अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता… मने अपनी राय जाहिर करने की छूट… यही ना?

अगर राह चलती किसी लड़की को देख हम अपने दिल की आवाज़ को दिल में ना दबाकर उसके मुंह पर ही बक दें कि… वाह, क्या एक नंबर कर्रा माल है… तो? ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानी जायेगी?

अगर फेसबुक पर किसी कपल की पिक देखकर हमारे मन में हूक उठे कि… कहाँ साला ये मोटा सांड और कहाँ ये कमसिन चिकनी चमेली… ये तो गड़बड़ है… हमारे जैसा छोकरा ठलुआ घूम रहा है और ये गदहा हलुआ खा रहा है… तो क्या उसके कमेंट बॉक्स में जाकर इस मन की बात को जस का तस टाईप कर देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जायेगा?

हमें लगता है भगत लोग तो काफी असहिष्णु हैं, उनके साथ ऐसा करना मुसीबत मोल लेने जैसा होगा… हाँ, लेकिन प्रगतिशील वामपंथी इस मामले में सहिष्णु हैं… पढ़े-लिखे टाईप के लोग होते हैं… जिस तरह खुद के लिए ‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ की मांग करते हैं वैसे ही अपन लोगों को भी इस स्वतंत्रता का हकदार समझते ही होंगे.

अगर किसी वामपंथी की बहिन-महतारी देखकर हम अपनी अभिव्यक्ति की इसी स्वतंत्रता का उपयोग कर उनसे कह दें… ‘भाई जी बस एक दिन के लिए अपनी बहिन/ महतारी/ मेहरिया उधार दे दो… कसम से ऐसी लाल क्रान्ति करेंगे कि अगले 9 महीने में दर्जन भर छोटी-मोटी क्रांतियाँ इधर-उधर पड़ी काँय-काँय करती नजर आएँगी’ …. तो ऐसे केस में लॉजिकली उन लोगों को ख़ास दिक्कत तो नहीं होनी चाहिये?

याद नहीं पड़ता कहाँ, लेकिन कभी पढ़ा था, ‘आपकी स्वतंत्रता वहाँ जाकर खत्म होती है जहाँ से अगले की नाक शुरू होती है’, ठीक इसी तरह आपकी अभिव्यक्ति किसी की भावना आहत करने तक स्वतंत्र नहीं होती.

JNU कांड के बाद से अब तक कुछ थेथर मीडिया वाले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एंगल से अभी तक चार बेवकूफों को बुलाकर डिबेट करवा इस गुंजाइश को जिन्दा रखना चाह रहे हैं कि कन्हैया, उमर खालिद ने वाकई देशद्रोह किया है या नहीं… इसमें अभी भी संशय है.

सीधी सी बात है किसी की माँ-बहन के ब्लाउज़ में हाथ डालना अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं होता, फिर इन लोगों ने तो देश की सौ करोड़ आबादी की माँ के टुकड़े-टुकड़े कर देने के नारे लगाये हैं….

इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह की पीस लविंग सौगन्ध खाई है…. इनके तो सीने पर धर के लात कचर देने का, जिस भारतीय का मन ना मचले वो है देशद्रोही.

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