सीमा का प्रत्यक्ष युद्ध उस युद्ध के आगे कुछ नहीं, जिससे वर्षों से हारते हुए जूझ रहे हैं हम!

उरी न तो पहला है और न अंतिम होगा. ऐसा इसलिये और भी अधिक है कि संसार का कोई तंत्र उस व्यक्ति को ध्वंस करने से नहीं रोक सकता जिसने अपनी जान का मोह त्याग दिया हो, मोह तो त्याग ही दिया हो बल्कि दूसरे लोक में भोग को मन:प्रशिक्षित हो चुका हो. ध्वंस को कम किया जा सकता है, टाला जा सकता है लेकिन आशंका सर्वदा रहनी है. यह सभ्यता का संकट है.

खिलाफत को मोहनदास गांधी द्वारा मान्यता दिये जाने से बीज रूप में जिस अरब आतंकवाद को शह मिली उसकी चरम परिणति मोहमदियों के लिये अलग कृत्रिम देश की स्थापना में हुई. चूँकि उस कृत्रिम देश का औचित्य ही भारत द्वेष से सिद्ध होता है इसलिये हम तब से युद्ध में हैं. यह एक वास्तविकता है.

कमी इसमें है कि हमने इसे स्वीकार कर कोई स्थायी नीति नहीं बनाई. 1948, 1962, 1965, 1971 और आगे भी प्रत्यक्ष युद्धों में बार-बार हम हारते रहे लेकिन न तो समझ आयी और न ही स्थायी आत्महंता सम्मोहन से मुक्ति मिली. युद्धों में हार की बात आप को विचित्र लग सकती है लेकिन बस इतना समझिये कि युद्ध में हार-जीत का बस एक मानक होता है – अंतिम परिणाम. परिणाम कभी हमारे पक्ष में नहीं रहे.

युद्ध सीमा पर सेना कम लड़ती है, घर में जनता अधिक. जब मैं जनता की बात कर रहा हूँ तो उसके कई पहलू हैं. जनता में स्वार्थी समूह होते हैं. उनकी चेतना बस अपने समूह के हितार्थ ही काम करती है. ऐसे में अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष दोनों तरह के युद्धों में ऐसे समूह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में देशहित के विरुद्ध काम करते हैं.

भारत में ऐसे समूह बहुत अधिक हैं, कारण वही पुराना है – राष्ट्रीय स्तर पर आत्महंता सम्मोहन का प्राचुर्य जिसका सबसे अधिक प्रभाव शिक्षा तंत्र पर है. सतर्क सुरक्षा संस्कृति तो छोड़िये, हमने सहज प्राकृतिक सुरक्षा बोध से हीन चलते फिरते डोडो ही तैयार किये, किये जा रहे हैं. ये अपनी रक्षा तक नहीं कर सकते, आत्मघाती आक्रमण तो बहुत दूर की बात है.

सामाजिक मीडिया पर मंच के स्वभाव के कारण समूह हितैषी बहुत स्पष्ट रूप में सामने आते हैं. जो स्पष्ट रूप से उन्माद में आ कर तुरंत कार्यवाही की माँग करते हैं या जो संयम का राग अलापते हैं उनको पहचानना कम कठिन है.

पहचान उस समूह की कठिन है जो जान बूझ कर और अनजाने भी आत्महंता सम्मोहन के प्रभाव में अपनी प्रतिक्रिया लिखता है. किसी बड़ी घटना के होने तक वह समूह ऐसे मुद्दों पर क, ख, ग भी नहीं लिखता लेकिन घटना हुई नहीं कि त्वरित प्रतिक्रिया के साथ उपस्थित हो जाता है. निन्दा करता है, सहानुभूति व्यक्त करता है और भावुक बातें करने के बाद अपने ‘समूह हित’ की बात धीरे से सरका देता है.

यदि निकट भूत में या वर्तमान में भी ऐसी घटनायें हुई हैं जिनके कारण उसका समूह लज्जित है या उसकी किरकिरी हुई है तो ऐसे स्वर्णिम मौके का उपयोग वह चिकनी धवल बातों के बहाने जनता के मन में हानिहीन दिखता कीड़ा सरकाने में करता है. समूह लज्जा से उबरने के लिये वह बड़ी बातें करता है ताकि ध्यान हट कर बड़ी घटना पर केन्द्रित हो जाय. यह काम वह कुटिल दक्षता के साथ करता है. इस मामले में वह स्वार्थी मुख्य मीडिया की हरकतों को ही प्रतिबिम्बित कर रहा होता है.

ऐसों से सतर्क रहिये जो कृत्रिम संतुलन स्थापित करती चिकनी चुपड़ी या घुमावदार बातें करते हों. समस्या इसकी होगी कि आम में बौर टिक नहीं रहे तो वे ग्लोबल वार्मिंग पर विफलता की बात अवश्य करेंगे. पेयजल से जुड़ा कोई मामला होगा तो वे पड़ोस के केबल ऑपरेटर की समस्या ला पटकेंगे.

यदि बारीकी से ध्यान दें तो आप पायेंगे कि ऐसे समूह नवधनाढ्य वर्ग से अधिक जुड़ते हैं. यह वर्ग अपने हित को ले कर सबसे अधिक संकीर्ण होता है लेकिन विश्व बन्धुत्व से कम कुछ भी नहीं कहता! ऐसे ‘प्रतिक्रिया’वादियों से सतर्क रहने की आवश्यकता है जिन्हें अपने आकाओं और उनके खानदानियों का कुछ वर्षों में ही हजारों करोड़ की सम्पत्तियों का स्वामी हो जाना खटकता ही नहीं बल्कि वे वरेण्य और अनुकरणीय लगते हैं. सीमा का प्रत्यक्ष युद्ध इस युद्ध के आगे कुछ नहीं है जिससे हम वर्षों से हारते हुये जूझ रहे हैं.

हाँ, युद्ध में विजय महत्वपूर्ण होती है, कायराना या शायराना तरीके नहीं. एक बार पुन: हम हारे हैं और वे विजयी, किंतु इससे हताश नहीं होना है बल्कि भीतर छिपे क्षुद्र-हित-समूहों को पहचानना है. अरबी आतंकवादी मजहब का नाश हो. वीर बलिदानियों को नमन और श्रद्धांजलि.

शेष सनातन

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