राष्ट्र जल्दबाज़ी में बनता भी नहीं, साथी!

“तुमने सर जॉन स्त्रचेय (Sir John Strachey) का नाम तो सुना ही होगा? अपने हिसाब से “राष्ट्रवाद” की परिभाषाएं गढ़ते समय तुम अन्य विचारकों को भूल क्यों जाते हो?”

तुम भी तो कईयों को भूल जाते हो साथी! अब देखो न, जो रुडयार्ड किपलिंग ने लिखी थी : “East is East and West is West, and never the twain shall meet.” वाली प्रसिद्ध कविता; तुम भी भूल जाते हो न? ‘क्या भूलूं, क्या याद करूँ’? ये तो लगा ही रहता है.

“सीधा क्यों नहीं मान लेते कि अच्छे विचारकों के तर्कों से तुम और तुम्हारे अनपढ़ समर्थक निपट नहीं सकते? भारत नाम का राष्ट्र कभी था ही नहीं! बल्कि भारत तो छोड़ो, इस देश के अलग-अलग राज्य भी किसी एकता के सूत्र में बंधे नहीं रहे हैं.”

इस अधूरी जानकारी का एक कारण तो ये भी है कि तुम यहाँ के धार्मिक-सांस्कृतिक समारोहों में शामिल नहीं हुए. अगर कभी किसी पंडित को पूजा के समय यजमान का परिचय देते देखा होता तो तुम्हें पता होता कि वो नाम, काम जैसी चीज़ों के बाद पता बताते समय ‘जम्बूद्वीपे, आर्यावर्त स्थाने, भारत भूमि’ जैसा कुछ बता कर परिचय समाप्त करता है. अगर एक नहीं माना जाता तो फिर पूरब से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक हर जगह ये परिचय एक ही क्यों है?

“ये पण्डे पुरोहितों की बात तो रहने ही दो तुम! राज्य राजनैतिक शक्ति से बनता है, कभी इस देश को एक करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखी है?”

अरे! याद आया, तुम तो कर्म कांड के घोर विरोधी रहे हो साथी! विरोध करने के लिए ही सही, लेकिन राजसूय यज्ञ का नाम तो तुमने सुना ही होगा? किस जगह का चक्रवर्ती सम्राट होने के लिए किया जाता था वो आयोजन?

“बरगलाओ मत मुझे तुम! एक राजसूय यज्ञ से क्या होता है? सर जॉन की परिभाषा से भारत कोई भौगोलिक राष्ट्र कभी था ही नहीं!”

मालूम पड़ता है तुमने नक्शा कई रोज़ से देखा नहीं साथी! उत्तर में हिमालय पर्वत श्रृंखला से घिरे और दक्षिण में हिन्द महासागर तक जाने वाले प्रदेश को भारत भूमि मानना तो वैदिक काल में ही शुरू हो गया था न? वेदों से लेकर अभी तक कभी दार्शनिक, या धार्मिक मान्यताओं में इसे एक से ज्यादा तो नहीं माना गया. हाँ अब जब कुछ विदेशियों ने लकीरें खींची हैं तब कुछ लकीरें ज्यादा जरूर नजर आती हैं.

“चलो ये बातें तुम्हारी मान भी लें तो क्या? भाषा के आधार पर भारत बंटा हुआ नहीं है क्या?”

भारत में लोकतान्त्रिक व्यवस्थाएं बहुत पहले शुरू हो गई थी. पश्चिमी इलाकों के जिन विद्वानों को तुम आधार मान रहे हो उन्होंने तो उस ज़माने में कपड़े पहनना भी नहीं सीखा था. आज तुम उनकी मान्यताओं को अगर आधार के तौर पर लोगे तो जाहिर है उनके समय से कहीं आगे के सिद्धांतों को समझने में दिक्कत होगी ही.

भारत में लोकतंत्र तब से है जब बाकी विश्व कबीलाई संस्कृति से आगे भी नहीं बढ़ पाया था. इसलिए यहाँ एक राष्ट्रीय भाषा कभी भी स्थानीय भाषा को कुचलती नहीं है. यही वजह है कि संस्कृत का होना कभी भी, पाली, तमिल, गोंड या किसी भी अन्य भाषा का ना होना नहीं होता.

