Joan Of Arc : 19 साल की वीरांगना संत

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करीब छः सौ साल पुरानी बात है. दुनिया उस समय अभी जैसी नहीं होती थी, उसके किस्से मध्यकालीन इतिहास के किस्से कहे जाते हैं. ये तब का जमाना था जब इंग्लैंड और फ्रांस में भयानक लड़ाइयाँ चलती थी. इसी ज़माने में एक संधि हुई थी, 1420 में हुई इस संधि का नतीजा ये हुआ था कि फ्रांस के युवराज Charles of Valois को नाजायज युवराज होने के आरोप लगा कर गद्दी से हटा दिया गया और Henry V (पंचम) को फ्रांस और इंग्लैंड दोनों का राजा बना दिया गया था. उनका बेटा Henry VI (छठा) 1422 में उनके बाद राजा बना.

अपने फ़्रांसिसी साथिओं की मदद से इंग्लैंड ने Philip the Good, (duke of Burgundy) के नेतृत्व में उत्तरी फ्रांस के ज्यादातर इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया था. इसी इलाके में एक गाँव था Domremy, इसके निवासियों को भी घर छोड़कर भागना पड़ा.

इसी गाँव में Jacques d’Arc भी अपनी पत्नी  Isabelle और करीब सोलह साल की बेटी के साथ रहते थे. उनके पास थोड़ी सी जमीन थी मगर जान बचाने के लिए उन्हें भी अपने परिवार को लेकर भागना पड़ा. इनकी इस बेटी की विधिवत कोई शिक्षा नहीं हुई थी, लिखना पढ़ना भी उसे नहीं सिखाया गया था लेकिन इसे कैथोलिक मतों की शिक्षा दी गई थी और ये लड़की इतनी धार्मिक थी कि 1425 में जब वो 13 साल की थी तभी उसे कई संत दिखाई देने लगे थे, अपने मुक़दमे के दौरान उसने Saint Michael, Saint Catherine, और Saint Margaret, को पहचान लिया था. उसका कहना था कि अंग्रेजों को मार भागने और Dauphin को उसकी ताजपोशी के लिए Reims लाने उसे इन्ही संतो ने कहा था.

लड़कीका नाम जोन था, उसने ऐसे दृश्य देखने के बाद आजीवन अविवाहित रहने का व्रत ले लिया और जब सोलह साल की उम्र में पिता ने उसकी शादी करवाने की कोशिश की तो उस से भी इनकार कर दिया.

1428 के मई महीने में जोन अपने एक रिश्तेदार  Durand Lassois के साथ Vaucouleurs के लिए निकल पड़ी. वहां Charles के कुछ हिमायती रहते थे. स्थानीय मजिस्ट्रेट Robert de Baudricourt ने उसे मदद देने से इंकार कर दिया. लेकिन स्थानीय लोगों में एक किम्वदंती थी जिसके अनुसार एक कुंवारी लड़की फ्रांस को मुक्ति दिलाने वाली थी. एक छोटा सा दल उसकी मदद के लिए तैयार हो गया. आखिर Robert ने भी उसे Chinon जाने की इज़ाजत दे दी.

अब जोन ऑफ़ आर्क ने अपने बाल छोटे छोटे कटवा लिए. मर्दाना कपड़े पहनकर वो शत्रुओं के इलाके से होती हुई 11 दिन के सफ़र पर Chinon के लिए निकली, युवराज चार्ल्स उस समय Chinon में ही थे. उस वक्त जोन ऑफ़ आर्क को पता नहीं था लेकिन यही बाल कटवाना और मर्दाना कपड़े पहनना उसके लिए बाद में आफ़त खड़ी करने वाला था.

जोन ने चार्ल्स से वादा किया कि वो उसे फ्रांस की राजसत्ता के केंद्र Reims ले जाएगी और उसकी ताजपोशी करवाएगी. Orleans को उस समय इंग्लैंड की फौजों ने घेर रखा था. जोन ऑफ़ आर्क ने उसे छुड़ाने के लिए चार्ल्स से एक फौज़ी टुकड़ी मांग ली. अकेले में चार्ल्स से जोन की क्या बात हुई ये कभी पता नहीं चला, लेकिन चार्ल्स उसे ईश्वर का दूत मानता था.अपने ज्यादातर सलाहकारों और सिपहसालारों के मत के विरुद्ध चार्ल्स ने जोन ऑफ़ आर्क को फौज़ी टुकड़ी दी और Orleans की तरफ कूच करने की इज़ाजत भी दी. इस तरह 1429 के मार्च के महीने में जोन ऑफ़ आर्क ओरलेंस के लिए रवाना हुई.

