भारत बदल रहा है : कल तक ऐसी तस्वीरें चंदा मांगने के लिए इस्तेमाल की जाती थी

अगर आप ‘पढाई करने’ का समानार्थक देखेंगे तो हिंदी में उसके लिए शिक्षा, विद्या और ज्ञान जैसे शब्द मिलेंगे. कभी सोचा है कि एक ही चीज़ के लिए तीन अलग अलग शब्दों की भला क्या जरुरत? अगर भाव एक ही है तो भला उसी के लिए नए शब्द की क्या जरुरत पड़ी होगी! असल में तीनों का मतलब अलग अलग होता है.

शिक्षा वो चीज़ है जो ली या दी जा सकती है. इसके लिए शिक्षक नियुक्त किये जाते हैं. ये वो चीज़ है जिसकी खरीद-बिक्री पर आपको कभी कभी शोर सुनाई देता होगा. विद्या आपको दी नहीं जा सकती, किसी को कोई नहीं दे सकता, आपके पास हो तो आप भी किसी को दे नहीं सकते. विद्याध्यन आपको खुद ही करना पड़ता है. खुद ही सीखेंगे तभी मिलेगी.

तीसरा शब्द ज्ञान बिलकुल निर्बाध है. इसका शिक्षा से कोई लेना देना नहीं होता. आपका परंपरागत तरीकों से किया गया अध्ययन या अभ्यास भी यहाँ काम नहीं आएगा. मतलब विद्या से भी इसका ज्यादा ताल्लुक नहीं है. मगर ये होता है. ऐसा नहीं है कि प्रगतिशील किस्म के लोग इसके होने से इन्कार करेंगे, वो लोग इसे Wisdom के नाम से जानते हैं. एक आखरी वाले बत्तीसवें दांत को भी विजडम टूथ बुलाते हैं.

अगर कोई परंपरागत गुरुकुलों में नहीं गया, या मैकले मॉडल के स्कूल के हिसाब से नहीं पढ़ा है तो उसे मूर्ख मान लेना कई लोगों की आदत होती है. ऐसा कई बार उसी इंडिया में होता है जिस भारत के स्कूलों-कॉलेजों में कबीर, रैदास और कालिदास जैसों का लिखा पढ़ाया जाता है!

धीरे धीरे से इस व्यवस्था में थोड़ा-थोड़ा सा परिवर्तन हो रहा है. यहाँ गौर करने लायक ये भी है कि #दल_हित_चिंतन से अपनी रोज़ी रोटी चलाने वालों को कभी इनकी कविताओं का अनुवाद करने-करवाने की नहीं सूझी!

केवल तीसरी कक्षा तक पढ़े लिखे और काम के लिहाज से होटलों में बर्तन मांजने का काम कर चुके कवि हलधर नाग पर अब तक पांच पीएचडी थीसिस लिखी जा चुकी है. उनकी कोसली भाषा की कविताओं को अब यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाया जायेगा.

पद्म सम्मान मिलने पर जब उनकी तस्वीरें समाचार में आने लगी तो एक सुखद आश्चर्य हुआ. कल तक ऐसी तस्वीरें चंदा मांगने के लिए इस्तेमाल की जाती थी. पुरस्कार, सम्मान, ये सब तो जुगाड़, जानपहचान, लॉबीइंग वाले धुरंधरों को मिला करता था. जमीन से जुड़े लोगों को सम्मानित किया जाना एक नयी परंपरा की शुरुआत है.

कवि श्री हलधर नाग को मिला सम्मान कई लोगों का हौसला बढ़ता रहेगा. बाकी ये ज्ञानी और शिक्षित में फर्क भी याद दिलाएगा ही. धीरे धीरे मगर निश्चित तौर पर, हमारा #भारत_बदल_रहा_है!

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