ब्रांड मोदी का तिलिस्म : बौद्धिक बटुआधारियों को इसे पढ़ना चाहिए, बार बार पढ़ना चाहिए

अगर कोई पत्रकार और चुनाव विश्लेषक अपने दौर में घटित राजनीतिक घटनाक्रम के गुँथे सभी तारों को अपनी सूक्ष्म बारीक दृष्टि से खोल दे तो सचमुच यह कला अपने दौर के सभी लोगों के लिए एक नज़ीर है.

मैं पत्रकार और चुनाव विश्लेषक श्री धर्मेन्द्र सिंह की बात कर रहा हूँ जो इस वक़्त ABP News में एसोसिएट एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. अपनी किताब  “ब्रांड मोदी का तिलिस्म”  में लेखक ने एक उत्कृष्ट कुशल राजनीतिक विश्लेषक के रूप में इस किताब में 2014 लोकसभा चुनाव के सभी संदर्भों का सटीक, सरल और प्रामाणिक विश्लेषण किया है.

इस विश्लेषण के द्वारा उन सभी दबे चुनावी रहस्यों को बारीकी से उजागर किया गया है जो अब तक एक जगह मौजूद नहीं थे. कह सकता हूँ कि यह किताब 2014 के लोकसभा चुनाव के सूक्ष्म विश्लेषणों का एक चमकता आइना है.

इस किताब का प्रथम पैरा ही राजनीतिक भावों की गहराई को बड़ी सरलता से इंगित करता है. इसमें  राजनीतिक बदलाव के मर्म को बारीकी से समझने का निर्देश दिया गया है. विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा पुरानी राजनीतिक पद्वति की जगह राजनीति के नए रास्तों की सार्थक व्याख्या की गई है. मोदी सरकार के काम-काज के प्रदर्शन, जनता की आकांक्षाओं, चाहतों,  बेचैनियों, पुरानी सरकार से मिली निराशाओं आदि की वैज्ञानिक व्याख्या की गई है.

मोदी के ब्रांड कहने का तात्पर्य शायद यही होगा की मोदी ने राजनीति के पुराने ढंग को छोड़ एक नई राजनीति की शुरुआत की और इस बदलाव के ब्रांड के प्रतीक के रूप में जनता के समक्ष खुद को पेश किया. लेकिन इसी किताब की अगली लाइन दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद ब्रांड मोदी को सवालों के घेरे में खड़ा करती है. अर्थात यह किताब मोदी के ब्रांड मानने के एकतरफा पूर्वाग्रहों से मुक्त है. दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव की हार से क्या ब्रांड मोदी का जादू फीका हुआ है? इसका विश्लेषण भी आगे साफ़ साफ़ कर  दिया गया है.

इस किताब के द्वारा राजनीतिक बदलाव में मध्यमवर्ग की भूमिका को नए तरीके से दिखाया गया है. इस वर्ग में उभरती आकांक्षाओं, उम्मीदों का चुनाव पर पड़ने वाले असर पर सार्थक बातें की गई हैं.  दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों के माध्यम से मध्यमवर्ग के चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की शक्ति का अंदाज़ा दिखाया गया है.

श्री सिंह लिखते हैं “इस वर्ग के पास जो है उससे उसे संतोष नहीं है, बल्कि जो नहीं है उसके प्रति असंतोष हमेशा बना रहता है. इस वर्ग को कभी अटल बिहारी वाजपेयी अच्छे लगे तो कभी सोनिया गांधी अच्छी लगीं. कभी मनमोहन सिंह इसके चहेते बने, तो कभी अरविन्द केजरीवाल. इस बार उनकी उम्मीदें नरेंद्र मोदी पर टिक गईं.”

इसके अलावा  हिन्दू मुस्लिम समीकरण का असर, ओबीसी, दलित और आदिवासियों के मतों का भाजपा के पक्ष में जाना, कांग्रेस के हार के कारणों की समीक्षा आदि को स्पष्ट किया गया है.  2014 लोकसभा चुनाव में जनता के निर्णय ने कई सवालों को जन्म दिया है. चुनाव विश्लेषण के माध्यम से लेखक श्री धर्मेन्द्र ने इस किताब में कई दूरगामी राजनीतिक सवालों को भी उठाया है. इन सवालों का जवाब निश्चित तौर पर राजनितिक दलों को खोजना चाहिए.

चुनावों में मीडिया की भूमिका के बारे में इस चुनाव में इसके बारे में श्री धर्मेन्द्र लिखते हैं –
“इसमें कोई शक नहीं की भारतीय आम चुनावों में ऐसा संगठित, व्यापक और सघन प्रचार अभियान इक्का दुक्का अपवादों को छोड़कर अब तक नहीं देखा गया. इस प्रकार अभियान ने अतीत के सारे प्रचार अभियानों को बहुत पीछे छोड़ दिया था. यह लगभग कॉरपेट बॉम्बिंग की तरह था जिसने देश का कोई कोना चाहे शहर हो क़स्बा या गाँव और कोई मतदाता नहीं बचा.”

इस किताब में इसी लोकसभा चुनाव से मिलती जुलती पूर्व चुनावी इतिहास पर भी गहन समीक्षा की गई है. 2002 से लेकर 2014 तक के दो लोकसभा चुनाव और गुजरात के विधानसभा चुनाव में गुजरात दंगे के इर्द गिर्द देश की राजनीति कैसे चल रही थी इस पर भी तर्कपूर्ण बातें की गई है.

लेखक ने सार्थक आंकड़ों के माध्यम से अपने चुनावी विश्लेषण को साइंटिफिक बना दिया है. इस किताब में जितने भी आंकड़े दिए गए हैं वे सब चुनावी तथ्यों से जुड़े हुए हैं और चुनावी हकीकतों से रूबरू कराते हैं. “1996 में 19 फीसदी वोटर रोज़ टीवी न्यूज़ देखते थे, वहीं 2014 में उनकी संख्या बढ़कर 46 फीसदी पंहुच चुकी है. इसका अर्थ हुआ कि लगभग हर दूसरा वोटर नियमित रूप से टीवी न्यूज़ चेनल देखता है. ”

इस किताब के अंतिम चैप्टर में संघ की परिवर्तनकारी भूमिका और भाजपा की अभूतपूर्व विजय में डॉक्टर शिव शक्ति बक्सी  संघ के वास्तविक उद्देश्य को बताते हुए लिखते हैं कि ” संघ का वास्तविक उद्देश्य है देश और व्यक्ति के मध्य एकात्म की सृष्टि करके एक सामंजस्यपूर्ण भेदभाव रहित समाज का गठन. संगठन का लक्ष्य है देशवासियों में मानसिक एकता की सृष्टि. स्पष्टतः संगठन केवल Material या दैहिक तत्व नहीं है . इसको हम ‘Cadre building for a noble cause’  कह सकते हैं.

यह किताब मुझे बेहद पसंद आई. चुनाव विश्लेषक के रूप में श्री धर्मेन्द्र ने खुद को दूसरों से अलग साबित किया है. यह किताब पढ़ी जानी चाहिए बार बार पढ़ी जानी चाहिए खासकर उन बौद्धिक बटुआधारियों को जिन्होंने मोदी और बीजेपी के जीत को अभी तक ठीक ढंग से समझा नहीं है और समय समय पर अपने पूर्वाग्रहों से आक्रामक होकर ट्वेंटी ट्वेंटी खेलने लगते हैं.

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