मीडिया की मंडी में बैठे दुकानदारों, बंद करो ग्राहकों को धमकाना

जब महाभारत की युद्ध शुरू होने वाला था तो पांडव पक्ष की बैठक हुई. सब लोग ये तय करने बैठे कि आगे की रणनीति क्या हो? युधिष्ठिर को सभापति बनाया गया. उन्होंने सबसे पहले नकुल को बोलने कहा.

अब नकुल घबराये हुए से खड़े हुए और कहने लगे, भैया ये क्या? द्रुपद और विराट जैसे ससुर लगने वाले लोग यहाँ हैं, श्री कृष्ण भी हैं, और तो और मेरे ही तीन बड़े भाई बोलने के लिए बाकी हैं! मैं तो सबसे छोटा हूँ, मुझे पहले बोलने का मौका क्यों दिया है?

युधिष्ठिर हंसकर बोले, भाई कई बार, अगर बड़े लोगों का मत अलग हो तो, छोटे बेचारे संकोचवश ही चुप लगा जाते हैं. अगर बुजुर्गों से उनकी राय अलग भी हो तो, बड़े हैं, ज्यादा जानते होंगे, ये सोचकर उनके खिलाफ नहीं बोला जाता. कई बार बरसों से जो सम्मान करना सिखाया जाता है उसकी वजह से भी विरोध होने पर लोग चुप लगा जाते हैं. ऐसे में तो सबके मन की बात का पता ही नहीं चलेगा!

इसलिए पहला मौका छोटों को मिलना चाहिए, बड़ों का मत अलग हो तो भी वो अपना विरोधी विचार प्रकट करेंगे. छोटा बेचारा ना बोल पाए ऐसा नहीं होना चाहिए.

महाभारत का ये किस्सा आम तौर पर नहीं सुनाया जाता. टीवी पर भी सिर्फ युद्ध दिखा कर छोड़ देते हैं. शायद यही कारण रहा होगा कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग ये नहीं चाहता कि पहले छोटों को मौका मिलना चाहिए.

अब मिथकों और साहित्य के काल से निकल कर, सूचना क्रांति के दौर पर आते हैं. आज के दौर को देखेंगे तो सूचना क्रांति ने कई चीज़ें बदल दी हैं. कुछ साल पहले जहाँ अखबार आज हुई घटना की खबर कल सुनाता था वहीँ अब टीवी का ब्रेकिंग न्यूज़ अभी घट रही घटना की तत्काल लाइव रिपोर्टिंग कर देता है.

हम समाचार पत्र खरीदते हैं. टीवी पर समाचार देखने के लिए भी हमें केबल कनेक्शन के पैसे देने पड़ते हैं, प्रचार देखना पड़ता है. हम समाचारों के ग्राहक हैं.

जैसा आम तौर पर ग्राहक के साथ होता है, हमारी भी पसंद-नापसंद है. हमारे पसंद की चीज़ अगर एक दुकान में नहीं मिले तो हम दूसरी दुकान पर भी जायेंगे.

जैसे मोहल्ले का दुकानदार ये बात याद रखते हुए आज मैगी के साथ-साथ किसी स्वदेशी आटा नूडल्स के भी पैकेट रखने लगा है, वैसे ही मीडिया की मंडी में बैठे दुकानदारों को भी ये साधारण सी बात समझनी चाहिए.

दुकानदार अक्सर सेठ होता है, ग्राहक कई बार आर्थिक मजबूती में उसका मुकाबला नहीं कर सकता. लेकिन दुकानदार कभी अपने ग्राहक को बेइज्ज़त नहीं कर रहा होता!

मीडिया की मंडी में बैठे दुकानदार किस्म-किस्म के जुमले इस्तेमाल करके लोगों को शर्मसार करने की कोशिश करते वक्त ये साधारण सी बात कैसे भूल जाते हैं?

लोकतंत्र में सबको बराबरी का हक़ होता है. जज बनकर किसी पर फैसला सुनाने का किसी को हक़ नहीं होता. लेकिन यही बात कहते वक्त आप भूल जाते हैं कि ओप-एड नाम से जाने जाने वाले opinion editorial तो आप लिखते हैं!

