वामपंथियों को डराता हुआ हड़प्पा का भूत हर बार हाज़िर हो जाता है नई उम्र लेकर

क्या आपने भी बचपन में वो अँधेरे में चमकने वाली घड़ियाँ देखी हैं? वही जिनके डायल पर कुछ सेक्युलर रंग का लगा होता था, अँधेरे में हरी रौशनी सी होती थी उस से. उसे कई बार रेडियम डायल भी कहा जाता था. जबरन चादर या कम्बल में घुस कर उसे चमकते देखना बड़ा मजेदार होता था. बचपन में लगता था कि यही रेडियम (Radium) है जिस से परमाणु बम बनता है. 5-6 हज़ार घड़ियाँ होती तो हम भी बड़ा बम बनाते. बाद में पता चला वो रेडियम नहीं होता, फॉस्फोरस (Phosphorous) होता है. रेडियम से सस्ता, मामूली होता है फॉस्फोरस. ये सेक्युलर रंग की चीज़ें अक्सर धोखा दे जाती हैं.

मगर फॉस्फोरस भी कोई कम अनोखी चीज़ नहीं होती. इसके खोजे जाने की कहानी भी अनोखी है. पुराने ज़माने में इसाई लोग विज्ञान में कम और चमत्कारों में ज्यादा यकीन रखते थे. आज भी चर्च से संत बनाये जाने के लिए चमत्कार जरूरी है. ऐसी ही चमत्कारी खोजों में लगे लोगों को अलकेमिस्ट कहा जाता था. जर्मनी के Hennig Brand (c. 1630 – c.1692 or c. 1710) भी अलकेमिस्ट थे और सीसा (Lead) और लोहे जैसी अन्य धातुओं को सोना बनाने के लिए नित नए प्रयोग करते थे.

अपने प्रयोगों के लिए उन्होंने अपना ही 1500 लीटर पेशाब भी जमा कर रखा था. एक दिन वो अपने पहले से उबाल-उबाल कर concentrated किये हुए पेशाब को और उबाल रहे थे कि उनकी प्रयोगशाला में एक दुर्घटना हो गई! अचानक ही उबल-उबल कर गाढ़े हुए पेशाब में से तेज़ रौशनी सी निकलने लगी, मर्तबान फट गया और सारी चीज़ें लगभग बिखर गई! लेकिन जो चमकीली चीज़ निकली वो फॉस्फोरस थी और थोड़ा सा फॉस्फोरस हेन्निग ब्रांड बचाने में कामयाब हो गए थे. इस तरह फॉस्फोरस की खोज हुई.

कई बार जो गाँव के शमशान में राक्षस या भूत होने की बात होती है वो फॉस्फोरस है. हड्डियों में भारी मात्रा में फॉस्फोरस होता है जो शव को जलाए जाने पर लकड़ियों पर लगा कभी-कभी छूट जाता है. इसी सेक्युलर रंग की यानी हरी रौशनी को गाँव वाले कभी कभी राकस यानी एक किस्म का भूत मान लेते हैं.

ऐसा ही एक राकस हड़प्पा सभ्यता के नाम से प्रसिद्ध अनूठी भारतीय सभ्यता है. मैं उसे अनूठी इस मामले में भी मानता हूँ क्योंकि ये बार-बार वामपंथी धर्मावलम्बी उपन्यासकारों के लिखे तथाकथित ‘इतिहास’ से पर्दा उठा देती है. जहाँ तहां से एक तो निकल आती है और वामपंथी धर्मावलम्बी उपन्यासकारों के लिखे ‘आर्यन इन्वेज़न थ्योरी’ को मक्कारी साबित कर देती है. ऊपर से नुकसान ये कि हर बार इसकी तारीख पीछे, और पीछे खिसकती जाती है. ऐसे में जिन हिन्दुओं की धर्म-संस्कृति सम्बन्धी किताबों को तथाकथित इतिहासकार ज्यादा से ज्यादा तीन हज़ार साल पुराना कहते थे, वो और पुरानी सिद्ध हो जाती हैं.

सन 1963 में ही जब घाघरा और झज्हर नदियों के पास से इस सभ्यता के अवशेष मिलने लगे तो सबसे पहले तो जिस सरस्वती नदी को वो मिथक मानकर थूक बैठे थे, वो उन्हें वापिस चाटना पड़ गया. इस बार सुप्रतिष्ठित पत्रिका ‘Nature’ में छपी अपनी रिपोर्ट में ASI और IIT के शोधकर्ताओं ने सिद्ध कर दिया है कि ये सभ्यता कम से कम 8000 साल पुरानी है. भारत में मौजूद इस सभ्यता के लोथल, धोलावीरा और कालीबंगन केन्द्रों पर अभी भी खुदाई का काम चल ही रहा है. इस सभ्यता के शुरुआत के काल तक पुरातत्ववेत्ता अभी भी नहीं पहुँच पाए हैं.

बाकी ये तो तथाकथित ‘पर-गति-शील’ उपन्यासकार भी मानते ही हैं कि भारतीय इतिहास को फिर से लिखा जाना चाहिए. हमारी दुआ है कि उनकी ये कामना जल्दी पूरी हो.

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