गुरुत्व के धुरंधर

11 फरवरी, 2016 को भारतीय समयानुसार लगभग रात के नौ बजे राज्यसभा टीवी पर एक विशेष प्रसारण किया गया. पुणे में स्थित अंतर्विश्वविद्यालय खगोल एवं खगोल भौतिकी केंद्र (Inter-University Center for Astronomy and Astrophysics, IUCAA) के वैज्ञानिक अति उत्साहित थे और वे अमरीका के National Science Foundation (NSF) द्वारा एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक खोज की घोषणा की प्रतीक्षा कर रहे थे.

न्यूज़ चैनलों में केवल राज्यसभा टीवी पर ही इस घोषणा का सीधा प्रसारण किया गया. अमरीका में एक प्रेस कांफ्रेंस की गई और बताया गया कि गत वर्ष सितम्बर 14, 2015 को लाईगो (LIGO) वेधशाला द्वारा गुरुत्व तरंगों का प्रामाणिक तौर पर पहली बार संसूचन (detection) किया गया.

घोषणा करने वालों में लाईगो के जनक Prof Kip Thorne और Prof Rainer Weiss के साथ Prof Gabriela Gonzalez, NSF की डायरेक्टर France Cordova और लाईगो के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर Prof David Reitze सम्मिलित थे.

गुरुत्व तरंगें क्या हैं? ये कहाँ से आती हैं? इनका महत्व क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए फिर एक बार वही चिर परिचित प्रश्न पूछना जरुरी है : गुरुत्व (Gravity) क्या है? क्या ये मात्र आकर्षण मूलक बल (attractive force) है जिसके कारण हम ‘गुरुत्वाकर्षण’ कह देते हैं? या कुछ और?

न्यूटन के गणितीय सिद्धांतों के अनुसार गुरुत्व एक आकर्षक बल है जो हर उस वस्तु में विद्यमान है जिसमें द्रव्यमान (mass) है. हाई स्कूल में पढ़ाया जाता है कि भौतिकी की शब्दावली में द्रव्यमान (mass) और भार(weight) की परिभाषा में अंतर होता है, जिसका अर्थ है कि यदि आपने पापड़ बनाने के लिए एक पसेरी (पाँच किलो) आलू खरीदा तो ये उसका द्रव्यमान हुआ जिसे 9.8 से गुणा कर देने पर वो गुरुत्वाकर्षण बल ज्ञात होगा जिससे धरती आपके द्वारा खरीदे गए आलू को अपनी तरफ़ खींचती है.

दरअसल पृथ्वी हर वस्तु को एक ही त्वरण यानि acceleration= 9.8m/s^2 से अपनी तरफ खींचती है. जब इस त्वरण का गुणन द्रव्यमान से कर देते हैं यानि 9.8*5=49 Newton तो आपके द्वारा खरीदे गए आलूओं का ‘भार’ (weight) पता चल जाता है जो कि असल में धरती द्वारा आलू पर लगाया गया गुरुत्वाकर्षण बल है. इस बल को हम ‘न्यूटन’ की इकाई में नापते हैं ठीक वैसे ही जैसे आपने ‘किलोग्राम’ में आलू खरीदा और ‘रूपए’ में भुगतान किया.

न्यूटन के सिद्धांत के विपरीत सन् 1915 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने गुरुत्व की एकदम भिन्न व्याख्या प्रतिपादित की. उनके अनुसार गुरुत्व कोई आकर्षक बल नहीं बल्कि ‘ज्यामिति’ (geometry) है. कैसे?

इसे समझने के लिए हमें दिक् और काल (space & time) की संरचना को समझना होगा. दिक् का अर्थ है दिशा- वो दिशा जिस ओर किसी निश्चित स्थान का पता चले. जब हम किसी भटके हुए सज्जन को रास्ता बतलाते हैं तो किसी मंदिर, मोड़ अथवा पेड़ इत्यादि को चिन्हित कर के वहाँ से दहिने-बाएं मुड़ने को कहते हैं. अर्थात हम किसी स्थिर वस्तु के सापेक्ष दिशा का सन्दर्भ दे कर बताते हैं. परन्तु जब किसी अज्ञात स्थान को ढूंढना हो तो हम नक्शा देखते हैं.

