क्या लाल क्या हरा, विचार का रंग एक ही

हमें पता है लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं में आपका यकीन नहीं. कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो के चौथे अध्याय का आखिरी हिस्सा आपको तानाशाही सिखाता है.

लेकिन हुज़ूर आप भारत में तो हैं! यहीं पैदा हुए यहीं पले बढ़े! फिर खून में दौड़ती लोकतान्त्रिक व्यवस्था से इनकार कैसा?

खुली चिट्ठियों का मौसम है तो आइये हमारी खुली चिट्ठी भी पढ़िए.

ये खुला ख़त आपके गुनाहों का नक़ाब आपके चेहरे से नोचने वाला है. आगे पढ़ते हैं तो नतीजो का जिम्मेवार खुद को ही मानियेगा.

जवाब में आप भाग निकलेंगे हमें पता है फिर भी, सवाल तो सालों से बाकी हैं. कोई ना कोई, कभी ना कभी तो पूछेगा ही.

इस से पहले आपने ऐसे सवाल करने वालों को धकेल कर आत्महत्या तक भी पहुँचाया है साथी, कानू सान्याल का नाम भूले तो नहीं होंगे ना आप?

तो पहला सवाल मेरा ये है, आप कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो के बताये सर्वहारा की तानाशाही में यकीन करते हैं भी या नहीं करते हैं?

किसी और किताब को क्या कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो से ऊपर मानते हैं? अगर नहीं मानते तो फिर तो तानाशाही में यकीन रखने वाले लोग हैं आप. ये आप हर रोज़ लोकतंत्र की हत्या का रोना कैसे रोने लगते हैं?

दूसरा सवाल ये है कि लोकतंत्र की जिस हत्या के लिए आप रोते, छाती पीटते हैं वो तो हथियारों से ही होगी न? और आप हैं सशस्त्र नागरिक क्रांति के पैरोकार!

अगर आपका सशस्त्र क्रांति में यकीन है तो जाहिर है हथियारों की लड़ाई में हत्याएं भी होंगी. लोग मरेंगे. फिर किसी मौत को आप लोकतंत्र की हत्या किस आधार पर करार देते हैं?

और सवालों से इधर उधर कतरा के मत भागिएगा साथी! सवाल सीधा कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो से हैं. उस से नीचे के किसी ग्रन्थ का सन्दर्भ भी मत ले आइयेगा.

उम्मीद है किसी दिन आप सचमुच लोकतान्त्रिक व्यवस्था में उतरेंगे. किसी रोज़ आपकी विचारधारा में “संशोधन” होगा. तबतक आपके जवाबों के इंतज़ार में,

भारत का हरेक आम नागरिक

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