देशद्रोह की परिस्थितियों का निर्माण क्या देशद्रोह नहीं?

हमारे देश भी जब कोई लड़का किसी लड़की को लेकर भाग जाता है तो पुलिस सबसे पहले लड़के के साथ उठने-बैठने वाले यार-दोस्तों, रिश्तेदारों, यहाँ तक के परिवार के सदस्यों तक को धर लेती है…

न केवल धर लेती है बल्कि कभी-कभी उन यार-दोस्तों की वजह बेवजह कुटाई भी हो जाती है चाहे उन्होंने लड़की को भगाने में अपने दोस्त का साथ दिया हो या न दिया हो…

अभी कुछ दिनों में ऐसी खबरें सुनने को मिल रही है कि व्हाट्स-एप ग्रुप के एडमिन को इसलिए जेल जाना पड़ा क्योंकि उसके ग्रुप में किसी एक सदस्य ने धर्म/ जाति/ समुदाय से सम्बंधित आपत्तिजनक सामग्री डाल दी थी…

13 जून 1997 को उपहार सिनेमा हाल में आग लगी जिसमें कई लोग जल कर मर गए… घटना के बाद सिनेमाघर के मालिकों अंसल बंधुओ समेत 12 लोगो को धर लिया गया…

राजीव गाँधी की हत्या के बाद नलिनी, संतन, मुरुगन सहित 7 लोग मुख्य रूप से धरे गए और इनके अलावा भी कई और लोगो की गिरफ्तारी हुई…

अभी हाल ही में हुए पठानकोट आतंकी हमले के बाद एयरबेस के कर्मचारी सहित वहां के पुलिस अधीक्षक सलविंदर सिंह को NIA ने धर लिया था…

इन पांच घटनाओं से मिलती-जुलती कई घटनाएँ रोजाना पढ़ने-सुनने को मिल जाती हैं…

अब आप कहेंगे कि मैं ये सब क्यों बता रहा हूँ… असल में कन्हैया, उमर खालिद की गिरफ्तारी में और ऊपर लिखी घटनाओ में हुई गिरफ्तारी में बहुत समानता है…

आप कहेंगे, क्यों भाई आधी उम्र में सठिया गया है क्या? उपहार कांड के समय उमर और कन्हैया की मूंछ भी न उगी होगी… राजीव गाँधी की हत्या के समय ये दोनों ढंग से अपनी नाक भी साफ़ करना नहीं जानते होंगे तो इनकी आज की गिरफ्तारी और बरसों पहले की घटनाओं का क्या सम्बन्ध?

जी बिलकुल सम्बन्ध है, बहुत गहरा सम्बन्ध है. ऊपर लिखी सभी घटनाओं में हुई गिरफ्तारियों में उस जुर्म में गिरफ्तार हुआ हर शख्स किये गए जुर्म में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं था…

न उपहार सिनेमा में अंसल बंधुओ ने आग लगायी… न राजीव गाँधी को नलिनी, संथन लोगो ने मारा और न ही पठानकोट में हुए आतंकी हमले में सलविंदर और एयरबेस के कर्मचारी ने हथियार उठा कर सैनिकों पर गोलियां दागी…

फिर भी इन सभी लोगों को गिरफ्तार किया गया… क्यों? क्योंकि भले ही इन सभी लोगो ने प्रत्यक्ष रूप से जुर्म न किया हो लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी परिस्थितियां निर्मित की, जिससे सम्बंधित जुर्म को अंजाम देने के लिए मुफीद स्थितियाँ, परिस्थितियां पैदा हो सकें…

जो लोग कन्हैया और उमर खालिद को इस बिनाह पर क्लीनचिट देने के लिए छाती पीट रहे हैं कि उन्होंने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे नहीं लगाये, उन्होंने भारत के टुकड़े करने के नारे नहीं लगाये, उन्होंने कश्मीर/ केरल/ नागालैंड की आजादी के नारे नहीं लगाये क्योकि ऐसे नारे लगाते हुए, न कन्हैया का कोई वीडियो आया, न उमर खालिद का…

उन महानुभावों से कहना चाहता हूँ कि साहब मान भी लिया जाए कि कन्हैया ने कोई नारे नहीं लगाये और खालिद ने भारत के टुकड़े करने की बात नहीं की, फिर भी क्या उन्होंने उन लोगो के लिए वो प्लेटफार्म या वो परिस्थितियां उपलब्ध नहीं कराई जिस पर भारत को टुकड़े करने की बात कही गयी. वो भी तब जब आपको इस तरह के आयोजन करने की अनुमति नहीं मिली हो…

अगर उमर खालिद इतना ही भला मानुष था तो उसने भारत के टुकड़े करने वाले नारों की शिकायत JNU प्रशासन या पुलिस से क्यों नहीं की? कन्हैया जिसे हीरो बनाने की कोशिश हो रही है जिसने खुद ये स्वीकार किया था कि पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे थे तो उसने इसकी शिकायत पुलिस से क्यों नहीं की?