एटलस में विश्व का मानचित्र देख कर अक्षांश और देशांतर (latitudes & longitudes) की सहायता से देशों की राजधानियाँ चिन्हित की जाती हैं. इसी तरह यदि हमें अंतरिक्ष में किसी स्थान को चिन्हित करना हो तो हम Cartesian coordinates की विमाओं (x-y axis) की सहायता लेते हैं. ये विमाएं भी अक्षांश और देशांतर रेखाओं की भाँति ही खड़ी और लेटी होती हैं.

कल्पना कीजिये कि आप चाय के साथ पापड़ खाने को तैयार कमरे में बैठे हैं. अब कमरे की लम्बाई और चौड़ाई ध्यान से देखिये. जिस बिंदु पर लम्बाई और चौड़ाई एक दूसरे से मिल जाती हैं (अर्थात् जिस बिंदु पर एक विमा ‘x’ दूसरी विमा ‘y’ को काटती है) वो कमरे का ‘कोना’ कहलाता है.

ऐसे ही एक कोने पर एक आलू रख दीजिये. अब आलू को देखते हुए ऊपर की तरफ़ दृष्टि दौड़ाइए. आपको कमरे की ऊंचाई भी दिखेगी. ये दिक् अथवा Spaceकी तीसरी विमा (z) है. इस तरह हमें तीन विमायें मिलीं: x, y, z जो कि तीन आयामों (लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई) का प्रतिनिधित्व करती हैं. हम इन्हें मीटर अथवा फीट में माप सकते हैं और इनकी सहायता से आलू की निश्चित स्थिति बता सकते हैं.

इस त्रिआयामी ज्यामिति (3 dimensional geometry) की अभिकल्पना से आगे बढ़कर हम एक और विमा (time ‘t’) को जोड़ सकते हैं. बस हमें इतना करना है कि कमरे के कोने में आलू की बजाय चाय पापड़ के साथ कलाई में घड़ी बाँध कर खुद बैठ जाना है. अब हम अपने स्थान के साथ समय को भी जोड़ देते हैं.

मान लीजिये कि हम अंतरिक्ष के नागरिक हैं और हमारे ब्रह्माण्ड में किसी रोज ‘पापड़ दिवस’ मनाया जा रहा है और हर ग्रह के प्रत्येक व्यक्ति को बंद कमरे के एक कोने में अकेले बैठ कर घड़ी देखते हुए आलू का पापड़ खाना है.

इस तरह हर व्यक्ति की अपनी विशेष स्थिति (position in space) और समय (time) होगा. अंतरिक्ष में विचरते हुए ऐसे अनगिनत कमरे और घड़ियाँ होंगी (4 dimensional frames of reference) और सभी एक दूसरे के सापेक्ष गतिमान होंगे.

आइंस्टीन ने बताया कि हमारा ब्रह्माण्ड ऐसे ही चतुर्आयामी दिक्-काल (space-time) की संरचना (fabric) से बुना गया है और द्रव्यमान (mass) इस संरचना को विकृत करता (सिकोड़ता/फैलाता) है.

सरलता से समझने के लिए हम अपने सब्जी वाले के पास पुनः चलते हैं और कुछ देर के लिए चार आयामों को छोड़ द्विआयामी कपड़े के झोले को देखते हैं. जब झोले में आलू रखे जाते हैं तो कपड़ा उभर कर फुला हुए दिखाई पड़ता है. यदि आप एक चादर को फैलाएं तो वो दिक्-काल की संरचना जैसा परिलक्षित होता है.

अब उसमें यदि एक बड़ा सा आलू रख दिया तो गड्ढा बन जायेगा यानि आलू के द्रव्यमान ने दिक्-काल की विमाओं को सिकोड़ दिया. यही ‘सिकुड़न’ की ज्यामिति ही ‘गुरुत्व’ है. कपड़े पर बने इस गड्ढे के समीप यदि एक छोटा आलू रखा जाए तो वो उसका चक्कर लगा कर उसमें गिरने का प्रयास करेगा. इसी तरह धरती सूर्य के गुरुत्व की ज्यामिति से आकर्षित होती है.

