच लेता था, इसलिए अपने समय के विकट योद्धा जैसे रावण, दुन्दुभी या सहस्त्रार्जुन जैसे योद्धा भी उस से जीत नहीं पाते थे. जाहिर है सुग्रीव भी उस से सामने से लड़ने पर पिट जाता था. ऐसे में सुग्रीव ने राम की मदद ली और बाली को हरा दिया. अगर टीवी देखकर रामायण सीखा है तो सुग्रीव का रोल बस यहीं ख़त्म हो जाता है. इसके बाद वो सिर्फ बगल में खड़े दिखते हैं. लेकिन यहाँ से सुग्रीव का काम शुरू ही हुआ था.

पहली चीज़ तो ये थी कि राम को सुग्रीव की जरुरत इसलिए थी क्योंकि बाली से भागते हुए सुग्रीव ने हर जगह छुपने की कोशिश की थी. उन्हें कई जगहों के जो रास्ते पता थे, वो कोई और उतनी आसानी से नहीं बता पाता. इसके अलावा मरते हुए बाली से सुग्रीव ने वादा किया था कि वो उसके बेटे का ख़याल रखेगा. रामायण के युद्ध में जब अंगद कुम्भ से हारने लगता है तो फ़ौरन कूद कर सुग्रीव उसे बचाने आ जाता है. लेकिन अंगद को बचाने उतरने पर भी वो नियम कायदे नहीं छोड़ता! कुम्भ का धनुष तोड़कर वो उसे दूसरा धनुष ले आने कहता है.

खैर राक्षस तो मानता नहीं, कुम्भ सुग्रीव से लड़कर मारा जाता है. इसके अलावा प्रग्हस, विरूपाक्ष और महोदर जैसे राक्षस भी सुग्रीव के हाथों ही मारे गए थे. सुग्रीव इनकी बारी में किसी राम के आकर मदद करने की बाट जोहता बैठा नहीं रहता है. जब जरूरी था तब मदद जरूर ली, लेकिन वो किसी तारणहार की प्रतीक्षा में बैठा कोई भाग्यवादी नहीं था. नागपाश से घायल पड़े राम लक्ष्मण को सुरक्षित किष्किन्धा भिजवा कर वो खुद के नेतृत्व में रावण के खिलाफ लड़ने के लिए भी तैयार था. अगर टीवी वाले रामायण के हिसाब से सोचें तो आश्चर्य होगा कि वानरों ने सुग्रीव का नेतृत्व स्वीकार क्यों किया?

जब आप पढ़ के रामायण देखते हैं तो आपको पता चलता है कि सुग्रीव किसी लूज़र्स के ग्रुप का टीम लीडर नहीं था. वो अपनी कैपेसिटी में एक ऐसा विद्रोही था जिसने बाली की स्थापित सत्ता के खिलाफ़ बगावत कर डाली थी. वो महाशक्तिमान तानाशाह को चुनौती देता क्रांतिकारी था.

हाल के इतिहास के हिसाब से देखें तो ये कुछ वैसा ही था जैसे नेहरु और सी. राजगोपालाचारी का सम्बन्ध. ये सबको पता था कि व्यापार और उद्योग को बढ़ावा दिए बिना देश का विकास संभव नहीं है. समस्या ये थी कि नेहरु का साम्यवादी समाजवाद तो उद्योगपतियों को अछूत मानता था. अंततः जब बात किसी तरह नहीं बनी तो राजगोपालाचारी ने 1959 में अलग होने का फैसला किया और खुद की ही पार्टी बना डाली.

लेकिन नेहरु के ऐसे फैसलों का असर इतने से कम नहीं हुआ. उनकी सुपुत्री उद्योगपतियों को अछूत मानने में उनसे उन्नीस नहीं इक्कीस ही रही. लगातार कई दशक ऐसी नीतियां झेलने का नतीजा हुआ कि भारत लाइसेंस परमिट राज में पहुँच गया. इस लाइसेंस परमिट राज को ख़त्म करने के लिए कई आन्दोलन भी हुए.

