बंदिनी : मत खेल जल जाएगी कहती है आग मेरे मन की…

एक मामूली सा फर्क होता है जो किसी फिल्म को मास की फिल्म और किसी को क्लास की फिल्म बना देता है. कुछ कुछ फ़िल्में होती है जो बीच में होती हैं. जैसे एक साधारण से आदमी के अपराधी हो जाने की कहानी “सत्या”, या फिर किन्ही विदेशी नाटकों पर आधारित फ़िल्में जैसे “मकबूल” या फिर “ओंकारा”. वहीँ बीच में “तितली” जैसी कुछ फ़िल्में भी होती हैं.

भले ही सिनेमा को कोई कितना भी एंटरटेनमेंट का माध्यम कह ले लेकिन इन सब फिल्मों का असर दिमाग पर पड़ता है. आप चाहें भी तो देखने के बाद इनके बारे में सोचने से नहीं बच सकते.

ऐसी ही एक पुरानी सी फिल्म है “बंदिनी”. जैसा की नाम से ही जाहिर है ये नायिका प्रधान फिल्म है. बिमल रॉय की सन 1963 में बनाई हुई इस फिल्म में नूतन, अशोक कुमार और धर्मेन्द्र मुख्य किरदारों में हैं. बिमल रॉय ने इस से पहले भी “दो बीघा जमीन”, “मधुमती”, “सुजाता” जैसी अच्छी फ़िल्में बनायीं थी.

इस फिल्म की कहानी नायिका कल्याणी (नूतन) की कहानी है. कल्याणी हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रही होती है. उसे दो लोगों के बीच चुनना होता है. एक तरफ जेल का भला सा डॉक्टर देवेन्द्र (धर्मेन्द्र) है तो दूसरी तरफ उसके अतीत में विकास (अशोक कुमार) है.

कल्याणी गाँव के सख्त से माहौल में पली बढ़ी कवितायेँ पसंद करने वाली आम सी लड़की है, हालात की वजह से वो क़त्ल करती है और उसे जिन्दगी जेल में काटनी पड़ रही होती है.

एक आम इंसान जो कि अपराधिक चरित्र का नहीं है उसका जेल में क्या होता है ये कल्याणी के चरित्र में नजर आ जाता है.

फिल्म 1934 के भारत पर आधारित है इसलिए आजादी की लड़ाई के दौर का भारतीय युवा भी “बंदिनी” में कभी कभी दिख जाता है. उसकी सोच समझ में आती है, बलिदान की उसकी भावना नजर आती है. बिमल रॉय जैसे लोग आपको सीधी सलाह देने नहीं बैठते, कहीं चुपके से इशारों में वो अपनी बात कह जाते हैं.

फिल्म की कहानी जरासंध (चारू चन्द्र चक्रबर्ती) की लिखी बांग्ला किताब “तामसी” पर आधारित है. वो बंगाल के कई जेलों में जेलर रहे थे. फिल्म का भी एक बड़ा हिस्सा नूतन जेल में बैठी अपनी कहानी फ्लैशबैक में सुनाती होती हैं.

फिल्म में मौजूद इशारों में से एक प्रमुख इशारा शुरुआत में ही दिख जायेगा. जब फिल्म की कहानी में कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा होता उसी वक्त बैकग्राउंड से किसी जेल के चौकीदार के चिल्लाने की आवाज़ आती है – All is well!

फिल्म कोई सीधी सादी कहानी भी नहीं है. किसी निर्दोष को फंसा कर जेल में डाल दिया गया हो, ऐसा भी नहीं है. कल्याणी का पहला प्रेमी विकास जब किसी क्रान्तिकारी पार्टी में होने की वजह से उसे छोड़ गया होता है तो कल्याणी लोगों के ताने से परेशान होकर शहर में काम करने आ जाती है.

वहां कल्याणी को ढूँढने आये कल्याणी के पिता की एक दुर्घटना में मौत हो जाती है. कल्याणी जिस मानसिक रूप से अक्षम लड़की की देखभाल में जुटी होती है वो उसके प्रेमी विकास की पत्नी होती है. अपने पिता की मृत्यु और प्रेमी के छिन जाने का जिम्मेदार उस लड़की को मानकर कल्याणी उसे जहर दे देती है.

अपनी सौत को जहर देने का फैसला करती कल्याणी के भाव किसी संवाद से नहीं दर्शाए जा रहे होते हैं. उनके बदले सिर्फ़ एक वेल्डिंग टॉर्च की जलती बुझती रौशनी और बैकग्राउंड से आ रही हथोड़े से कुछ पीटे जाने की आवाज़ होती है. अपना गुनाह कबूलती कल्याणी का दृश्य भी देखने लायक है.

हत्या की सजा काट रही कल्याणी की मुलाकात जेल में ही डॉक्टर देवेन्द्र से होती है. देवेन्द्र कल्याणी से प्रेम करता है, लेकिन कल्याणी उसे कबूल नहीं पाती. उसका मन विकास पर ही अटका होता है.

कल्याणी और देवेन्द्र के दृश्यों को फिल्माने में भी प्रतीकों का इस्तेमाल दिख जायेगा. हर बार बीच में एक पर्दा होता है. कभी कोई दिवार, कभी दरवाज़े का पल्ला! कुछ न कुछ बीच में होता जरूर है.

कहानी जेल से शुरू तो होती हैं लेकिन जेल में ख़त्म नहीं होती. फिल्म के अंतिम दृश्य में कल्याणी जब डॉक्टर देवेन्द्र से मिलने भागती है. उसी वक्त उसे अपना पहला प्रेमी विकास नजर आ जाता है.

नहीं, पूरी कहानी नहीं बता रहे. सब बता दिया तो फिर भला साठ के दशक की ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म देखने भला कौन जायेगा? फिल्म का संगीत एस. डी. बर्मन का है. मेरे ख्याल से 35-40 तक की भी कई युवतियों ने ये फिल्म नहीं देखी होगी, ना इसके गाने सुने होंगे.

युवतियों को तो ये फिल्म सिर्फ “मैं बंदिनी पिया की, मैं संगिनी हूँ साजन की..”, “मोरा गोरा रंग लई ले..”, या फिर “अब के बरस भेजो..” जैसे गानों के लिए देख लेनी चाहिए. राष्ट्रवादी टाइप लोगों के लिए “मत रो माता लाल तेरे..” वाला गाना इंटरेस्टिंग होगा. फिल्म के सभी गाने अच्छे हैं. हां अगर शौक यो यो हन्नी सिंग टाइप के हैं तो जाने दीजिये, आपसे ना हो पायेगा.

बाकी आज इंटरनेशनल विमेंस डे भी है तो “बंदिनी” देखिये और खुद से सोचिये कि बंदिनी को कौन सी सलाखें रोकती थी? वो जो समाज की या जेल की बाहर बनी हुई थी वो, या जो सलाखें उसके ही मन में लगी थी वो?

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