धरती के ऊपर हमारे संसार में छोटी छोटी चीजों का द्रव्यमान बहुत ही कम होता है इसलिए न्यूटन के सरल ‘आकर्षक’ सिद्धांत से काम चल जाता है लेकिन ब्रह्माण्ड आश्चर्यों से भरा पड़ा है. इस ब्रह्माण्ड में ऐसी विचित्र वस्तुएं हैं जिनका द्रव्यमान हमारे समूचे सौर मंडल से भी करोड़ों गुना ज्यादा है.

ऐसी वस्तुओं के व्यवहार का अध्ययन करने के लिए आइंस्टीन के ‘सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत’ का उपयोग किया जाता है जिसमें उन्होंने गुरुत्व को गणितीय ज्यामिति के रूप में प्रतिपादित किया था. जिस तरह x, y, z विमाओं को हाई स्कूल की बीजगणित की सहायता से ज्यामितीय स्वरुप देते हुए सीधी रेखा (straight line) के समीकरण लिखे जाते हैं (जैसे की y=mx+c) उसी तरह आइंस्टीन के अनुसार गुरुत्व रूपी ज्यामिति के भी क्लिष्ट गणितीय समीकरण लिखे और हल किये जाते हैं.

भौतिकी में तरंगों के व्यवहार को भी समीकरण की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है. जैसे कि ध्वनि तरंग अथवा प्रकाश की तरंगों के समीकरण होते हैं जिनसे हमें ये पता चलता है कि किसी समयावधि में इन तरंगों का व्यवहार कैसा होगा.

आश्चर्यजनक रूप से जब आइंस्टीन के गुरुत्व के समीकरण हल किये गए तो पता चला कि इन समीकरणों के समाधान में तरंगों के समीकरण भी अन्तर्निहित हैं. अर्थात् आइंस्टीन के समीकरण केअनुसार यदि दो वृहद् द्रव्यमान वाली वस्तुएं एक दूसरे का चक्कर लगाती हैं तो इस घूर्णन के प्रभाव से गुरुत्वतरंगें निकलती हैं जिन्हें Gravity Waves कहा जाता है. इनकी चाल वैसी ही होती है जैसे तालाब में पत्थर फेंकने पर पानी की तरंगें प्रसारित होती हैं.

प्रकाश की गति से चलती हुई गुरुत्व तरंगें मंदाकिनियों और हर तरह के पदार्थ से होकर गुजर जाती हैं और चूंकि गुरुत्व की ये ‘लहरें’ दिक्-काल की विमाओं को सिकोड़ती-फैलाती चलती हैं इसलिए जब धरती से टकराती हैं तो हमारे ग्रह को रसगुल्ले की भांति ज़रा सा ‘पिचका’ देती हैं. जैसे शुगर केमरीज रसगुल्ले को ज़रा निचोड़ कर खाते हैं!

ये अलग बात है कि धरती फिर से अपने मूल आकार को प्राप्त हो जाती है. लगभग आधी सदी तक ये बात गणितीय रूप से सिद्ध थी परन्तु ब्रह्माण्ड में व्याप्त इन गुरुत्व तरंगों का पता नहीं लगाया जा सका था. इनका प्रत्यक्ष संसूचन (detection) नहीं किया जा सका था.

मेरीलैंड विश्वविद्यालयके प्रो० जोसफ वेबर ने 1960 के दशक में गुरुत्व तरंगों का पता लगाने का पहला प्रयास किया था. उन्होंने टनों वजनी एल्युमीनियम के सिलिंडर लटकाए थे जिनकी सतह पर कुछ ऐसे (piezoelectric) पदार्थ चिपके थे जिनका स्वभाव ऐसा था कि यदि उनमें हल्का सा भी संकुचन होता तो उनमें बह रहे करंट का वोल्टेज बदल जाता.

