उमर खालिद, अशरफ़ मुसलमान और भारत की राजनीति

अक्सर हमारे बीच सभी मुसलमानों को ले कर जो राजनीतिक भावना होती है वो इतनी भी सही नहीं है. हाँ, ये सच है कि जब हिन्दू के विरोध में एक्शन लेना होता है तो सभी मुसलमान केवल मुसलमान हो जाते हैं, तब वे सच्चे और गलत इस्लाम के पचड़े में नहीं पड़ते. लेकिन बात यह है कि खुराफात वही कर सकता है जो काबिलियत रख सकता हो. इस काबिल तबके को समझ लेते हैं.

ये ज़्यादातर अशरफ़ होते हैं. अशरफ़ का अर्थ होता है उच्च, श्रेष्ठ. लेकिन ये कौन हैं ये देखने जाएँ तो पता चलता है कि ये बाहरी नस्ल के लोग हैं जो अपने अलग रंग-रूप, नैन-नक्श, कद-काठी से पहचाने जाते हैं. जिन्होंने भारतीय खून अपने साथ मिलने नहीं दिया है.

हाँ, उनके पूर्वजों ने हम भारतीयों का खून बहाया जरूर होगा, लेकिन अपने खून में भारतीय खून की कभी मिलावट नहीं होने दी. जिन हिंदुओं को मुसलमान बनाया या अगर कहीं जो extra curricular recreational activities में कुछ मुसलमान पैदा भी किए उनको भी कभी अपनाया नहीं. अपने से अलग ही रखा.

इनका खून, इनकी नस्ल अलग है, यही इनकी श्रेष्ठता है. देवबंद के उच्च पदों पर जहां doctrine पर निर्णय होता है, सभी अशरफ़ ही तशरीफ़ रखे मिलेंगे.

हाँ, लेकिन चूंकि ये हिन्दू नहीं है, कम्युनिस्टों को यह “ब्राह्मणवाद” नहीं दिखेगा. हालांकि असल में भारत के बहुसंख्या मुसलमान समाज के गरीबी के हालत का जिम्मेदार यही अशरफ़ तबका है. इन्हीं के कारण अजलफ-अरजल – यानी कि भारतीय वंश के मुसलमान, 800 साल की मुसलमान सत्ता होने बावजूद सब से गरीब हैं.

यह बात वे जानते भी हैं लेकिन आवाज़ उठाने की हिम्मत कम है. वैसे भारत के स्वतंत्र होने के बाद ही पस्मान्दा (पिछड़ा) मुसलमानों को आवाज मिली है, उनके महाज उभर रहे हैं, वक्फ के पैसे-प्रॉपर्टी पर कुंडली मार बैठे अशरफ़ों के विरोध में हिंदुओं से मदद मांग रहे हैं.

वे समझ रहे हैं कि यह धन भारत का है, भारतीयों का है और ये बाहरी हमलाखोरों के वंशज बस नस्ल और मज़हब के ठेकेदार बने, नस्ली मुल्लाओं के बलबूते पर उन्हें दबाये बैठे हैं.

पस्मान्दा की व्यथा को समझिए शायर अकबर इलाहाबादी के शब्दों में –

इस्लाम की अज़मत का क्या ज़िक्र करूँ हमदम
संसद में फकत सय्यद, मस्जिद में फकत जुम्मन.

अज़मत = शान, महानता
सय्यद = सब से उच्च माने जानेवाले मुसलमान, जो खुद को मुहम्मद की बेटी फातिमा के पुत्रों के वंशज साबित कर सकते हैं. उन्हें मुहम्मद के ही वंशज माना जाता है. फकत = केवल
जुम्मन = गरीब मुसलमान.

हाँ, लेकिन चूंकि ये हिन्दू नहीं है, कम्युनिस्टों को यह “ब्राह्मणवाद” नहीं दिखेगा.

कोई मार्क्स-माओ का भक्त बताएगा कि जिस सामंतवाद और काल्पनिक ब्राह्मणवाद के नाम से तुम हिंदुओं को लड़ाते रहते हो, दल हित चिंतक पैदा कराते हो, यह जो बताया है, वो क्या है?

