क्या जेएनयू की तरह जामिया में भी छुपे हैं आस्तीन के सांप?

बौद्धिक निर्बलता से पीड़ित जेएनयू के कुछ युवा अपनी कमज़ोरियों की पूर्ति के लिए देशद्रोहियों के शिकंजे में फँस गए और वे राष्ट्रद्रोही बनते चले गए. उसी का एक जीता जागता प्रयोग प्रदर्शन 9 फ़रवरी 2016 को जेएनयू परिसर में देखने को मिला.

यह सब राष्ट्रद्रोही, हक़ीक़त मे आस्तीन के साँप हैं. पर आस्तीन के ऐसे सांप, राष्ट्र के दुश्मन अकेले जे-एन-यू में ही नहीं हैं. जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी दिल्ली में भी ऐसे ही अनेक राष्ट्रद्रोही आस्तीन के सांप छुपे हुए हैं.

आस्तीन के इन साँपों को पूर्व कांग्रेस सरकार के समय से ही जामिया मिलिया में प्रश्रय मिलता रहा है. इन राष्ट्रद्रोहियों का अल्पसंख्यकों के वोट कबाड़ने की घृणित राजनैतिक धुव्रीकरण करके चुनावों में इनका लाभ उठाने के लिए पाला पोसा गया है, और अब यही लोग देश की सुरक्षा के लिए नासूर बन कर चुनौती दे रहे हैं.

इस निष्कर्ष की पुष्टि के लिए सन 2008 में जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कहा था कि दिल्ली में एक यूनिवर्सिटी है जिसे जामिया मालिया यूनिवर्सिटी कहते हैं. इसने पब्लिकली घोषणा की है कि वह, जिन आतंकवादियों पर मुक़दमा चल रहा है, उनके बचाव के लिए वकीलों की फ़ीस देगी.’

आज जब जामिया मिलिया के वर्तमान कुलपति तलत अहमद साहेब के ध्यान में यह बात लाई गई तो उन्होंने यह स्वीकारा कि बटाला हाउस एनकाऊन्टर 2008 के मामले में जिन आतंकवादियों को गिरफ़्तार किया गया था, उन्हें बचाने के लिए कुछ प्रोफ़ेसरों ने चंदा करके फ़ीस के पैसे इकट्ठा किये थे.

इससे यह प्रमाणित हो गया है कि जेएनयू ही नहीं, दिल्ली में एक और जगह है, जिसे जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी कहते हैं. यह भी पाकिस्तानी एजेन्टों का गढ़ हो सकता है.

यहां भी चूहों के बिल जैसे खोलों मे देश के दुश्मन, राष्ट्र विरोधी, आस्तीन के सांप छुपे हुए हैं. उन प्रोफ़ेसरों को तत्काल ढूँढना चाहिए जिनका ज़िक्र जामिया मिलिया के कुलपति ने अभी हाल में ही अकर्रम साहेब को दिये गए एक इन्टरव्यू में किया है.

जिस बटाला हाऊस एनकाऊन्टर का ज़िक्र किया गया है, वह घटना 19 सितम्बर 2008 की है जिसमें आतंकवादियों से दिल्ली पुलिस की मुठभेड़ हुई, दो आतंकवादी मारे गए, दो पकड़े गए, एक फ़रार हो गया.

इस आपरेशन में दिल्ली पुलिस के इन्सपेक्टर मोहन चंद शर्मा शहीद हो गए. इन आतंकवादियों ने दिल्ली में पांच सीरियल बम धमाके 13 सिसम्बर 2008 में किए थे, जिसमें तीस लोग मारे गए थे और सौ लोग घायल हुए थे.

इन्हीं लोगों ने दिल्ली, अहमदाबाद, जयपुर, सूरत और फ़ैज़ाबाद में बम विस्फोट किये थे. पाँचवा आतंकवादी नेपाल की सीमा पर गिरफ़्तार किया गया. पर भारत की बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और दिग्विजय सिंह सहित कई कांग्रेसी नेताओं ने इसे फ़र्ज़ी एन्काऊन्टर क़रार देकर अल्पसंख्यकों के वोट कबाड़ने के लिए घिनौनी राजनीति का प्रदर्शन किया.

इन्हीं आतंकवादियों को बचाने के लिए जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के शिक्षकों तथा छात्रों ने पैसे इकट्ठा करके वकीलों को फ़ीस दी तथा जुलूस निकाल कर देश के दुश्मनों का खुलेआम समर्थन किया.

क्या यह लोग राष्ट्रद्रोही नहीं हैं? अब इन आस्तीन के साँपों को उनके बिलों में घुस कर, चुन-चुन कर पकड़ कर क़ानून के हवाले करना होगा.

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