सिंधु नदी संधि : दुनिया हंसती है भारत की ऎसी ‘उदारता’ पर

आइये, सिंधु नदी समझौते के बारे में भी ज़रा साक्षर हुआ जाए. हालांकि हज़ारवीं बार यह दुहरा रहा हूं कि पाकिस्तान या किसी भी दुश्मन के खिलाफ मत व्यक्त करने के लिए आपको किसी भी विशेषज्ञता की ज़रूरत नहीं है. लगातार कहते रहिये, बोलते रहिये आक्रमण…!

सिंधु नदी संधि को आधुनिक विश्व के इतिहास का सबसे उदार जल बंटवारा माना जाता है. इसके तहत पाकिस्तान को 80.52 फीसदी पानी यानी 167.2 अरब घन मीटर पानी सालाना दिया जाता है. नदी की ऊपरी धारा के बंटवारे में उदारता की ऐसी मिसाल दुनिया के और‍ किसी जल समझौते में नहीं मिलती है.

इसी हफ्ते इस समझौते के 56 साल पूरे हुए हैं. 19 सितंबर 1960 को यह संधि नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के हस्ताक्षर से संपन्न हुई थी. बंटवारे के बाद से ही भारत ने पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी देना बंद कर दिया था.

दशक भर तक इस पानी के लिए पाकिस्तान नाक रगड़ता, गिड़गिड़ाता रहा था. इसी समझौते के तहत कब, कितना पानी गया, इसका हर महीने पाकिस्तान को भारत हिसाब देना अनिवार्य है.

अकेले सिंधु नदी की लम्बाई ही 3180 किलोमीटर है, यह गंगा से 655 किलोमीटर ज्यादा बड़ी है. सिंधु कराची के पास सागर में मिलती है. संधि को खत्म कर अगर इस पानी का इस्तेमाल भारत में हो तो कृषि आदि में बढ़ोतरी के अलावा 20 हज़ार मेगावाट बिजली का उत्पादन कश्मीर में किया जा सकता है.

जम्मू-कश्मीर इस समझौते का विरोध करता रहा है. संधि टूटने पर 17 ख़रब के क़र्ज़ में पहले से ही डूबे पाकिस्तान की कृषि तबाह हो जाएगी. पाकिस्तान का 65 प्रतिशत भू-भाग इन नदियों के किनारे है. उसकी अधिकतर बिजली परियोजनाएं ठप पड़ जायेगी. तबाह हो जाएगा पाकिस्तान.

हालांकि भारत को भी इस पानी को रोकने के लिए अनेक बांध और नहरें बनाने की ज़रूरत होगी. कुछ विस्थापन भी होगा. मेधा पाटकरों को नए सिरे से रोज़गार मिलने की आशंका भी साथ ही होगी. भारत के कर्णधारों ने इस समझौते की ‘समीक्षा’ करने के संकेत दिए हैं. इस संकेत से यह संधि खत्म हो, ऐसी उम्मीद जगी है.

संदर्भवश इतना और बता दें कि पाकिस्तान के प्रति भारत का ऐसी उदारताओं का इतिहास रहा है. कोई भी स्वतंत्र विश्लेषक भारत की ऐसी ‘उदारता’ पर हंसते हुए ही टिप्पणी करना चाहेगा.

आप जानते हैं ऐसी ही उदारता के कारण, ख़ास कर युद्ध न हो जाए इस ‘डर’ से गुजरात के कच्छ रणक्षेत्र का 300 वर्ग मील का हिस्सा ब्रिटिश मध्यस्थता में 1968 में हमने पाकिस्तान को सौंप दिया था. अन्य तमाम ‘उदारताओं’ और उनके प्रतिफल के बारे में तो आप खैर जानते ही हैं.

(तथ्य विभिन्न समाचार माध्यमों से)

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