जे आधी रोटी दही बूरे सै और खा लै…

एक बात गारंटी की है… अनंत अंबानी ने जिन 16 महीनों में अपना वजन 108 किलो घटाया, उस अवधि में उसके डॉक्टर या ट्रेनर जो भी हो, ने नीता अंबानी को उसके पास झाँकने तक ना दिया होगा… और वो अदनान सामी तो खैर अपनी माँ से दूर था ही…

व्यक्ति के मोटापे और उसकी माँ का बहुत गहरा रिश्ता है… इन माँओं के लिए उसका बेटा हर समय भूखा होता है…

बेटे को ठूंस ठूंस कर खिलाने के बाद भी जब तक माँयेँ अपने हिस्से के भोजन से एक दो कौर… हो सके तो पूरी रोटी या परांठा बेटे को ना खिला दें, उनका बेटा भूखा ही होता है…

बेटे को भोजन कराते समय इन माँओं का गणित बड़ा विचित्र होता है… “बेटा आज तोय का है गयौ… बस्स दो रोटी खाईं एं तूनें… काँ पै ऐ तेरौ ध्यान… जा खाने के टैम तौ नेंक ढंग सै बैठ जायै कर…”

और मैं यहाँ सोच रहा हूँ इत्ती देर में कुल्ल दो रोटी? तभी “लै जे एक रोटी तौ खा लै… बन तौ रौ ऐ भौत जादा… जे खावौ पीवौ यी काम आवै…”

मईयो के लेक्चर चालू हैं और मैं झुँझला रहा हूँ… मईयो एक रोटी कह रही थी लेकिन उसने दो रोटियाँ थाली में पटक दीं थीं… कैसे भी दोनों रोटियाँ खाईं और तभी… “लै बेटा जे आधी रोटी और… बूरे के दही सै खा लै”

अब मईयो की बोली में समाई रिरियायट मेरी झुंझलाहट को नहीं रोक पाती… ज़ोर से दहाड़ उठता हूँ “मईयो तेरे पास बैठ कै खानौ खाबौ छोडूंगों तबी मानेगी तू…”

और तिलमिलाहट तो तब बढ़ती है जब देखता हूँ रोटी आधी नहीं पूरी थी… मईयो की इस आधी मतलब एक अतिरिक्त रोटी या परांठा के बिना हमारे भोजन पूरा होने का कोई मतलब नहीं था…

और उसी मईयो की खुद की हालत थी कि अपने भोजन या किसी भी खाने की चीज को अपनी किसी औलाद को शेयर ना कर देती तब तक उसके हलक से नीचे ही ना उतरती.

और हम जब घर से बाहर निकलते तो चाहे ठूंस ठूंस कर खिलाने वाली जीजियों के घर जाओ या कभी कभार ससुराल… लेकिन मईयो के सामने कुछ खाये बिना घर से निकल गए तो जरूरी नहीं कि लौट के आने तक मईयो अपना भोजन ठीक से कर भी ले…

उसके लिए घर के बाहर ना कोई हलवाई थे और ना ढाबे होते थे… जो था उसकी आँखों के सामने खाने से ही चैन पड़ता… घर से निकलते हुये “बेटा कछु तौ पेट में डार जा…” की रिरियाती आवाज के बदले ना जाने कितनी ही दाँत मिसमिसाती हुई हमारी फटकारें उसके खाते में दर्ज हुई होंगी.

लगातार बढ़ते वजन पर नियंत्रण करने के लिए इधर हम अखबार और पत्रिकाएँ खंगालते… हर जगह घी और दूध की मलाई की मनाही… लेकिन मईयो के हिसाब से सूखी रोटी अपवित्र होती थी… माँ अन्नपूर्णा का अपमान होता था…

वैसे मैं उसे सात्विक और पूजागृह जैसी सावधानी बरतने वाली रसोई को अपनी स्वयं की सूखी रोटी से ‘अपवित्र करते और माँ अन्नपूर्णा का अपमान’ करते अक्सर देखा करता था.

दूध तो जब तक गिलास से छलकने ना लग जाय तब तक भी कम ही होता था… 20-22 साल का ऊंट होने पर भी मईयो सोते से उठा कर उस लबालब भरे गिलास को मुंह से लगाती और हम कसमसाते तो दूध अक्सर बनियान, शर्ट, चादर या रज़ाई पर छलक ही जाता…

तब झटके से पूरी आँखें खुलती और मईयो पर जो दहाड़ते लेकिन वो पूरे दूध को हमारे गले में उड़ेलने बाद ही कपड़ों को पोंछती…

एक दिन मैंने और मुझसे बड़े भैया ने कलेश कर दिया “मईयो अगर गिलास दो अंगुल खाली ना भयौ तौ गिलास ए फेंक दूंगो… भले यी तेरे जा रतन कौ कितनौउ अपमान कौ पाप चढ़ जायै”…

और समाधान हाजिर था… मईयो ने अपनी शादी के समय के तीन पाव वाले गिलास निकाल लिए… उनमै दूध और मलाई की मात्रा पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी थी…

इन मईयाओं के हालत अभी तक नहीं सुधरे हैं… अपने इर्द गिर्द भाभियों को भतीजों… जीजियों को भांजे… मालकिन को बेटे से वही सब करते देखता हूँ जो उनको मईयो से विरासत में मिल चुका है…

मुझे पता है ये ज्यादा खिलाने पिलाने का समय अब उचित नहीं है… लेकिन बात बात पर उपदेश देने की मेरे आदत पर यहां बिलकुल विराम लग जाता है…

उल्टे आँखों के सामने मईयो का ही चेहरा सामने आ जाता है… अंदर से ये ही हूक ऊठती है… “मईयो तू कैसउ एक बार आ जा … जितनी रोटी खिलाएगी, खाऊँगा… दूध का गिलास भले ही रोज कपड़ों को खराब करे, भर के ही लईयो… घर से बाहर कुछ खाके ही जाऊंगा… मईयो कितना भी वजन बढ़ जाये मेरा… तू बस एक बार आजा… बस कह दे –

“जे आधी रोटी दही बूरे सै और खा लै…”

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