मंदिर तोड़ने आए औरंगज़ेब को भी स्वीकार करना पड़ा सनातन धर्म!

चौंक गए ना…? जी हाँ मित्रों आज गुरु जी के आश्रम में श्रीराम कथा सुनने एक महात्मा पधारे थे…. उनसे यूँ ही बातों-बातों में पता चला कि वे जिस छोटे से मंदिर में रहते और पूजा पाठ करते हैं वो क्रूर मुग़ल शासक औरंगज़ेब ने बनवाया था.

पहले तो मुझे भरोसा ही नहीं हुआ. काफी तर्क वितर्क हुए, बाद में मैंने स्वयं वहाँ जाकर तसल्ली की. इसके पीछे लंबी कहानी है जो मुझे महंत मंगलदास जी महाराज, जो कि ऊपर चित्र में दृष्टव्य हैं, उन्होंने ही सुनाई. जो जानकारी हाथ लगी है उसे बाँट रहा हूँ.

मुग़ल आक्रांता औरंगज़ेब जब एक-एक करके सारे मंदिरों को तोड़ रहा था उसी क्रम में उसने चित्रकूट के इस छोटे से मंदिर को भी तोड़ने का असफल प्रयास किया था. इसमें उसकी सारी सेना महाराज जी के तप के कारण मूर्छित हो गई थी.

अपनी सेना को बचाने के लिए उसे स्वयं यहाँ आकर मंदिर के महंत बाबा बालक दास जी के समक्ष उपस्थित होना पड़ा…. पर उसनें पहले स्वामी जी के सामने झुकने से मना कर दिया कहा कि मैं मुसलमान हूँ और इस्लाम को मानता हूँ इसलिए अल्लाह के अलावा किसी इंसान या बुत के सामने नहीं झुकता.

इस पर स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए ना सिर्फ उसे पहले समझाया बल्कि अपनी शक्ति का अनुभव भी कराया. उन्होंने उसका अहंकार चूरकर कहा कि मैं तुम्हें और तुम्हारी सेना को तभी क्षमा और मुक्त करूँगा जब तुम ये कहो कि तुम भी सनातन धर्मी बनकर रहोगे…. उसे कहना ही पड़ा…. कि ना मैं मुसलमान हूँ और ना ही इस्लामिक मैं इस शक्ति के सामने ना सिर्फ झुकता हूँ बल्कि स्वीकार करता हूँ कि मैं सनातन धर्मी ही हूँ…

तब जाकर बालक दास जी महाराज ने उसे क्षमा दान दिया था… उस मुग़ल की औक़ात चित्रकूट के इस छोटे से श्री बालाजी मंदिर और यहाँ के सिद्ध संत श्री बालक दास जी महाराज ने बिना शस्त्र उठाये ही बता दी थी… जिनके आगे वो बेबस हो गया था.

जो ना तो मंदिर तोड़ पाया और ना ही बालकदास जी को कुछ कर पाया बल्कि उनके आगे नतमस्तक हो सनातन धर्म का लोहा माना और सनातन धर्म को स्वीकार भी किया था, बाद में इस मंदिर का जीर्णोद्धार और बाकी खर्चे भी औरंगज़ेब ही उठाया करता था.

इस बात के साक्ष्य आज भी इसी छोटे से मंदिर में यहाँ के महंत ने सहेज कर रखे हुए हैं.

बालक दास जी के कहने पर औरंगज़ेब को उनकी शर्त भी माननी पड़ी थी कि आज से वह ना तो कोई मंदिर तोड़ेगा और ना ही किसी भी सनातन धर्मी का अपमान करेगा… तब जाके उसकी सेना को बालकदास जी महाराज ने क्षमा किया था….

जैसा कि मुख्य चित्र में मंदिर की दीवार पर आप देख सकते हैं- लिखा है कि ये मंदिर बादशाह औरंगज़ेब ने सन् 1683 में बनवाया था, जबकि मंदिर के अंदर की दीवार पर छोटा सा सन्देश भी लिखा है, जिसमें कहा गया है….

‘ये जो यहाँ बैठा है वो मस्ज़िद से न्यारा है, जो राम तुम्हारा है वही अल्लाह हमारा है’

स्वामी बालकदास जी और स्वयं औरंगज़ेब के बीच एक लिखित समझौता हुआ था पत्र में उसने जो बात कही थी उसे यहाँ की दीवार पर लिखा गया है

समयाभाव के चलते फिलहाल ये थोड़ी सी जानकारी दे रहा हूँ डिटेल जानकारी बाद में तब तक सर्च करिये शायद गूगल बाबा कुछ सहायता कर पाएं.

गूगल पर खोज करने पर जो मिला वह भी उपरोक्त कथ्य की पुष्टि करता है. पाकिस्तान की एक वेबसाइट के मुताबिक़ औरंगजेब वहाँ गया तो था  मंदिर तोड़ने के ही इरादे से, लेकिन नजदीक पहुँचते ही उसकी सेना को भयंकर पेटदर्द शुरू हुआ, जिसके चलते वजह से सैनिक बेहोश होने लगे.

तब एक स्थानीय व्यक्ति ने औरंगजेब को महंत बाबा बालक दास की शरण में जाने को कहा. जिंदा पीर कहलानेवाले सच्चे मुसलमान औरंगजेब को सच्चाई समझ में आई और वो बाबा की शरण में पहुंचा.  तकलीफ न पहुंचाने के आश्वासन के साथ काफी स्वर्ण भी दे कर निजात पा ली जिससे यह मंदिर बना.

हैरत की बात यह है कि मुस्लिम मुल्क कहलाने वाला पाकिस्तान तो इस आक्रान्ता के सनातन धर्म के आगे घुटने टेकने की खबर प्रकाशित कर देता है, पर भारतीय मीडिया को इस मामले में चुप्पी साधे रखना ही श्रेयस्कर लगता है. पाकिस्तानी वेबसाइट डिफेन्स डॉट पीके पर पूरा लेख पढ़ा जा सकता है –

http://defence.pk/threads/temple-constructed-by-aurangzeb-at-chitrkoot.202091/

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