सरकारी अमले के भेदभाव से कंप्यूटर जगत बचा रह गया. धीमे चलने वाली सरकार को पता ही नहीं था कि कंप्यूटर होता क्या है. उन्हें ना मालूम होने के कारण जब सूचना क्रांति की कंपनियां बनी तो उनका ज्यादा विरोध भी नहीं हुआ. इस तरह भारत इंडस्ट्रियलाइज़ेशन का दौर स्किप कर के सर्विस इकॉनमी में पहुँच गया.

आज जब चीनी सामान के बहिष्कार की बात होती है तो पुराने कांग्रेसी व्यंग करते हैं कि पहले जिस कंप्यूटर-मोबाइल का इस्तेमाल पोस्ट करने के लिए कर रहे हो वो तो छोड़ो! उनके लिए मेरा जवाब शिवाजी की कहानी वाला है. हम रोटी बीच से ही खाना शुरू नहीं करते. गर्म होगी हाथ जलेगा, उसे किनारे से धीरे धीरे तोड़ेंगे.

पहले छोटी चीज़ें बाहर करो, फिर बड़ी चीज़ों तक भी पहुँच जायेंगे. दूसरी चीज़ कि गाँधी जब विदेशी का बहिष्कार कर रहे थे और दुकानों की पिकेटिंग करते थे तो वो सिर्फ विदेशी का विरोध नहीं था. विदेशी माल बेचने वाला दुकानदार तो घर का ही था ना? बाली की तरह? क्या वो ये कह रहे हैं कि आज के दौर में गाँधी अप्रासंगिक हो चुके हैं?

आवश्यकता अविष्कार की जननी है. महंगे ब्रांडेड कंप्यूटर से निपटने के लिए असेंबल्ड कंप्यूटर का बाज़ार पर कब्ज़ा करना, हम-आप सब पिछले दस पंद्रह साल में देख चुके हैं. लकीर बिलकुल स्पष्ट खिंची हुई है. या तो आप इस पार स्वदेश और स्वदेशी के साथ हैं या फिर आप रेड कारपेट बिछा रहे हैं. किस तरफ जाना है ये आपको तय करना है.

एक-दो बार आपको कहीं और से सहायता मिल जाएगी. लेकिन ये सहायता मुफ्त की नहीं आती, अगर बाली को मारने में राम मदद करेंगे तो रावण से लड़ने में आपको भी सहयोग देना होगा. सांसद जन प्रतिनिधि होता है. जब तक जनता की भावना का उसे पता नहीं चलेगा वो अपने आप क्यों कोई बात शुरू करे? नेहरु वाले ट्रिकल डाउन इफ़ेक्ट को भूलकर जनता को ही फैसले अपने हाथ में लेने चाहिए.

लोकतंत्र में हैं हम, किसी परिवार की सत्ता या तानाशाही में तो नहीं! हमें अपनी मर्ज़ी तो बतानी ही होगी. राम के उतर के आने तक इंतजार करना मूर्खता होगी, एक आध कुम्भ तो अपने हाथ से ही निपटाने होंगे. विरोधी का साथ देता कोई विरूपाक्ष, कोई महोदर खुद ही मार लेंगे. सरकार की प्रतीक्षा किस लिए है?

अंत के लिए सरकार फ़िल्म का एक सीन भी याद कर सकते हैं. जहाँ अभिषेक बच्चन सत्ता सँभालने के बाद एक कालनेमि टाइप साधु का वेश धरे दलाल से मिलने जाता है. साधु उसे जैसे ही भगवद्गीता सुनाने की कोशिश करता है तो उसकी बात बीच में ही काट दी जाती है. एक हाथ में पिस्तौल और दूसरा खाली हाथ बढ़ा कर कालनेमि से कहा जाता है तुम्हारे पास दो रास्ते हैं. या तो हमसे मिलो, या अपने भगवान से.

बाकी कलाकार और व्यापारी होने के नाम पर छूट मत मांगिये जनाब! भारत के बहुसंख्यक समाज को आपने पिछले दस दिन में ही देखा है, ये साधु होने के नाम पे तो क्या, मोदी होने के नाम पे भी छूट नहीं देता!

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