अफज़ल से रिश्ता पुराना है हमारा, चाहे वो अफज़ल खान हो या अफज़ल गुरु

अफ़ज़ल खान आदिल शाह वंश के अधीन बीजापुर महाराष्ट्र का सेनापति था. अफ़ज़ल खान हर युद्ध में जाने के पहले बीजापुर के एक मुस्लिम पीर से आशीर्वाद लेता था और अफ़ज़ल खान ने कई हिन्दू मंदिर तोड़े थे.

अफज़ल खान शिवाजी को हरा नहीं पा रहा था. इसीलिए मित्रता का निमंत्रण भेजा.

शिवाजी से मिलने हेतु अफ़ज़ल खान ने अपने एक ब्राह्मण मित्र कृष्ण भास्कर कुलकर्णी को शिवाजी के पास मित्रता प्रस्ताव के लिए दूत बनाकर भेजा.

कृष्ण भास्कर कुलकर्णी अफज़ल के मित्र तो थे किन्तु उन्हें अफज़ल की नीचता का पूरा ज्ञान था. ब्राह्मण जब शिवाजी से मिलने पहुंचा तो शिवाजी ने उसका सम्मान किया.

शिवाजी को ये मालूम था कि अफ़ज़ल खान ने पहले भी मित्रता प्रस्ताव भेजकर राजा कस्तूरी रंगा के साथ छल किया था और उन्हें मार डाला था.

शिवाजी ने अपने मित्र पंताजी गोपीनाथ को अफज़ल के पास भेजा और मित्रता प्रस्ताव हेतु स्थान निर्धारित किया.

शिवाजी भी भोले थे किन्तु अफज़ल की नीचता से वाकिफ थे इसीलिए वो अपने साथ दो अंगरक्षक “जीवा महल” और संभाजी कावजी को अपने साथ ले गए और निमंत्रण मिलने पर पहुँच गए.

अफज़ल ने शिवाजी को गले लगाकर उनका स्वागत करने का निवेदन किया. शिवाजी राजी हो गए.

जैसे ही शिवाजी गले लगे अफज़ल ने अपनी औकात दिखा दी और खंज़र निकाल लिया, शिवाजी को मारने की कोशिश की. शिवाजी को हल्का सा खंजर चुभ गया और शिवाजी भांप गए.

उन्होंने तुरंत अफज़ल से अपने आप को छुड़ाया और अफज़ल की पीठ को अपने हाथों से जकड़ लिया, और दोनों हाथों से अफज़ल को रीड़ की हड्डी के पास से ऐसा चीरा जैसे कोई ककड़ी को चीर देता है.

शिवाजी के हाथों में व्याघ्र नख थे उसी से शिवाजी ने अफ़ज़ल खान को चीरकर दो टुकड़े कर दिए. ऐसा लग रहा था जैसे किसी सिंह ने गैंडे का शिकार किया हो.

अफ़ज़ल खान के मुख से निकला “या अल्लाह” और शिवाजी महाराज के मुख से निकला “जय भवानी”

उधर जीवाजी महल ने भी अफज़ल के बाकी सैनिको को मार डाला…. मराठी भाषा में एक कहावत आज भी प्रसिद्ध है कि “जीवाजी थे इसीलिए शिवाजी जीवित बचे”

महाराष्ट्र में आज भी अफज़ल और शिवाजी के इस प्रसंग पर स्कूलों में नाटक खेले जाते है.

तो अफज़ल से हमारा रिश्ता पुराना है. हर बार यूं ही चीर देंगे…. चाहे अफ़ज़ल खान हो या अफज़ल गुरु.

महाराणा प्रताप को भी इसी तरह धोखे से बंदी बनाया था अकबर ने. उन्हें मित्रता हेतु दरबार में बुलाया और वही बंदी बना लिया गया था उन्हें.

हम भारतीयों का भोलापन ही हमें ले डूबा…. अब भी वक्त है… हम भोलेपन से बाहर निकलें वरना सब कुछ ख़त्म हो जाएगा.

– कृष्ण कुमार त्रिपाठी

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