यह किसी मेंढक की नहीं, ‘हिन्दू’ की कहानी है

मेरे मित्र ने आज सुबह, अंग्रेजी में लिखे लेख की तरफ मेरा ध्यान खींचा था. वहां देखा कि एक फोटो भी साथ में है, जिसमें एक पानी भरे भगौने में मेंढक बैठा है.

इसको देख कर बड़ी कोफ़्त हुयी कि अमां यह क्या बेहूदगी है? लेकिन फिर कुछ सोचा और उस लेख को मैंने पढ़ डाला.

यह लेख जीवन को एक दर्शन देता है लेकिन मुझे इस लेख में कुछ और ही दिख गया था. चलिए पहले उस लेख और उसके दर्शन को पढ़ लेते है और फिर उसके बाद जो मुझे दर्शन मिला, उससे आपको रूबरू करवाता हूँ.

आप एक प्रयोग कीजिये, एक भगौने में पानी डालिये और उसमें एक मेंढक छोड़ दीजिये. फिर उस भगौने को आग में गर्म कीजिये.

जैसे जैसे पानी गर्म होने लगेगा, मेंढक पानी की गर्मी के हिसाब से अपने शरीर को तापमान के अनुकूल सन्तुलित करने लगेगा.

मेंढक बढ़ते हुए पानी के तापमान के अनकूल अपने को ढालता चला जाता है और फिर एक स्थिति ऐसी आती है की जब पानी उबलने की कगार पर पहुंच जाता है.

इस अवस्था में मेंढक के शरीर की सहनशक्ति जवाब देने लगती है और उसका शरीर इस तापमान को अनकूल बनाने में असमर्थ हो जाता है.

अब मेंढक के पास उछल कर, भगौने से बाहर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा होता है और वह उछल कर, खौलते पानी से बाहर निकले का निर्णय करता है.

मेंढक उछलने की कोशिश करता है लेकिन उछल नहीं पाता है. उसके शरीर में अब इतनी ऊर्जा नहीं बची है कि वह छलांग लगा सके क्योंकि उसकी सारी ऊर्जा तो पानी के बढ़ते हुए तापमान को अपने अनुकूल बनाने में ही खर्च हो चुकी है.

कुछ देर हाथ पाँव चलाने के बाद, मेंढक पानी में मरणासन्न हो पलट जाता है और फिर अंत में मर जाता है.

यह मेंढक आखिर मरा क्यों?

सामान्य जनमानस का वैज्ञानिक उत्तर यही होगा कि उबलते पानी ने मेंढक की जान ले ली है, लेकिन यह उत्तर गलत है.

सत्य यह है कि मेंढक की मृत्यु का कारण, उसके द्वारा उछल कर बाहर निकलने के निर्णय को लेने में हुयी देरी थी. वह अंत तक गर्म होते माहौल में अपने को ढाल कर सुरक्षित महसूस कर रहा था.

उसको यह एहसास ही नहीं हुआ था कि गर्म होते हुए पानी के अनुकूल बनने के प्रयास ने, उसको एक आभासी सुरक्षा प्रदान की हुयी है.

अंत में उसके पास कुछ ऐसा नहीं बचता कि वह इस गर्म पानी का प्रतिकार कर सके और उसमें ही खत्म हो जाता है.

मुझे इस कहानी में जो दर्शन मिला है वह यह कि, यह कहानी मेंढक की नहीं है, यह कहानी ‘हिन्दू’ की है.

यह कहानी, सेकुलर प्रजाति द्वारा हिन्दू को दिए गए आभासी सुरक्षा कवच की है.

यह कहानी, अपने सेकुलरी वातावरण में ढल कर, सुकून की ज़िन्दगी में जीते रहने की, हिन्दू के छद्म विश्वास की है.

यह कहानी, अहिंसा, शांति और दूसरों की भावनाओं के लिहाज़ को प्राथमिकता देने में, उचित समय में निर्णय न लेने की है.

यह कहानी, सेकुलरों के बुद्धिजीवी ज्ञान कि ‘मेंढक पानी के उबलने से मरा है’ को मनवाने की है.

यह कहानी, धर्म के आधार पर हुए बंटवारे के बाद, उद्वेलित समाज के अनकूल ढलने के विश्वास पर, वहां रुक गए हिन्दुओं के अस्तित्व के समाप्त होने की है.

यह कहानी, कश्मीरियत का अभिमान लिए कश्मीरी पंडितों के कश्मीर से खत्म होने की है.

यह कहानी, सेकुलरों द्वारा हिन्दू को मेंढक बनाये रखने की है.

यह कहानी, आपके अस्तिव को आपके बौद्धिक अहंकार से ही खत्म करने की है.

लेकिन यह एक नई कहानी भी कहती है, यह मेरे द्वारा मेंढक बनने से इंकार की भी कहानी है!

मेरी कहानी, आपकी भी हो सकती है यदि आप, आज यह निर्णय करें कि अब इससे ज्यादा गर्म पानी हम बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है.

मेरी कहानी, आपकी भी हो सकती है यदि आप, आज जातिवाद, क्षेत्रवाद, आरक्षण और ज्ञान के अहंकार को तज करके, मेंढक से हिन्दू बनने को तैयार है.

आइये! थामिये, एक-दूसरे का हाथ और उछाल मार कर बाहर निकल आइये, इस मृत्युकारक सेक्युलरी सड़ांध के वातावरण से और वसुंधरा को अपने नाद से गुंजायमान कीजिये, ‘हम हिन्दू है! हम भारत है! हम ज़िंदा है!’

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