व्यवस्था को भ्रष्ट, फैसलों को गलत और हर वाक्य में काफ्का और मिलन कुंदेरा के जुमले ना उछालने वाले लोगों को गाली-गलौच करने वाला कौन घोषित करता है? आप फैसला सुनाएँ तो जजमेंट और बाकि लोग अपनी राय रखें तो वो जजमेंटल क्यों हो जाते हैं?

मैथिलि की एक कहावत होती है ‘सौन जनमल नढ़ीया …’ मोटे तौर पर इसका मतलब ये होता है कि अप्रैल में पैदा हुआ कोई जुलाई-अगस्त की बारिश देखकर कहे कि ऐसी भीषण वर्षा तो अपने जीवन में कभी देखी ही नहीं!

स्वनामधन्य बुद्धि-पिशाच आपसे अक्सर यही कहेंगे. वो कहेंगे मैं तबसे दुनिया देख रहा हूँ जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे. अपनी पचास साला उम्र और सफ़ेद बालों की धौंस जमाना इनका रोज़ का काम है.

ऐसा करते वक्त ये लोग भूल जाते हैं कि शंकर 30-35 की उम्र में आदि शंकराचार्य हो चुके थे. दर्शन पर उनका लिखा आज भी पढ़ा जाता है.

ऐसी ही तीस साल की उम्र में कोई मामूली सा सिपाही नेपोलियन हो गया था. एलेग्जेंडर क्या महान बनने के लिए किसी उम्र का इंतजार करता रहा था या तीस-पैंतीस तक पहुँचते-पहुँचते उसने दुनिया जीत ली थी?

ये वही लोग हैं जिनके लिए जनक के दरबार में शास्त्रार्थ करने पहुंचे एक बालक ने पूछा था कि यहाँ तो सब चमड़े की पहचान करने वाले बैठे हैं! आपके दरबार के ज्ञानी कहाँ गए?

स्कूल कॉलेज के ज़माने में जब आप अपने पिताजी से पैसे लेकर फिल्म देखने जाते थे तो आपसे पूछा जाता था. आप ‘परसूट ऑफ़ हैप्पीनेस’ देखने जा सकते थे, आप ‘सिरोक्को’ देखने नहीं जा सकते थे साहब.

देश के पैसे से चलने वाली यूनिवर्सिटी में क्या हो रहा है ये जानने का हमें पूरा हक़ है. किस टीवी चैनल ने दिल्ली की ही सड़कों पर सौ-पचास लोगों से पूछकर देखा है कि वो उन नारों के बारे में क्या सोचते हैं? किसने सर्वे दिखाए कि जनता की इस मुद्दे पर राय क्या है?

सिर्फ एकतरफा रिपोर्टिंग करके जब आप खुद को निष्पक्ष घोषित करते हैं तो हमें आपसे सवाल करने का अधिकार क्यों नहीं है? क्या लोकतंत्र जनता के लिए बनी व्यवस्था नहीं है? या फिर पत्रकारिता लोकतंत्र का स्तम्भ नहीं रहा, जनता के लिए नहीं रहा इसलिए सवाल ना किये जाएँ आपसे?

किन्हीं वकीलों ने अगर पत्रकारों को पीट दिया तो ये तो लोकतंत्र के ही दो खम्भों पत्रकारिता और न्यायपालिका की लड़ाई थी ना? शासन तंत्र की ही दो समानांतर व्यवस्थाओं की इस जंग में जनता को काली स्क्रीन दिखाने का हक़ आपको किसने दे दिया?

धमका कर बच्चों के सवाल बंद करवाने वाली इस प्रवृति को लोकतंत्र में चलाने पर मेरा विरोध दर्ज़ कीजिये. जनता की आवाज़ को दबा कर एकतरफा पत्रकारिता करने पर आपसे मेरा एक सवाल तो बनता ही है. आपकी निष्पक्षता शक के घेरे में है. तो चलिए बताइए साहब, कौन जात हो?

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