जानकारों को जब अपनी स्थानीय भाषा की सीमाओं से आगे चर्चा करनी होती थी तो वो संस्कृत इस्तेमाल कर लेते थे. इसे तुम आज वैसे ही देखो जैसे जर्मनी, फ्रांस, स्कॉटलैंड और ब्रिटेन की भाषाएँ तो अलग-अलग हैं लेकिन एक मंच पर वो अंग्रेजी इस्तेमाल करते हैं. ऐसे ही तुम्हें ये वहम भी है कि एक घनघोर पूंजीवादी देश की भाषा अंग्रेजी है, जबकि उसकी ज्यादातर आबादी तो स्पेनिश भाषा इस्तेमाल करती है!

भाषा इस तरह से तोड़ने के लिए नहीं बल्कि एक दूसरे से संवाद जोड़ने के पुल की तरह काम करती है. भाषा का यही मुख्य उद्देश्य भी है. वो अपनी बात दूसरे तक पहुँचाने और दूसरों की बात समझने का माध्यम है. किसी लट्ठ की तरह उसका इस्तेमाल तुम करना चाहो तो वो तो गलत ही होगा.

“मतलब अब तुम ये भी कहना चाहते हो कि भाषा के आधार पर भी भारत को जोड़ा जा सकता है?”

ऐसा हो चुका है एक बार. दोबारा सही तरीके से प्रयास नहीं किये गए हैं, वो दूसरी बात है. गौर करने लायक तो ये भी है कि भारत उस वक्त विदेशी शोषकों को झेल रहा था. मुक्ति अभी भी पूरी तरह नहीं मिली है, मगर एक बार फिर प्रयास किये जाने की जरुरत तो होगी ही.

“हो चुका है? कैसी अजीब बे-सर-पैर की बातें कर रहे हो? कहीं आज फिर सुबह-सुबह ही तो नहीं चढ़ा आये? ये दस बजे दूकान खुलते ही पीने की आदत छोड़ क्यों नहीं देते? भारत में हिंदी और अहिन्दी भाषियों का ही नहीं, दो दक्षिण भारतीय भाषाओँ को बोलने वालों का भी आपसी झगड़ा समकालीन इतिहास में दर्ज है.”

अब ये इतिहास छोड़कर व्यक्तिगत आक्षेपों पर कैसे आ गए साथी? ये ऐडा तो तुम भक्तों की है, जैसा कुछ घोषित किया करते थे न? खैर इसके लिए तुम्हें थोडा सा पीछे जाना होगा. वो काल देखो जिसे भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के नाम से तुम्हें पढाया गया था. कुछ याद आया?

“खुद ही बता दो क्या बात कर रहे हो. वैसे भी बिना बताये तो तुम मानने वाले हो नहीं.”

अच्छा तो फिर वो काल याद करो जब सन 1920 का दौर था, जिसे भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के काल के रूप में मैकले मॉडल में तुम्हें पढाया गया है. ये वो दौर था जब एक अँगरेज़ द्वारा स्थापित की हुई पार्टी की बागडोर भारतीय लोगों के हाथ आ गई थी. लेकिन 1920 के उस दौर तक भी कांग्रेस पार्टी का सारा काम काज अंग्रेजी में हुआ करता था.

उसी दौर में, यानि सन 1919 के अमृतसर के अधिवेशन में गाँधी ने कांग्रेस के मंच से कहा था कि भारत की एक तिहाई आबादी तो हिंदी बोलती है. इसलिए कांग्रेस भी किसी विदेशी भाषा के बदले अपने काम काज के लिए एक बड़ी भारतीय आबादी की भाषा हिंदी को ही अपनाएगी. आनन फानन में पूरे भारत में हिंदी सिखाने के लिए शिक्षक भेजे गए.

अगले साल 1920 के अधिवेशन में बंगाल, मद्रास और उस समय के बॉम्बे प्रोविन्स से आये लोगों ने उतनी ही अच्छी हिंदी में अपने भाषण दिए जैसी अच्छी हिंदी यूनाइटेड प्रोविंसेज़ और पंजाब वालों की थी. एक साल के अन्दर ही भारत ने हिंदी को अपना लिया था.

आज जब तुम कहते हो कि हमारी भाषा एक नहीं थी, तो ये बताओ की ये ऐतिहासिक चमत्कार हुआ कैसे था?

“सर जॉन की परिभाषा में धार्मिक और सामाजिक ताने बाने की भी बात है. सिर्फ इतने पे ही बात ख़त्म नहीं होती. मगर अभी जरा काम का वक्त हो चला. मैं तुमसे बाद में मिलता हूँ.”

जरूर साथी जरूर! अगली बार और अच्छे तर्क लेकर आना. हमें तो फुर्सत ही फुर्सत है, राष्ट्र जल्दबाज़ी में बनता भी नहीं.

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