सफ़ेद घोड़े पर सवार और सफ़ेद कवच में सजी जोन ऑफ़ आर्क ने पहले तो अंग्रेजी फौजों को भागने की सलाह देती चिट्ठी लिखी, जब वो नहीं माने तो जोन ने Anglo-Burgandian फौजों पर कई हमले किये. हारती हुई इंग्लॅण्ड की फौज़ को Loire नदी की दूसरी तरफ भाग कर पनाह लेनी पड़ी. इतनी मामूली फौज़ के साथ इंग्लैंड के छक्के छुड़ा देने वाली इस लड़की की प्रसिद्धि पूरे फ्रांस में फ़ैल गई.

दुश्मन की फौजों के बीच से वो चार्ल्स को लेकर Reims पहुँच गई. यहाँ जुलाई 1429 में चार्ल्स का राजतिलक कर के उसे राजा बना दिया गया. इसके फ़ौरन बाद जॉन ऑफ़ आर्क उर्फ़ “Maid of Orleans” ने पेरिस पर हमले की इजाजत मांगी. चार्ल्स के सलाहकार Georges de La Trémoille ने इसी वक्त चार्ल्स को चेतावनी दी कि जोन बहुत शक्तिशाली हो चली है.

हमले के फैसले में देरी से Anglo-Burgandian फौजों को अपनी किलेबंदी को मजबूत करने का मौका मिल गया. सितम्बर 1429 में उन्होंने जोन ऑफ़ आर्क के हमले को नाकाम कर दिया. 1430 के बसंत में Burgandian फौजों ने Compiegne नाम के शहर पर हमला कर दिया, चार्ल्स ने जोन को शहर को बचाने के आदेश दिए. नागरिकों की जान बचाते बचाते जोन का घोडा भड़का और वो जोन को गिराकर किले के अन्दर भाग गया. किले का दरवाज बंद हो गया और जोन को पकड़ लिया गया. उसे Bouvreuil के किले में अँगरेज़ कमांडर की कैद में डाल दिया गया.

जोन पर मुक़दमा चला, डायन होने और चर्च की नाफ़रमानी करने के अलावा उस पर लगभग सत्तर और आरोप लगाये गए. चार्ल्स ने जोन को छुड़ाने की कोई कोशिश तक नहीं की. 1431 की मई में करीब एक साल कैद में रहने के बाद जोन ने एक इकबालना मे पर दस्तख़त किये जिसमे लिखा था कि उसने किन्ही संतों ने दर्शन नहीं दिए हैं. लेकिन अगली पेशी पर ही उसने ये मानने से इनकार कर दिया और दोबारा मर्दाना कपड़े पहन लिए. इस हरकत पर उसे डायन बताकर उसे डायनों की ही तरह जिन्दा जला देने की सज़ा दी गई.

30 मई 1431 की सुबह करीब 19 साल की जोन को Rouen के पुराने बाज़ार में ले जाया गया. उसे एक ऊँचे खम्भे से बाँध दिया गया, उसने दो पादरियों Fr Martin Ladvenu और Fr Isambartde la Pierre को अपने सामने क्रॉस पकड़ कर खड़े होने कहा.

एक अँगरेज़ सिपाही ने एक छोटा क्रॉस बना कर उसे दिया जिसे कि उसने अपने कपड़ों में सीने के पास रख लिया. लकड़ियों का ढेर इकठ्ठा कर के उसे जिन्दा जला दिया गया. थोड़ी देर बाद जली लकड़ियों को हटाकर उसका जल चुका शव जांचा गया ताकि ये पक्का हो सके की कहीं जादू टोने से वो भाग तो नहीं गई है.

फिर दो बार और लकड़ियाँ इकठ्ठा कर के उसकी लाश को पूरी तरह जला दिया गया, ताकि कोई उसकी निशानियाँ न इकट्ठी कर सके. सारी राख को Seine नदी में बहा दिया गया. उसके जल्लाद Geoffroy Thérage को हमेशा ये डर सताता रहा कि इस पाप के बदले उसे मरने के बाद, हमेशा के लिए नरक की आग में झोंक दिया जाएगा.

उसकी मौत के साथ ही उसकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी. बीस साल बाद जब चार्ल्स VII (सप्तम) ने ये मुक़दमा दोबारा खुलवाया और उसका नाम डायनों में से हटवाया तब तक वो लोगों में काफी सम्मानित थी. Pope Benedict XV ने 1920 में जब जोन ऑफ़ आर्क को संत घोषित किया तब तक वो एक मिथकीय चरित्र ले चुकी थी.

चर्च के पापों के बावजूद उनके जीवन से कई साहित्यिक ग्रंथों और कलाकीर्तियों ने प्रेरणा ली. पोप के अपनी गलतियाँ मानने और संत की उपाधी देने से कई शताब्दियाँ पहले ही ये लड़की संत हो चुकी थी.

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