भारत का GPS NAVIC-IRNSS : आज जरूरत है कि हम खुद को रास्ता दिखाएँ, तभी सार्थक होगा स्वावलंबन

किसने कहा कि 1999 करगिल युद्ध के समय अमरीका ने भारत को GPS data देने से मना कर दिया था? बिकाऊ मीडिया के सिवा इस खबर की पुष्टि कौन कर सकता है?

तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष जनरल वेद प्रकाश मलिक ने अपनी पुस्तक Kargil: from surprise to Victory के पृष्ठ सं 66 पर लिखा है कि उन दिनों पाकिस्तान अफवाहें फैलाता था कि चूंकि नियंत्रण रेखा की location अस्पष्ट है इसलिए हो सकता है कि उनकी पेट्रोलिंग पार्टी गलती से भारत की तरफ घुस आई हो.

जनरल मलिक ने GPS की सहायता से LoC की सटीक वस्तुस्थिति का पता लगाया और ये सूचना मीडिया के साथ पाकिस्तानी DGMO को भी भिजवाई. तब जाकर पाकिस्तान की बदनीयत का पर्दाफाश हुआ. जनरल मलिक ने यह पुस्तक रिटायरमेंट के बाद ही लिखी थी.

इसकी पूरी सम्भावना है कि मीडिया ने 1999 में पाकिस्तान की करतूतों पर पर्दा डालने के मकसद से अमरीका और GPS data को लेकर मनगढ़ंत अफवाह फैलाई होगी. जनरल मलिक ने तो रघु राय जैसों को भी युद्ध क्षेत्र से भगा दिया था जो अपने नाम के आगे Ace photographer लिखवाना पसन्द करते हैं.

इसके अलावा सरकारी थिंक टैंक Institute for Defence Studies and Analyses (IDSA) की वेबसाइट पर ‘ask an expert’ सुविधा के तहत एक प्रश्न के उत्तर में ग्रुप कैप्टन अजेय लेले ने कहा कि आधिकारिक रूप से इसकी खबर की पुष्टि नहीं की जा सकती कि अमरीका ने GPS data उपलब्ध नहीं कराया था, बल्कि यह खबर केवल मीडिया (TOI) के हवाले से ही लोगों तक पहुँची.

ग्रुप कैप्टन लेले ने भविष्य की सामरिक तकनीक पर एक पुस्तक भी लिखी है Strategic Technologies for the Military, जो मैंने पढ़ी है और इसलिए मैं कह सकता हूँ कि उनका दृष्टिकोण विश्वसनीय है.

ये विचित्र बात है कि हम अपने स्वावलंबन की तुलना अमरीका की उन्नत तकनीक से कर रहे हैं. सुबह के समाचार पत्रों में IRNSS को लेकर यही लिखा जा रहा है कि अब हमें अमरीका की जरूरत नहीं पड़ेगी और यह कि “हमने अमरीका को दिया ‘जवाब’!”

सच्चाई ये है हमारी नेविगेशन तकनीक अभी एक क्षेत्र तक सीमित (Regional) है जबकि GPS एक Global प्रणाली है जो धरती पर कहीं भी काम कर सकती है. हमारे 7 उपग्रह हैं तो अमरीकी GPS, 24-30 उपग्रह का इस्तेमाल करता है.

नेविगेशन क्या है?

इसरो अध्यक्ष ए एस किरन कुमार के शब्दों में: Navigation is the method of determining one’s position, location, distance travelled, and course to a known destination making use of various techniques.

अब जब आपको किसी चलती हुई वस्तु की स्थिति, तय की गई दूरी और दिशा की जानकारी लेनी होगी तो ज़ाहिर है कि ऊपर से कोई नज़र रखने वाला चाहिए.

मुख्यतः चार चीजें पता करनी होती हैं: अक्षांश (latitude), देशांतर (longitude), समुद्रतल से ऊँचाई (altitude) और समय. इन चार आयामों की सहायता से हम किसी चलती हुई वस्तु की स्थिति, दिशा, दूरी और समय बता सकते हैं.

इसीलिए एक से ज्यादा सैटेलाइट का उपयोग किया जाता है. कम से कम चार उपग्रह होने चाहिए जबकि हमनें सात का प्रक्षेपण किया है ताकि बारी-बारी से परिस्थिति के अनुसार सेवाएं ली जा सकें.

Indian Regional Navigation Spacecraft System (IRNSS) के सात में से चार उपग्रह GSO कक्षा में प्रक्षेपित किये गए हैं. GSO या geosynchronous orbit का मतलब होता है कि प्रक्षेपित यान या उपग्रह धरती की भूमध्यरेखा से कुछ कोण पर स्थापित किया गया है.