वेबर का मानना था कि जब सुदूर अंतरिक्ष से आती हुई गुरुत्व तरंगें सिलिंडर से टकराएंगी तो इन्हें संकुचित कर देंगी जिससे वोल्टेज में अंतर आएगा और गुरुत्व तरंगों का पता चल जायेगा.

दुर्भाग्य से वेबर का आंकलन सही नहीं था. अन्तरिक्ष से आती गुरुत्व तरंगों की ऊर्जा इतनी कम होती है कि piezoelectric पदार्थ इनका पता नहीं लगा सके. कालान्तर में कई और प्रयोग किये गए जिसके परिणाम स्वरूप सन् 1974 में जोसफ टेलर और रसेल हल्स ने एक पल्सर (PSR 1913+16) का पता लगाया जो कि एक न्यूट्रॉन तारे का चक्कर लगा रहा था.

कई वर्षों तक इसका अध्ययन करने के बाद 1984 में पता चला कि इन दोनों के परिक्रमण की समयावधि (time period of revolution)लगातार घट रही थी जिसका मतलब था कि वहाँ (massive binary system) से लगातार ऊर्जा निकल रही थी जो कि और कुछ नहीं बल्कि गुरुत्व तरंगें थीं. इस खोज के लिए हल्स और टेलर को 1993 का नोबेल सम्मान दिया गया था. परन्तु हमनें अभी तक गुरुत्व तरंगों का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं देखा था.

फलस्वरूप सन् 1984 में अमरीका की National Science Foundation (NSF) एजेंसी ने मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MIT) तथा कैलिफ़ोर्निया इंस्टिट्यूट टेक्नोलॉजी (CalTech) को संयुक्त रूप से गुरुत्व तरंगों के अध्ययन के लिए अनुदान देने का निर्णय किया.

इस प्रकार LIGO परियोजना का जन्म हुआ जो कि अमरीका की अब तक की सबसे खर्चीली वैज्ञानिक परियोजना है. लाईगो (LIGO) का अर्थ है Laser Interferometer Gravitational Wave Observatory. इस परियोजना के सूत्रधार थे प्रो. किप थोर्न, प्रो. रेनर वाईस और प्रो. रॉनल्ड ड्रेवर.

लाईगो (LIGO Science Cooperation) परियोजना में 2016 तक चौदह देशों के एक हजार से ज्यादा वैज्ञानिक कार्यरत हैं. सितम्बर 14, 2015 को पहली बार लाईगो ने प्रत्यक्ष रूप से गुरुत्व तरंगों का संसूचन किया और उस ध्वनि को रिकॉर्ड भी किया जिसे 11 फरवरी को हुई प्रेस कांफ्रेंस में भी सुनाया गया.

लाईगो वेधशाला प्रकाश के उस गुण धर्म के सिद्धांत पर काम करती है जिसमें यदि प्रकाश की एक किरण दूसरी पर पड़े तो या तो दोनों की तीव्रता मिलकर बढ़ जाएगी या दोनों किरणें आपस में भिड़ कर समाप्त हो जाएँगी.

लाईगो की दो भुजाएं हैं जो चार किमी लम्बी हैं. इनके बीच लेज़र किरणें छोड़ी जाती हैं. इन भुजाओं के सिरे पर दर्पण लगाये गये हैं जो कि प्रकाश को प्रतिबिंबित करते हैं. एक सिरे पर एक संसूचन लगा है जो ये बताता है कि लेज़र प्रकाश की किरणें आपस में मिलकर एक हो गयीं (उनकी तीव्रता बढ़ गई) या दोनों टकराकर समाप्त हो गईं.

इसे भौतिकी के छात्र constructive/destructive ‘interference’ के नाम से जानते हैं. यदि इन भुजाओं के बीच अंतरिक्ष से आती गुरुत्व किरणें गुजरतीं हैं तो इनकी लम्बाई में अंतर आएगा फलस्वरूप प्रकाश के ‘interference’ के माप में अंतर आएगा.

