जब इतिहास पूछे तो कहना, मैं ‘महर्षि कलाम’ के युग में रहता था

कहानियां सुनाने की आदत सी है सो सबसे पहले कहानियों की किताबें याद आती हैं, “अग्नि की उड़ान” जैसी किताबें. ये किताबें दक्षिण भारत के किसी तमिल मुस्लिम परिवार छोटे से बच्चे की भी एक कहानी सुनाती थी, जो पढ़ाई में बहुत तेज़ नहीं हुआ करता था. बच्चा अपनी पढ़ाई के खर्चे में मदद के लिए दसवीं के बाद अखबार बांटने लगा.

विज्ञान के विषयों से पढ़ाई के बाद एरोनॉटिक्स इंजीनीयरिंग की पढ़ाई उसने छात्रवृत्ति की मदद से कर ली. लेकिन किस्मत बहुत अच्छी नहीं थी शायद ! IAF के फाइटर पायलट की परीक्षा में बैठा तो सीटें 8 ही थी और उसका रैंक नौवां था. कह सकते हैं कि शुरूआती दिन अच्छे नहीं गुजरे, मगर इतने पर हिम्मत हार जाता वो लड़का तो उसे इतिहास याद नहीं रखता. इतिहास हारे हुए लोगों के किस्से कहाँ सुनाता है?

इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि वो साइंटिस्ट बन गए. 60-70 के दशक में वो SLV – III के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे और “रोहिणी” नाम के उपग्रह को धरती की कक्षा में 1980 की जुलाई में स्थापित कर दिया. ये भारत का पहला अंतरिक्ष में जाने वाला राकेट था. 70-80 के दशक में वो पोलर सॅटॅलाइट लॉन्चिंग व्हीकल (PSLV) पर काम शुरू कर चुके थे. ये भी एक कामयाब मिशन था.

इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि 1998 में कार्डियोलॉजिस्ट सोम राजू के साथ मिलकर उन्होंने कम कीमत का कोरोनरी स्टेंट बना डाला था जिसका नाम कलाम-राजू स्टेंट रखा गया.

इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि 2012 में इसी कार्डियोलॉजिस्ट सोम राजू के साथ मिलकर उन्होंने ग्रामीण इलाकों तक चकित्सा सेवाएँ पहुँचाने के लिए एक टेबलेट कंप्यूटर कलाम-राजू टेबलेट बना डाला था.

कैबिनेट ने मंजूरी नहीं दी थी, लेकिन श्रीमती इंदिरा गांधी को नजर आ गया था कि PSLV की तकनीक से मिसाइल बनायी जा सकती है. उन्होंने कलाम के लिए बिना किसी को बताये फण्ड जारी कर दिए.
इतिहास इस आदमी के किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि इसने देश के लिए “पृथ्वी” और “अग्नि” बना डाला था.

पूरी दुनिया भारत को परमाणु बम की तकनीक नहीं देना चाहती थी. वो भी तब जब रेडियोएक्टिव थोरियम जैसी चीज़ें उन्हें हमारे ही खदानों से चाहिए थी. इसकी हलकी सी कोशिश ने ही देश पर जाने कितने व्यापारिक और सामरिक प्रतिबन्ध लगवा डाले थे. कोशिश वहीँ ख़त्म हो जाती तो इतिहास के पन्नों का ध्यान भी कहीं और चला जाता.

इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि उन्होंने कोशिश बंद नहीं की. गुप्तचर एजेंसियों से छुपते छुपाते बम बना लिया गया. फिर एक दिन छोटा सा संदेशा आया “बुद्धा स्माइलिंग”! तमाम प्रतिबंधों और निगरानियों के बावजूद भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन चुका था.

इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि वो एक शिक्षक थे. अपने अंतिम समय तक भी वो कॉलेज के बच्चों की विज्ञान में रूचि जगाते रहे. इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि उनके लिए मजहब नहीं राष्ट्र मायने रखता था. इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि I am Kalaam फिल्म का “छोटू” इस इंसान से प्रेरित होकर अपना नाम “कलाम” रख लेता है. इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि जब कहा जाता है कि भारत अनेकताओं में एकता का देश कैसे है तो हम इसकी तस्वीर दिखा के कहते हैं कि ऐसे है! इसके लिए हिंदी भाषी और अहिन्दी भाषी का भेद नहीं रहा! इसके लिए हुलिए, रंग, जाति और मजहब का भेद नहीं रहा! इसे राष्ट्रपति बनाने के लिए कांग्रेस और बीजेपी का भी भेद नहीं रहा!

ये आदमी इतिहास हुआ नहीं है, ये इतिहास बनाया गया है! इतिहास उनके किस्से इसलिए भी सुनाता है क्योंकि ये कलाम था!

इतिहास ऐसे ही लोगों के किस्से सुनाता है. इतिहास शायद मेरे किस्से नहीं सुनाएगा. लेकिन अगर कभी कहीं गलती से इतिहास मेरे बारे में पूछ बैठे तो कहना…
ये आदमकद लोगों के जमाने में नहीं, बल्कि विशालकाय महामानवों के युग में रहता था…

ये बुलबुले जैसे ख़त्म होने वाले लोगों के समय में नहीं, बल्कि कभी ना ख़त्म होने वाले “नाम” के युग में रहता था…

कहना कि मैं विश्व के विरोध के बीच परमाणु शक्ति पालने वाले के युग में रहता था…

कहना कि मैं “मिसाइल मैन” के युग में रहता था…

जब इतिहास पूछे तो कहना, मैं महर्षि “कलाम” के युग में रहता था…

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