क्या तुम्हें यह सब इसीलिए नहीं दिख रहा क्योंकि पहले कुछ बोलते तो मार मिलती थी और अब नहीं बोलते क्योंकि इनसे ही तुम्हें माल मिलता है जब से सोवियत संघ टूटा है?

तो यही अशरफ हैं जिन्होंने भारत में उत्पात किए हैं. पहले तो खुल कर बाहरी ही थे लेकिन जब भारत स्वतंत्र हुआ तब भी सत्ता में यही हैं. अब खुद को शहरी बताते हैं. लेकिन अजलफ-अरजल से वहीं वंश-श्रेष्ठत्व वाली दूरी कायम है.

और हाँ, हिंदुओं के पोस्ट्स पर दलित का पक्ष लेकर आग में तेल डालने वाले मुसलमान अक्सर अजलफ ही होते हैं जो इनके भाड़े के सैनिक होते हैं. लेकिन दलित के लिए ब्राह्मण की बेटी मांगने से ही जिनको समानता दिखती है उनको कभी अपने सय्यद या पठान की बेटी मांगने की हिम्मत नहीं होती यह भी सत्य है.

दिखाएँ एक भी असली वाले सय्यद की बेटी की शादी किसी हलालखोर या लालबेगी से हुई हो तो ?

मार्क्स के भक्तों, इसकी व्याख्या नहीं है क्या तुम्हारे पास ?

ये अशरफ़ हमेशा खुद की तशरीफ बचाकर रहते हैं. अकबर ने राजपूत से राजपूत लड़ाये. अकबर ओवैसी दलित-सवर्ण लड़ा रहा है. बाहरी खून का अशरफ़ वो भी है.

अकबर बाहर से कुछ नहीं लाया था, जो भी जागीरें जवाहरात इनाम दिये, यहीं इस देश से ही लूटे हुए थे, हिन्दू से लूटा, हिन्दू को बांटा. बीच में अपना कद बढ़ा लिया, महान सुलतान बन गया. अपना कुछ भी नहीं दिया.

यही हो रहा है, दलितों को अपना भाई कहनेवाला ओवैसी उनको मुस्लिम संस्थाओं में मुस्लिमों की सीटें थोड़े ही दिला रहा है? अब यह पढ़ कर शर्म के मारे देगा तो मेरे लिखने को सार्थक हुआ समझूँगा. नहीं तो वो भी नहीं देगा, बस दलित को ही सवर्ण के खिलाफ और भड़काएगा यही ज्यादा संभावना है.

उमर खालिद भी अशरफ़ घर का ही है. ढूंढ लो उसकी कुंडली. खंगाल लो किस खानदान का है. जो वामिए उसे जानते हैं, ताल ठोक कर कहते हैं कि वो कायर नहीं है. उनसे पूछ लीजिये.

वैसे वो अपने गतिविधियों में लिप्त था तो आज का नहीं है, लेकिन आज गरीब और महत्वाकांक्षी हिन्दू कन्हैया को मोहरा बनाकर सामने आया है.

और कन्हैया के पकड़े जाते ही अपनी अशरफ तशरीफ बचाने फरार हो गया था. खैर अच्छा है, चेहरा सामने तो आया, उम्मीद है कन्हैया के उदाहरण से अन्य गरीब हिन्दू सीख लेंगे.

घर के मतभेद घर वालों से ही निपटना अच्छा है, बाहर वालों को मदद को बुलाएँगे तो घर ही बर्बाद होता है, खास कर के मुसलमान को बुलाएं तो – यह भारत का इतिहास कहता है.

फायदा उसका ही होता है, और वही वो चाहता है. आप का कोई फायदा नहीं होता बस यह देखने को मिलता है कि जो आप ने चाहा था उस पर वो काबिज़ हो जाता है और आप के हालात पहले से बदतर हो जाते हैं.

उमर खालिद को ले कर एक लेख है विडियो के साथ, संदर्भ के लिए दे रहा हूँ कि कैसे गरीब हिन्दू का exploitation ये करते हैं. जो हुआ है वो इतिहास था, जो है यह वर्तमान है, बस उम्मीद यह है कि भविष्य में यही गलती न हो.

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