यही विधि अपना कर दशकों की मेहनत और शोध के बाद वैज्ञानिकों ने एक ऐसी गुरुत्वतरंग का पता लगाया जो आज से 1 अरब 30 करोड़ वर्ष पहले आपस में परिक्रमण करते दो ब्लैक होल से निकली थी. ये ब्लैक होल लगभग 150 किमी व्यास के थे और इनका द्रव्यमान हमारे सूर्य से तीस गुना ज्यादा था.

जब ये तरंग धरती तक पहुँची तो इसने लाईगो की भुजाओं की लम्बाई में प्रोटॉन के आकार के 1/10,000वें हिस्से तक का अंतर पैदा किया. इस स्तर की सटीकता तक अध्ययन करना आश्चर्य में डालता है. इस खोज का नाम दिया गया है: ‘GW150914’. इस नामकरण में GW का अर्थ है Gravitational Wave और ’15-09-14’ वह तारीख है जिस दिन इसका पता लगा.

इस परियोजना में भारत के वैज्ञानिकों का अहम योगदान रहा. पुणे में स्थित अंतर्विश्वविद्यालय खगोल एवं खगोल भौतिकी केंद्र (Inter-University Center for Astronomy and Astrophysics, IUCAA) के वैज्ञानिक प्रो. संजीव धुरंधर ने 1991 में एक शोधपत्र लिखा था जिसमें गुरुत्व तरंगों का पता लगाने का वो तरीका बताया गया था जिसे अपना कर लाईगो ने ये खोज की.

दरअसल आरम्भ में किये गये प्रयोगों में अंतरिक्ष से आते शोर के कारण गुरुत्व तरंगों का संसूचन सही ढंग से नहीं हो पाता था इसलिए प्रो. धुरंधर ने इसे दूर करने का तरीका बताया था. जैसे ही इस खोज की घोषणा हुई वैसे ही भारत सरकार ने लाईगो-इंडिया (LIGO India) परियोजना को हरी झंडी दे दी है. भारत के वैज्ञानिक इंडिगो (INDIGO) नाम से समूह बना कर इस परियोजना में योगदान दे रहे थे. भारत के अलावा जर्मनी में GEO, इटली में VIRGO और जापान में KAGRA परियोजनाएं कार्यरत हैं.

गुरुत्व तरंगों का पता लगने से हम ब्रह्माण्ड की कई वस्तुओं के बारे में जान पाएंगे जहाँ तक पहुंचना संभव ही नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे हम सूर्य से निकली रौशनी का अध्ययन कर के जान पाते हैं कि उसमें किस प्रकार की तीव्र उष्मीय हलचल होती है.

भविष्य में इस रहस्य से भी पर्दा उठ सकेगा कि क्या वाकई में ‘ग्रेविटॉन’ का अस्तित्व है. कण-भौतिकी और क्वांटम भौतिकी के अनुसार ग्रेविटॉन ऐसे कण हैं जो गुरुत्व के व्यवहार का वहन करते हैं. यानि एक द्रव्यमान से दूसरे के बीच ग्रेविटॉनों के आदान प्रदान से गुरुत्व पैदा होता है.

हम ये भी जान पाएंगे कि क्या ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय भी गुरुत्व तरंगें व्याप्त थीं. बहुत कुछ समय और ‘दिक्-काल’ की विमाओं के गर्भ में छिपा है. विश्व 2015-16 में आइंस्टीन की महान खोज ‘सामान्य सापेक्षता’ (General Theory of Relativity) की सौंवी वर्षगाँठ मना रहा है इस अवसर पर उनके द्वारा की गई गुरुत्व तरंगों की भविष्यवाणी सही प्रमाणित हुई यही उस महान वैज्ञानिक के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है.

References:

Black Holes and Time Warps: Einstein’s Outrageous Legacy by Kip Thorne

The Perfect Theory by Pedro G Ferreira

The Universe in a Nutshell by Stephen Hawking

A Brief History of Time by Stephen Hawking

Dreams of a Final Theory by Steven Weinberg

The New Physics for the twenty first Century edited by Gordon Fraser

LIGO CalTech Website

Web news articles

IUCAA Gravitational wave website

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