तीन उपग्रह GEO यानि Geostationary earth orbit में स्थापित किये गए हैं. इसका मतलब ये है कि उपग्रह equator से शून्य कोण पर सीधा उसके ऊपर हैं. सभी उपग्रहों की धरती के ऊपर की कक्षा में परिक्रमा की गति उतनी ही है जितनी धरती की अपनी धुरी पर घूमने की गति है. इसलिए सारे उपग्रह धरती से स्थिर दिखाई देंगे.

मजेदार बात ये है कि GPS के उपग्रहों की कक्षा GSO या GEO नहीं है. वो 12 घण्टे में ही धरती का चक्कर लगा लेते हैं. हमारे IRNSS का दायरा भारत के आसपास 1500 किमी तक का है और सटीकता 20m तक की है जबकि GPS पूरे विश्व में 5 से 10m तक सटीक location बताता है. यही नहीं Differential GPS और RTK प्रणाली तो कुछ सेंटीमीटर तक सटीक है!

समय की बात करें तो IRNSS1 E उपग्रह में नेविगेशन पेलोड के साथ Rubidium ‘परमाणु घड़ी’ (atomic clock) भी है जो नैनो सेकंड तक सटीक समय को माप सकती है.

प्रश्न ये है कि समय को लेकर इतनी सटीकता का क्या उपयोग है? जब तक जरूरी न हो हम लोग तो मिनट का साठवाँ हिस्सा देखते तक नहीं.

दरअसल आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत के अनुसार जब भी कोई वस्तु धरती जैसी वृहद् द्रव्यमान वाली वस्तु के गुरुत्वाकर्षण के समीप होगी तो उसके लिए समय धीमा हो जाएगा.

मतलब ये कि उपग्रह की घड़ी की तुलना में धरती पर रखी घड़ी धीमी चलती है. ये अंतर नैनो सेकंड (1/1000000000) के स्तर का होता है लेकिन चौबीस घण्टों में या उससे ज्यादा समय में यही अंतर बड़ा हो सकता है जिससे नापी गयी दूरी में अंतर हो सकता है.

पता चला कि आपको जाना कहीं और है लेकिन नेविगेशन सिस्टम ने 10 किमी दूर का पता बता दिया. ऐसे तो बंटाधार हो जायेगा. इसीलिए GPS और IRNSS दोनों में पहले से ही धीमी की गयी atomic घड़ियां लगा दी गयी हैं.

प्रधानमंत्री जी ने स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम को NAVIC नाम दिया है. यह प्रणाली आमजन के लिए Standard Positioning Service (SPS) और सेना के लिए तथा राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से Restricted Service (RS) प्रदान करेगी.

हमारी मिसाइलें, परमाणु अस्त्र कार्यक्रम, पनडुब्बियां, वायु सीमा की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन से लेकर मछुआरे, सैलानी सभी लाभान्वित होंगे. वाहन चलाने वालों के लिए visual और voice navigation की सुविधा भी होगी. समुद्र में छिपे मूल्यवान संसाधन भी हमारी जद में होंगे.

यह निश्चित ही प्रसन्नता का क्षण है कि हम आज स्वावलंबी हैं. इसरो ने अपने इतिहास पर एक बेहतरीन पुस्तक प्रकाशित की है: Fishing Hamlet to Red Planet यह ऑनलाइन डाउनलोड के लिए भी मुफ़्त उपलब्ध है.

हमनें Indian Institute for Space Technology (IIST) की स्थापना भी की है. लेकिन तुलनात्मक रूप से हम उन्नत तकनीक के क्षेत्र में काफी पीछे हैं. अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

आज नवोन्मेष का ज़माना है. जब हम आईआईटी की प्रवेश परीक्षा दिया करते थे तो उस समय पेपर का स्वरूप बदला गया था. भौतिकी, गणित, रसायन में भी एक अपठित गद्यांश (unseen passage) आया करता था जिसे देखकर हम दाँतों तले दुनिया दबा लेते थे.

आज समझ में आता है कि अमरीकी सेना ने 1960 के दशक में TRANSIT नाम का ‘पहला’ नेविगेशन सिस्टम कैसे बनाया था. जब कुछ नहीं होता तब आविष्कार होता है. दूसरों के नक्शेकदम पर चल कर हम स्वावलंबी बनते हैं.

आज जरूरत है कि हम खुद को रास्ता दिखाएँ, स्वावलंबन तभी सार्थक होगा. अब आगे यही प्रयास होना चाहिए कि हमारा नाविक (NAVIC) हमें नई दिशाओं नई प्रेरणा की ओर ले जाए ताकि हम नए विश्व का निर्माण करें.

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