और जब कन्हैया को पता था कि उमर खालिद के कार्यक्रम के 9 फ़रवरी को देशविरोधी नारे लगे तो उसने 11 फ़रवरी को उमर खालिद को साथ खड़ा कर संघवाद, मनुवाद, पूंजीवाद से आजादी के डेमेज कंट्रोलिंग नारे क्यों लगाये?

कन्हैया और उमर के वामपंथी पक्ष के पास सिवाए इस तर्क के कि ‘कन्हैया का भारत विरोधी नारे लगाते हुए कोई वीडियो सामने नहीं आया’ और कोई तर्क नहीं है…

वीडियो की अनुपलब्धता और नदारदता ही किसी की बेगुनाही का प्रमाण है तो आसाराम बेगुनाह हो जायेगा क्योकि बलात्कार का कोई वीडियो सामने आया ही नहीं.

यदि ऐसा है तो देश-दुनिया में होने वाली लूट, चोरी, डकैती जैसे कृत्यों को अंजाम देने वाले सभी चोर, लुटेरे, बदमाश बेगुनाह हो जायेंगे क्योकि उनके कृत्यों का कोई वीडियो प्रमाण नहीं है…

क्या इस आधार पर कि हाफिज सईद ने खुद हथियार न उठा कर मुंबई पर अटैक नहीं किया इसलिए वो बेक़सूर है, ये मान लिया जाये?…

क्या ओसामा को इस बिनाह पर बेकसूर साबित किया जा सकता है कि उसने खुद आत्मघाती हमला नहीं किया…

क्या ISIS के चीफ बगदादी का जुर्म इस बात से कम हो जाता है कि वो बेकसूर लोगों के गले अपने खुद के हाथो से नहीं काटता…

नहीं साहब… न हाफिज, न ओसामा और न ही बगदादी तीनो ही बेक़सूर नहीं है, क्योंकि इन्होने प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी परिस्थितियां निर्मित की हैं जिनसे 26/11, 9/11 और सीरियाई कत्लेआम जैसी घटनाएँ हुई…

वामपंथियों का एक धड़ा ये तर्क दे रहा है कि कश्मीर की आजादी के नारे, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे तो कश्मीर में रोज लगते हैं तो JNU में वैसे नारे लग भी गए तो कौन सा पहाड़ टूट गया?

अब इन्हें कौन बताये कि कश्मीर भारत का वो हिस्सा है जहाँ पर भारत का अधिकांश संविधान लागू नहीं होता. अब वहां पर आजादी और पाकिस्तान के नारे लगाना देशद्रोह की श्रेणी में आता भी है या नहीं, ये मुझे नहीं पता.

लेकिन इतना पता है कि दिल्ली देश की राजधानी है और दिल्ली में भारत का संविधान अक्षरशः लागू होता है और JNU दिल्ली में ही है न कि कश्मीर में, इसलिए यहाँ भारत को टुकड़े करने के नारों को देशद्रोह ही माना जाएगा…

कुछ कुंठित कांग्रेसी और वामपंथियों की टोली ये फरमा रही है कि साहब नारे ही तो लगाये हैं, क्या हो जायेगा नारों से?

अब इन मूर्खो की जमात में से कोई सेना में नहीं गया तो कोई क्या कर सकता है? अगर नारों की महत्ता जाननी है तो किसी भी आर्मी सोल्जर से पूछ लो, जब सेना का जवान युद्ध में जाते है तो “जय महा काली आयो गुरखाली”, “जो बोले सो निहाल”, “राजा रामचन्द्र की जय” जैसे नारे लगाते हैं जिससे सैनिकों को दुश्मन को ख़त्म करने का साहस और बल मिलता है…

खैर सच को कितना ही उलझाया जाए वो आसानी से सुलझ जाता है और झूठ को कितना ही साफगोई से पेश क्यों न किया जाए उसमें अंततः न सुलझने वाली गठाने पड़ ही जाती हैं… बाकी जो है वो हैये है…

– वर्धमान सक्सेना

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